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जामा मस्जिद बन गई सरमद की कत्‍लगाह

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : औरंगजेब का चेहरा तमतमाया और पूरा दरबार बौखलाया हुआ था। मौलानाओं के लिए तो यह कहर की घड़ी थी। कि कब्रिस्‍तान जैसी सर्द खामोशी को तोड़ती हुई बादशाह की कड़कती आवाज गूंजी- बोलो। फकीर बोला- ला इलाह। बादशाह गरजा- पूरा कलमा क्‍यों नहीं पढ़ते। जवाब मिला कि जो दिल में न हो वह जुबान पर कैसे आये,  मैं तो अभी साक्षात्कार की सीमा तक पहुंच ही नहीं पाया। बिना जाने कैसे कहूँ? फिर क्‍या था। नंगे दरवेश पर मौलवी चढ़ बैठे। कहा, यह तो कुफ्र है। और औरंगजेब ने मौत का फरमान सुना दिया। लेकिन दरवेश मौत से बहुत ऊपर था। ठठाकर हंसा, बोला, यह तो सिरदर्द की दवा मिल गयी।

कुमार सौवीर

कुमार सौवीर-

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : औरंगजेब का चेहरा तमतमाया और पूरा दरबार बौखलाया हुआ था। मौलानाओं के लिए तो यह कहर की घड़ी थी। कि कब्रिस्‍तान जैसी सर्द खामोशी को तोड़ती हुई बादशाह की कड़कती आवाज गूंजी- बोलो। फकीर बोला- ला इलाह। बादशाह गरजा- पूरा कलमा क्‍यों नहीं पढ़ते। जवाब मिला कि जो दिल में न हो वह जुबान पर कैसे आये,  मैं तो अभी साक्षात्कार की सीमा तक पहुंच ही नहीं पाया। बिना जाने कैसे कहूँ? फिर क्‍या था। नंगे दरवेश पर मौलवी चढ़ बैठे। कहा, यह तो कुफ्र है। और औरंगजेब ने मौत का फरमान सुना दिया। लेकिन दरवेश मौत से बहुत ऊपर था। ठठाकर हंसा, बोला, यह तो सिरदर्द की दवा मिल गयी।

यह थे सरमद। वे पूरा कलमा नहीं, सिर्फ ला-इलाह बोलते थे। मतलब- नहीं है कोई पूज्य। जबकि पूरा कलमा है, ला इलाह अल्लाह मुहम्मद रसूल अल्लाह। हालांकि सूफी लोग भी मुहम्मद रसूल अल्लाह नहीं पढ़ते हैं। वे ला इलाहइल अल्लाह पढ़ते हैं जिसका मतलब है, नहीं है कोई पूज्य सिवा अल्लाह के। सरमद का शाब्दिक अर्थ होता है जो आदि और अंत से रहित, अजर-अमर, सदा जीवित और समय, स्‍थान से परे व अनंत है, वही सरमद है। यह फकीर भारत में इस्‍लामी शासन को जबरिया लागू करने के खिलाफ जुटा था। उसे सबमें एक ही नूर दिखता। उसकी शरियत उसकी आत्‍मा थी। वह मानता था कि हर आत्‍मा निष्‍पाप होती है। सरमद ने अल्‍लाह को जानने के लिए अपना धर्म छोड़ कर इस्‍लाम अपनाया लेकिन कट्टरता ने उन्‍हें मौत दे दी। यह बात दीगर है कि सरमद मौत की सजा सुनने और लागू होने के वक्‍त भी जिन्‍दा था, आज भी है और हमेशा रहेगा।

दिल्‍ली की जामा मस्जिद के जिस चबूतरे पर उसका सिर कलम किया गया, वहां बनी सरमद की मजार अब भी लाखों लोगों की आस्‍था का केंद्र है। आरमीनीया के यहूदी व्‍यापारी खानदान में सरमद सन 1618 को पैदा हुए। जन्‍म ईरान के काशान में हुआ। बचपन में ही सरमद यहूदी धर्म-ग्रंथों में निपुण हो चुके थे। लेकिन ज्ञान की प्‍यास नहीं बुझी तो दूसरे धर्मों के ग्रंथों का अध्‍ययन शुरू किया। सरमद मस्त-मौला थे। असली नाम कोई नहीं जानता। दरअसल, सरमद तखल्लुस है जो कविता का उपनाम है। ईरानी सौदागरों के साथ सिंध होकर सरमद भी हिन्दुस्तान आये। यहां इन पर प्रेम का ऐसा उन्माद छाया कि अपना व्यापार भी तबाह कर डाला। इश्क-ए-मजाजी ने इन्हें इश्क-ए-हकीकी के उरूज तक पहुंचा दिया। यहां वे खूब घूमे। अल्‍लाह को वह अपनी अनोखी नजर से ही देखते और सराहते थे। उनका मानना था कि दूसरों की निगाह से अल्‍लाह को न तो देखा जा सकता है और न ही दूसरों की जुबान-कान से उसके बारे में सुनाया या सुना जा सकता है। हर शख्‍स को अल्‍लाह ने अनोखापन दिया है और उसी अनोखेपन में उसे जीना चाहिए।

बहरहाल, मोहब्‍बत और दर्शन के देश में सरमद कुछ यूं बावला हुआ कि अपने कपडे तक उतार फेंके और नंगा रहने लगा। नाम मशहूर हुआ- नंगा दरवेश। मौलानाओं को सरमद का यह अंदाज खुद पर खतरा दिखने लगा। वे अपनी बढ़त बनाये रखने के लिए अब सरमद को दंडित करने पर आमादा थे, लेकिन शाहजहां का बेटा दारा शिकोह इस्‍लामी कट्टरवाद से कोसों दूर शांति के लिए भटकते हुए सरमद का भक्‍त बन चुका था। अपने अंदाज के चलते सरमद का फक्‍कड नंगापन ही उसके पास अवाम को खींच लाया और प्रशंसकों का जमावड़ा लगने लगा। मौलानाओं के गुस्‍से की आग में अब घी पड़ गया। सरमद के क़लाम रुबाइयों की शक्‍ल में हैं। रुबाई चार पक्तियों का एक छोटा काव्‍यरूप है। सूफियों ने इसी रूप को अपनाया है। सरमद ने कुल 334 रुबाइयां बनायीं। मसलन,

– शाह-ओ दरवेश-ओ कलंदर दीदह ई,
सरमद-ए-सरमस्‍त-ओ-रुसवा रा ब-बीं।

यानी- क्‍या तुमने बादशाह, दरवेश और कलंदर को कभी देखा।
अगर नहीं, तो आ, मदमस्‍त और बदनाम सरमद को देख लो।

– बेहूदा चिर दर तलबश मी गरदी,
बिनाशीँ अगर ऊ खुदास्त खुद मी आयद।

मतलब यह कि उसकी तलाश में फिजूल क्यूँ फिरता है
अगर वह खुदा है तो खुद आएगा, तू बैठा रह।

शाहजहाँ के शासन के अंतिम दिनों में दारा की सलाह पर वे दिल्ली पहुंचे तो धूम मच गयी। उधर शाहजहां का शासन औरंगजेब ने सम्‍भाल लिया और इस्‍लामी कट्टरवाद की जड़ें गहराइयों तक पहुंच गयीं। औरंगजेब और उसके मौलवी विरोध की हर आवाज का गला रेतने को खंजर लिए बैठे थे। जबकि उधर उनकी नाक के ठीक नीचे सरमद भक्ति की अपनी अनोखी परिभाषाएं गढ़ रहा था। औरंगजेब ने दारा का कत्‍ल करवा दिया, मगर सरमद नहीं डिगा। शहर काजी ने सरमद को नंगा देख कर पूछा- यह क्या हरकत है। सरमद बोले- बाबा क्या करूँ, शैतान ही कवी (जबरदस्त) है।

काजी मुंह की खा गया। वजह यह कि खुद उसका ही नाम कवी था। अब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा तो औरंगजेब ने सभा बुलवाई। मौलवियों ने सवाल उछाला- तुम कपडे़ क्यूँ नहीं पहनते। सरमद ने औरंगजेब की ओर इशारा करते हुए कहा- जिसने तुझे बादशाही का ताज दिया है, उसी ने मुझे यह परेशानी का सामान दिया। जिसको भी उसने बुराइयों वाला देखा, उसको कपडे़ पहनाकर दोष ढंक दिये। लेकिन जिसे निर्दोष पाया, उसने उसे बिना कपड़ों के रहने को कहा।

– मौत यह मेरी नहीं मेरी कज़ा की मौत है, क्यूँ डरूं इससे कि फिर मर कर नहीं मरना मुझे,
जिसे मालिक की सत्ता और महत्ता पर विश्वास हो गया, वह खुद आकाश से भी महान हो गया।

– मुल्ला कहता है कि मुहम्मद आसमान पर खुदा से मिलने गए थे,
सरमद कहता है खुद आसमान मुहम्मद में समा गया।

कत्‍ल होने से पहले सरमद हंस कर बोले-  मंसूर का किस्‍सा पुराना पड़ गया, मैं उसे ताजा करने जा रहा हूं। जामा मस्जिद कत्लगाह बनी। इतनी भीड़, कि चलना दूभर। कंधे से कंधे छिलने लगे। जिसे मालिक की लौ लगी हो उसके लिए ज़मीं और आसमान में कोई फर्क नहीं रहता। मौत भला क्या बिगाड़ेगी। सरमद मस्त। आसमान की ओर निहारा। बोले- तेरी मोहब्‍बत के जुर्म में मारा जा रहा हूं। अब तू भी तो अटारी पर चढ़कर देख ले कि क्या खूब तमाशा है। जल्लाद तलवार चमकता हुआ आया, सरमद मुस्कराकर उससे बोले- तुझ पे कुर्बान जाऊं। आ आ, तू जिस सूरत में भी आ, मैं तुझे खूब पहचानता हूँ। और उन्होंने हंसते-हंसते अपनी जान कुर्बान कर दी।

– बुल-हवस को दर्द ए इश्क होता नहीं, सोज़ परवाने का मक्खी को नहीं,
इक जनम में दौलत ए दीदार पाए, हर किसी को वस्ल का हक मिलता नहीं।

कोई इंसान किसी चीज़ को तीव्र इच्छा से पाना चाहे तो उसे परवाने की तरह दर्द का एहसास नहीं होता। हर किसी को ऐसा मिलन नसीब कहां?

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

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1 Comment

1 Comment

  1. Surinder Anand

    September 21, 2021 at 6:26 am

    सरमद गोलकुंडा भी बहुत रहे और इश्क़ हकीकी मेँ बहुत ऊँचा मुकाम रखते थे और नवाब गोलकुंडा उनको बहुत मानते थे l एक बार उन्होंने नवाब को कह दिआ की फलां दिन तेरी मौत हो जाएगी और फलां जगह होगी l नवाब को यकीन था की सरमद ने ऐसा कहा है तो निश्चित ऐसा ही होगा और नवाब ने सोचा की मरना ही है तो खुदा के द्वार मक्का मदीना में ही मरूंगा तो वह मक्का मदीना के लिए रवाना हो लेकिन समय और स्थान के अनुसार उसका जहाज समुद्र में डूब गया और उसकी मौत हो गयी ऐसा होते ही सरमद मशहूर हो गया की उसका बोला खाली नहीं जाता l यह बात ओरंगजेब के कानों तक भी पहुंची ओरंगजेब सरमद से बहुत ख़फ़ा था क्योंकि ओरंगजेब का भाई दारा शिकोहा सरमद का मुरीद था 2 मुल्ला शिकायत करते थे की सरमद नंगा रहता है l 3 सरमद की अरबी और फ़ारसी पर अच्छी पकड़ थी और अच्छी शायरी करते थे रूहानी महफ़िलों मेँ उनका अच्छा स्थान था जो की औरंगजेब के दारुल इस्लाम मेँ बहुत बड़ी रूकावट थी और ओरंगजेब मोके की तलाश मेँ था की यह कोई ऐसी बात इस्लाम के खिलाफ करे और वह इसको कैद कर कर के मौत का फतवा लगवाए

    अगर अच्छा लगा हो तो मेल में रिप्लाई करना आगे सरमद की मौत तक के सफर के लिए

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