जर्जर रेल पटरियों पर मौत का सफर

विष्‍णु गुप्‍तएक मात्र रेल दुर्घटना पर तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया था। वह काल निश्चिततौर पर नैतिकता का था/समाजसेवा का थी। पद लोलपुपता की जगह जिम्मेदारी लेने और स्वयं को जिम्मेदार मान कर सजा भुगतने के लिए नेता/मंत्री तैयार रहते थे। अनैतिकता के दौर में स्वयं जिम्मेदारी लेने और सजा भुगतने के लिए तैयार रहने की बात या प्रक्रिया चल ही नहीं सकती है। पद पर बने रहने और सत्ता सुख भोगकर अपनी कई पीढियों को आर्थिक कवज बनाने की होड़ में लगे राजनीतिज्ञों/ मंत्रियों /नौकरशाहों से लाल बहादुर शास्त्री जैसी नैतिकता की उम्मीद भी बेमानी है। सत्ता स्वयं भ्रष्ट मंत्रियों/नौकरशाहों को बचाने के लिए कानूनी संरक्षण की पैंतरेबाजी दिखाती है/मनगढंत-प्रत्यारोपित तथ्य पेश कर न्यायालय से ईमानदारी का सर्टिफिकेट हासिल करने में बेशर्मी की सीमा पार करती है।

बहरहाल कालका एक्सप्रेस की घटना पर रेल मंत्रालय की गर्जना सुनने में काफी अच्छी लगती है। रेल मंत्रालय के एक कनिष्ठ मंत्री का कहना है कि कालका दुर्घटना के दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा और उन पर लापरवाही के कानून का सोटा चलेगा। यह गर्जना सिर्फ और सिर्फ दिखावे के लिए है। दुर्घटना में हताहत परिवारों और अन्य जनाक्रोशों पर पानी डालने के लिए है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर रेल मंत्रालय को कई सवालों का जवाब भी देना होगा। पूर्व में हुई रेल दुर्घटनाओं में आज तक एक भी दोषी कर्मचारी-अधिकारी पर सबककारी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। जब कर्मचारियों और अधिकारियों पर सबककारी कार्रवाई ही नहीं होगी तबतक रेल सुरक्षा पर जिम्मेदारी का भान कैसे उत्पन्न होगा? लापरवाही रूकेगी भी तो कैसे? रेल यात्रियों का सुरक्षित सफर सुनिश्चित होगी तो कैसे? रेल पटरियों पर आगे भी मौत दौड़ती रहेगी।

लीपापोती की पुरानी नीति : लीपापोती की पुरानी नीति पर रेल मंत्रालय चलता है। दुर्घटनाएं होने के साथ ही साथ रेल यात्रियों को चाकचौबंद चिकित्सा सुविधा और अन्य राहत कार्य को गति देने की जगह दुर्घटना के सही कारणों पर पर्दा डालने और दोषी रेल कर्मचारियो-अधिकारियों को बचाने का काम शुरू हो जाता है। कालका एक्सप्रेस दुर्घटना में भी सही कारणों को सामने लाने की जगह उस पर पर्दा डालने के लिए रेल मंत्रालय सक्रिय है। रेल मंत्रालय का कहना है कि इमरजेंसी ब्रेक लगाने से कालका एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई है। रेल मंत्रालय के इस आकलन की हवा खुद कालका एक्सप्रेस के ड्राइवर ने निकाल दी है। कालका एक्सप्रेस के ड्राइवर एके सिंह ने प्रारंभिक बयान में साफतौर पर कहा है कि उसने इमरजेंसी ब्रेक नहीं लगायी थी। अब सवाल यह उठता है कि जब डाइवर ने इमरजेंसी ब्रेक नहीं लगायी थी तब दुर्घटना कैसे घटी?  दुर्घटना के समय कालका एक्सप्रेस की गति 108 किलोमीटर प्रति घंटा बतायी जा रही है। 108 घंटे की गति का तथ्य भी प्रत्यारोपित है। उस समय कालका एक्सप्रेस की गति 108 किलोमीटर से कहीं अधिक होगी क्योंकि दुर्घटना भयावह थी और कुल 24 बोगियां क्षतिग्रस्त हुई हैं। बोगियों की भयावह स्थिति को देखने से यह साफ प्रतीत होता है कि कालका एक्सप्रेस की गतिसीमा पर रेल मंत्रालय अपनी ईमानदारी से भाग रहा है। तकनीकी कारणों की तह में जाना रेल मंत्रालय का काम है। लेकिन रेल मंत्रालय दुर्घटना के सही कारणों पर पर्दा डालने का खेल ही खेल रहा है।

लवारिश है रेल मंत्रालय : रेल मंत्रालय लवारिश है। रेल मंत्रालय का कप्तान है भी और नहीं भी। एक तरह से रेल मंत्रलाय बिना कप्तान ही चल रहा है। पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी रेल मंत्री होने के बाद भी रेल मंत्रालय की जगह अपनी मिशन ‘पश्चिम बंगाल’  की सत्ता में निर्णायक तौर पर सक्रिय रहती थी। इसका कुपरिणाम यह निकला कि रेल मंत्रालय में अराजकता पसर गया। नौकरशाही और बाबू बेलगाम हो गये। सभी ने रेल मंत्रालय को अपना जागीर समझ बैठे और अपनी निजी संपत्ति भी। निर्णयों और नीतियां लगातार गताल खाते में जाती रहीं। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गयी पर रेल मंत्रालय की अराजकता वैसे की वैसे ही कायम रही। दुर्घटना के समय रेल मंत्रालय खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था। मनमोहन सिंह कितने सक्रिय हैं और चाकचौबंद हैं इसका अंदाजा सभी को नहीं है, यह हो ही नहीं सकता। खुद मनमोहन सिंह का कार्यालय ने देवास घोटाले और सुनील दत्त की जगह सुरेश कलमाडी को राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति का अध्यक्ष बना दिया। फिर मनमोहन सिंह को कुछ मालूम नहीं होता है। जब उनके कार्यालय में कैसा खेल-खेला जा रहा है यह मालूम मनमोहन सिंह को नहीं है तब रेल मंत्रालय में किस प्रकार की अराजकता है और खुला खेल फार्रुखावादी की कहावत सच हो रही है यह सब मनमोहन सिंह को मालूम होगा तो कैसे। रेल मंत्रालय में भ्रष्टाचार चरम पर है। रेल यात्रियों की शिकायतों पर चाकचौबंद व्यवस्था करने की जगह रेल मंत्रालय में आर्थिक लूट की गंगोत्री बह रही है। रेल मंत्रालय का संपर्क विभाग सहित अन्य विभागों पर दलालों और फिक्सरों का कब्जा है। अब नए रेलमंत्री कौन सा तीर मारते हैं देखने वाली बात होगी।

कहां गयी सुरक्षा नीति : रेल मंत्रालय की सुरक्षा नीति कहां गयी? नीतिश कुमार के कार्यकाल में रेल के परिचालन पर चाकचौबंद सुरक्षा नीति बनी थी। 1500 करोड़ की भारी-भरकम सुरक्षा निधि भी बनायी गयी थी। विदेशी तकनीकी से रेल चालन को चाकचौबंद बनाने की भी बात थी। रेल गाड़ियों को दुर्घटना से बचाने के लिए बुलेट प्रूफ व्यवस्था लागू करने की योजना का क्या हुआ?  यह कोई नहीं जानता है। रेल चालन के लिए विदेशों से आयी विदेशी तकनीक की स्थिति पर से भी पर्दा उठना जरूरी है। नीतीश कुमार ने रेल मंत्रालय की आंतरिक स्थिति सुधारने की बड़ी व्यवस्था खिंची थी। नीतीश कुमार के बाद रेल मंत्री बने लालू प्रसाद की हवाहवाई व्यवस्था की गीत सम्मान के साथ गाये गये। मीडिया ने लालू प्रसाद यादव को मसीहा मान लिया। कई हजार करोड़ का फायदा रातोंरात दिखा दिया गया। जब ममता बनर्जी रेल मंत्री बनी तो लालू प्रसाद यादव की असली कारस्तानी सामने आयी। हजारों करोड़ मुनाफे की बात हवाहवाई ही निकली। रेलवे का आंतरिक स्थिति बेहद खतरनाक निकली। जर्जर पटरियों पर लापरवाह परिचालन की कहावत सच हो रही है। पटरियों की जर्जर स्थिति की ही बात नहीं है बल्कि परिचालन से जुड़ी तकनीकी भी जर्जर है/पुरानी है और दुर्घटनाओं को न्योता देने वाली है। सबसे बड़ी बात यह है कि रेल परिचालन से जुड़े कर्मचारी-अधिकारी अनाड़ी है और उन्हें रेल परिचालन से जुड़ी आधुनिक प्रशिक्षण व्यवस्था की जरूरत है।

यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी :  यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी रेल मंत्रालय की है। रेल मंत्रालय दुर्घटना के शिकार लोगों के परिजनों को चंद कागज के टुकडे़ देकर अपने फर्ज की इतिश्री नहीं मान सकता है। यात्रियों की जान की कीमत क्या चंद कागज के टुकड़े हो सकते हैं? क्या चंद कागज के टुकड़ों से हताहत परिजनों के दुखों का अंत मान लिया जाना चाहिए?  रेल यात्रियों की सुरक्षित उनके मंतव्य तक नहीं पहुंचना रेलवे की दुश्‍वारियां हैं। इस दुश्‍वारियों की सजा रेलवे के अधिकारियों को क्यों नहीं मिलनी चाहिए। सिर्फ रेल दुर्घटनाओं की ही बात नहीं है। रेल यात्रा के दौरान रेल यात्रियों के साथ अपमान और असुविधा जैसी घटनाएं भी होती है। रेल गाड़ियों में समानों की चोरी और डकैती भी आम बात हो गयी है। असुविधाएं ऐसी की लम्बा रेल सफर मुसीबतों की खान होती है। जब तक जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों को दंडित करने की चाकचौबंद नीति नहीं बनती है तब तक रेल दुर्घटनाओं को रोक पाना मुश्किल है। जिम्मेदारी का अहसास होगा भी तो कैसे। रेल दुर्घटनाओं पर आयोग बैठा दिया जाता है। आयोग जांच मे वर्षों लगा देता है और अपनी सिफारिश में वैचारिक भाषण रख कर जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों को संरक्षण का आवरण पहना देता है। यह नीति रूकनी चाहिए।

लेखक विष्‍णु गुप्‍त हिंदी के वरिष्‍ठ एंव जनपक्षधर पत्रकार हैं. इन्‍होंने समाजवादी और झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई है. पत्रकारिता के ढाई दशक के अपने करियर में झारखंड में दैनिक जागरण, रांची, स्‍टेट टाइम्‍स, जम्‍मू और न्‍यूज एजेंसी एनटीआई के संपादक रह चुके हैं. फिलहाल राजनीतिक टिप्‍पणीकार के रूप में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं. इनसे संपर्क 09968997060 के जरिए किया जा सकता है.

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