टीवी को सब कुछ का लाइसेंस तो नहीं

संतोष भारतीयसरकार ने टेलीविजन चैनलों पर शिकंजा कसने के लिए एक नया कानून बनाने या पुराने केबल कानून मे संशोधन करने की तैयारी शुरू की। जैसे ही यह खबर बाहर आई, समाचार चैनलों के हाथ-पांव फूल गए और उनमें आपस में बैठकों का दौर शुरू हो गया। सवाल उठता है कि न्यूज चैनल के लोग घबराए क्यों ? दरअसल यह घबराहट न्यूज चैनलों के बीच बढ़ती जा रही साख की कमी की वजह से पैदा हुई। समाचार चैनलों मे अपवादों को छोड़ दें, तो अधिकतर मे समाचार कम होते जा रहे हैं। न्यूज चैनलों में समाचारों का कम होना समाचार देखने चाहने वाले दर्शकों को पसंद नही आ रहा हैं। वे चाहते है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा खबरें देखने को मिलें, जिन्हें वे पढ़ते हैं। हो उलटा रहा है। उन्हे पढ़ने को ज्यादा मिल रहा है, देखनें को कम। समाचार चैनलों पर उन्हें देखने को मिलता है, भूत-प्रेत, सांप-सांपिन, हिन्दू धर्म से जुड़ी काल्पनिक घटनाएं।

इन्हें बढ़ा-चढ़ा कर संगीत की चाशनी में डुबो कर दर्शकों को भरोसा दिलाने की कोशिश होती है कि यही है मनु की नाव, ये है शिवजी की शादी की जगह जहां उन्हे दहेज दिया गया, या ये है स्वर्ग का रास्ता। राम का धनुष, हनुमान का संजीवनी बूटी लाने वाला पहाड़, सब इन टीवी चैनलों को मिल गया, बस नहीं मिलती तो खबर। वह खबर जो बताए कि कमजोर यानी मुसलमानों और दलितों पर कैसे जुल्म हो रहे हैं? बेरोजगार कैसे संघर्ष कर रहे हैं? किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? भ्रष्टाचार कैसे बढ़ रहा है? पुलिस कैसे नकारा होती जा रही है? आदि।

टीवी न्यूज चैनल सिनेमा को प्रमोट करने वाले कार्यक्रम दिखा रहे हैं, कॉमेडी शो दिखा रहे हैं, म्युजिकल रियलटी शो दिखा रहे हैं, यानी वह सब दिखाने के रास्ते में हैं, जिसके लिए मनोरंजन चैनल बनाए गए हैं। बस खबरें नहीं हैं और जो हैं वे भी भरोसे के काबिल नहीं हैं। अपराध कथाएं पढ़ने वाले अपराध कहानियां देखें, इसके लिए न्यूज चैनलों मे होड़ लगी है और अपराध को भी इस तरह से दिखाया जा रहा है कि उससे दूर जाने का सबक नहीं मिलता, बल्कि उसे करने की प्रेरणा मिलती है। अपराध को ग्लैमराइज किया जा रहा है। आप ध्यान से न्यूज चैनल देखें तो पाएंगे कि अक्सर शाम होते-होते सबेरे वाली खबर के ठीक विपरीत खबर शाम को दिखाई जाती है और दर्शकों से गलत खबर दिखाने के लिए माफी भी नही मांगी जाती। अखबारों मे यह नहीं होता, अगर गलती होती है तो उसकी माफी मांग ली जाती है।

मनोरंजन चैनलों में बदलते जा रहे न्यूज चैनल लोगों मे गुस्सा पैदा कर रहे हैं, पर लोगों के पास कोई रास्ता नही है कि वे उस गुस्से को कैसे प्रकट करें। न्यूज चैनलों मे ऐसे संवाददाताओं की भरमार है, जिन्हें पत्रकारिता की बुनियाद का ही पता नहीं। वे ऐसी भाषा और अंदाज का इस्तेमाल करते हैं, जिससे दंगा भड़कने और युद्ध का माहौल पैदा होने लगता है। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है केवल दो उदाहरण काफि हैं। बाटला हाउस दंगे की लाइव कवरेज करने वाले एक तथाकथित स्टार पत्रकार ने कहा, ये है खलीलुल्लाह मस्जिद, यहां आतंकवादी हैं और गोलियां चल रही हैं।

अगर उसकी इस खबर का जबर्दस्ती उसी समय उसके चैनल पर आकर स्थानीय विधायक परवेज हाशमी ने खंडन न किया होता और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कम्युनिटी रेडियो पर वहां के तीन छात्र दिन भर सही हालात न बताते रहते तो दिल्ली सहित देश में कई जगह दंगा हो जाता। क्योंकि इस चैनल ने इस तरह रिपोर्ट किया, जैसे आतंकवादी खलीलुल्लाह मस्जिद मे छिपे हों और उनमें और पुलिस में गोलीबारी हो रही हो। लेकिन बाटला हाउस गोलीकांड का सच किसी चैनल ने नहीं दिखाया, अखबारों ने हिम्मत दिखाई, जिसमें मुझे अंग्रेजी के मेल टुडे अखबार का जिक्र करना जरूरी लगता हैं। इसके संपादक भारत भूषण ने हिम्मत के साथ सच लिखा और बार-बार लिखा। मैं अजीज बर्नी जैसे पत्रकारों का भी नाम लेता हूं पर अफसोस है कि उनकी रिपोर्ट को हिन्दी अखबार या अंग्रेजी अखबार नहीं उठाते।

दूसरा उदाहरण मुंबई मे ताज, ओबराय और छत्रपति शिवाजी स्टेशन पर चली दहशतगर्दों की गोलियों को लेकर है। इसे पाकिस्तानी सरकार की साजिश बता कर सारे मामले को हिंदुस्तान बनाम पाकिस्तान की जनता का बना दिया गया। न्यूज चैनलों को नहीं पता कि दहशगर्दों के संगठन खुफिया एजेंसियों और आम आदमी के बीच फर्क क्या है। आप जैसे ही कहते हैं, पाकिस्तान होश मे आओ, पाकिस्तान को चांटा लगा, पाकिस्तान पिटेगा वैसे ही आप दहशतगर्दों को छोड़ पूरे पाकिस्तान के अवाम को अपना दुश्मन बना लेते हैं।

हकीकत यह है कि सरकार को कानून बनाने का आमंत्रण इन्हीं चैनलों ने अपने हद दर्जे के गैर-जिम्मेदाराना रवैये की वजह से दिया है और सरकार उसका फायदा अपने पक्ष मे सख्त कानून बना कर उठाना चाहती हैं। चैनलों के संपादक मिले, प्रधानमंत्री से मिलने गए, गिड़गिड़ाए, मिन्नते की, तब प्रधानमंत्री ने कहा कि जो भी करेंगे सबकी सलाह से करेंगे। लेकिन दूसरी तरफ आम पत्रकारों ने देश भर मे इस कोशिश का विरोध किया और दबाव बनाया। हिंदी की दो न्यूज बेवसाइटों ने इसमें बड़ा रोल अदा किया, जिनमें एक का नाम भड़ास4मीडिया डॉट कॉम और दूसरी का विस्फोट डॉट कॉम है।

इन बेवसाइटों ने प्रस्तावित नए सेंसरशिप कानून के खिलाफ पत्रकारों मे जागरूकता पैदा की और उन्हे देश भर मे प्रदर्शन के लिए तैयार किया, जबकि न्यूज चैनल इतना करते हुए भी घबरा रहे थे। पंद्रह जनवरी को दिल्ली के  जंतर-मंतर पर सैकड़ों पत्रकार इकट्ठे हुए, पर आपको जानकर हैरत होगी कि कौन इनमें नही आया, गायब था। ये थे न्यूज चैनलों के संपादक, जिन्होंने अपने साथी पत्रकारों की भावनाओं को उनका साथ न देकर चोट पहुंचाई।

हम सब खबरों पर किसी तरह की भी सेंसरशिप का विरोध करते हैं, लेकिन जो खबरें दिखाते नहीं, उनका समर्थन नहीं करते। सरकार में भी दिमाग से खाली लोग बैठे हैं। उन्हें न्यूज चैनलों से सवाल पूछना चाहिए कि आखिर उन्हें लाइसेंस किसलिए दिया गया? जिसके लिए लाइसेंस दिया गया उसकी तो खानापूरी करते हैं और जिसके लिए वे अधिकृत नहीं हैं उसे करने की कोशिश करते हैं।

अगर सरकार उन्हें कह दे कि वे लाइसेंस की शर्तों का पालन करें, अगर पालन नही करेंगे तो उनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा तो न्यूज चैनल तुरंत अपनी असली भूमिका में लौट जाएंगे। इससे सेंसरशिप लगाने की भयानक गलती से भी सरकार बच जाएगी, क्योंकि सेंसरशिप जैसी संभावित स्थिति का न केवल पत्रकार, बल्कि आम जनता भी विरोध करेगी और तब ये गैर-जिम्मेदार खबरिया चैनल आसानी से जिम्मेदारी से बच जाएंगे। इसलिए लाइसेंस की शर्तों का पालन कराना ही सबसे सही उपाय है।

हम सभी को विशेषकर न्यूज चैनलों को समझना चाहिए कि खबरों की दुनिया नशे का व्यपार नहीं है। नशे का व्यपारी चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग नशा करें और इसके लिए वह पैसे वालों से ज्यादा गरीब तबके को अपने जाल में लेना चाहता है और सस्ते से सस्ता नशा उसे बेचता है। अब हालत यह है कि दीवारों पर होने वाले पेंट भी गरीब के लिए नशाखोरी का साधन हो गया है। उसी तरह गलत, कल्पना की चीजें, धर्म की गलत तस्वीर पेश करने वाली कहानियां, अपराध को ग्लैमराइज करने वाली रिपोर्ट नशे की व्यपार की तरह हैं। जबकि पत्रकारिता चाहे वह प्रिंट की हो या टेलीविजन की, उसका समाज मे महत्वपूर्ण स्थान है।

जितना भरोसा आम लोग संसद में या विधायिका में, कार्यपालिका में या न्यायपालिका में करते हैं उतना ही भरोसा पत्रकारिता में करते हैं। इसीलिए इसे चौथा खंभा कहते हैं, लोकतंत्र को बचाने, उसे बिगड़ने से रोकने और संवारने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की मानी जाती है। यह मान्यता केवल लोकतंत्र में है, तानाशाही में नहीं। हमारा मानना है कि पत्रकारिता को यह जिम्मेदारी निभानी ही चाहिए। जो यह जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, उन्हें पत्रकारिता से हट जाना चाहिए, क्योंकि उस स्थिति में पत्रकारिता लोकतंत्र को संवारने और मजबूत करने की जगह तानाशाही या अराजकता को लाने का औजार बन जाएगी।

आज कई कारणों से लोकतंत्र के आधारों की साख घट रही है। पर अफसोस इस बात का है कि सबसे ज्यादा तेजी से साख का क्षरण पत्रकारिता का, विशेषकर टीवी पत्रकारिता का हो रहा है। सैकड़ों उदाहरण हैं कि टीवी के तथाकथित बड़े स्टार पत्रकार लाइव कर रहे हैं और उनका संवाददाता गलत नाम बोल रहा है, पर ये एंकर कुछ नहीं कर सकते। उनके मेहमान हंस रहे हैं। कारण यह है कि प्रोग्राम लाइव होते नहीं, रिकार्डेड होते हैं और दर्शक को लाइव बता कर मूर्ख बनाया जाता है।

मैं नहीं कहता कि प्रिंट में सब सही हैं, यहां भी पत्रकार हैं जो बिना सत्यापित किए रिपोर्ट लिख देते हैं। एक बड़े अखबार मे शेखावत को लेकर रिपोर्ट छपी। लिखने वाले पत्रकार से मैंने कहा कि आप अच्छे पत्रकार हैं, पर आप गलत रिपोर्ट लिखकर जनता को तो भरमा सकते हैं मगर जिससे जुड़ी रिपोर्ट आपने लिखी है, वह तो जानता है कि सारी बात गलत है। इस तरह आप असानी से बिकाऊ या भटकाऊ पत्रकार मान लिए जाएंगे, जबकि सच्चाई यह नहीं है। लेकिन तुलनात्मक ढंग से देखें तो पाएंगे कि टीवी पत्रकारिता की साख स्काई लैब की गति से सवालिया घेरे में आ गई है।

हमें चेत जाना चाहिए और अपने साथियों को समझाना चाहिए, वे न समझें तो दबाव बनाना चाहिए। यह दबाव ही, अगर कारगर होता है तो सरकार को, चाहे अभी की हो या आने वाली, सेंसरशिप जैसी कानूनी स्थिति बनाने से रोक सकता है। और आखिर में अपने साथियों, खासकर टीवी पत्रकारिता कर रहे साथियों, से मेरा आग्रह है कि अगर वे सावधान नहीं हुए और उन्होंने अपने को नहीं सुधारा तो वे सरकार को सेंसरशिप जैसे कानून बनाने के लिए अपने दरवाजे पर खुश आमदीद लिख देंगे। (साभार : जनसत्ता)


लेखक संतोष भारतीय मशहूर पत्रकार हैं और चौथी दुनिया की दूसरी पारी के भी प्रधान संपादक हैं।

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