जिसकी जितनी बड़ी दाढ़ी, वह उतना ही बड़ा दार्शनिक

कुछ लोगों का मानना है कि दर्शन बड़ा ही टेढ़ा विषय है। और ये सिर्फ टेढ़े लोगों को ही नेचुरली सूट करता है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि जितना जो दर्शन में गहरी डुबकी लगाता है उतना ही वो टेढ़ा होकर बाहर निकलता है। जैसे कि मिस्टर अष्टावक्र थे। जितने बड़े दार्शनिक, शरीर से उतने ही ज्यादा टेढ़े भी। हो सकता है दर्शन का शरीर पर ऐसा ही भौतिक-रासायनिक असर होता हो। सुकरात को सीधा करने के लिए सरकार को उसे जहर तक पिलाना पड़ा। मगर वे फिर भी मरते दम तक टेढ़े ही रहे। अब तो मुझे भी यकीन हो गया है कि दर्शन का प्रभाव ही टेढ़ा पड़ता है। विश्वास न हो तो किसी के सामने बस आप दर्शन का नाम भर ले दीजिए। देखिए कैसे उसकी भंवे टेढ़ी होती हैं और फिर क्रमशः उसका मुंह टेढ़ा होता जाता है।

जब महज़ सुननेवाली की ये गत हो जाती है तो फिर जो सच्ची-मुच्ची का दार्शनिक हो उसको तो हंडरेड परसेंट टेढ़ा होनी ही होगा। चांद का मुंह टेढ़ा। इस टेढ़ेपन को ढकने के ही लिए लगता है इतिहास में दाढ़ी का आविष्कार हुआ होगा। दाढ़ी दर्शन सापेक्ष है। दर्शन दाढ़ी का समानुपाती है। जिसकी जितनी बड़ी दाढ़ी वह उतना ही बड़ा दार्शनिक। इसी गणित का चमत्कार है कि जो कहीं किलोमीटरों तक दार्शनिक नहीं होते दाढ़ी बढ़ा के वो भी दार्शनिक बनने का जुगाड़ भिड़ा लेते हैं। यहां तक कि चोर तक दाढ़ी रख लेते हैं। ये बात और है कि दाढ़ी से चिपका तिनका चोर का स्टिंग ऑपरेशन कर देता है। इसलिए समझदार टाइप के बुद्धिजीवी चोर पेट में ही दाढ़ी पालते-पोसते हैं। भूमिगत दाढ़ी में तिनका अटकने का चांस ही नहीं बनता। शीबू सोरेन और सुरेश कलमाड़ी-जैसे बहादुर तो बिरले ही होते हैं। इन्हें देखकर लोगों का सिर गर्व से इतना ऊपर उचक जाता है कि फटाक धड़ से ही अलग हो जाता है और लोग फोकट में राहू-केतू बन जाते हैं।

दर्शन की ताकत अनंत है। लोगों को टेढ़ा करने की इस क्षमता विराट है। दर्शन की तो बात छोड़िए लोग तो दूरदर्शन पर जाकर ही टेढ़े हो जाते हैं। ये है दर्शन का काला जादू। अंतिम दर्शन देनेवाले की अकड़ तो इतनी धांसू होती है कि हर जिंदा आदमी का तो मरने को जी ललचा ही जाता है। क्या बला का टेढ़ापन होता है, अंतिम दर्शन देनेवाले में। ब्रह्मा देवताओं में इकलौते हैं जिनके कि दाढ़ी है। दाढ़ी के बूते पर ही दुनिया को उन्होंने बना डाला। वरना शिवजी, विष्णुजी, रामजी और कृष्णजी सभी क्लीन शेव्ड हैं। और कोई भी दुनिया बनाने की जुर्रत नहीं कर पाये। ये बेचारे ब्रह्मा से क्या मुकाबला करेंगे सेंटा क्लॉज़ अकेले ने ही दाढ़ी के बल पर इन्हें ललकारा हुआ है। अब ऐसा नहीं है कि दाढ़ी ही दार्शनिक होने का लायसेंस हो। जिनके दाढ़ी नहीं है प्रभु उन्हें भी दार्शनिक होने का मौका देता है। लोग घुटने और गर्दन-जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के जरिए उम्र के साथ-साथ बिना दाढ़ी बढ़ाए हुए भी दार्शनिक होने लगते हैं।

संसार का हर प्राणी दर्शनधर्मा है। टेढ़ा होना उसकी नियति है। जिसे दर्शन ने छुआ वही तड़ से टेढ़ा हुआ। चाहे नाभिदर्शना नारी हो या फिर उस नाभिदर्शना का कोई गुप्त दर्शनाभिलाषी। टेढ़ी उंगली किये बिना तो डिब्बे के जिस्म में छिपे घी के भी दर्शन नहीं होते। टेढ़ा हुआ नहीं कि वो अच्छा-खासा दार्शनिक हुआ। मैं भी दार्शनिक हुआ चाहता हूं जबसे मैंने पति को दार्शनिक बनाने की अभिलाषा लिए लोकगीत की चंचल नायिका को मीठी-मीठी मनुहार करते सुना है कि- गोरी को पल्लू लटके-गोरी की कमर लचके ज़रा-सा टेढ़ा हो जा बालमा। मैं चुपके-चुपके टेढ़ा हो रहा हूं लगता है कि वो बालमा मैं ही हूं।

इस हास्य-व्यंग्य के लेखक पंडित सुरेश नीरव हैं. पंडित जी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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