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तीसरा स्वाधीनता आंदोलन की आवश्‍यकता क्यों ?

[caption id="attachment_2324" align="alignleft" width="59"]गोपाल रायगोपाल राय[/caption]: मेरी किताब भाग -1 : 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है :  देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है : इसका जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें भारत की वर्तमान परिस्थतियों पर गौर करना होगा। आप जानते हैं भारत दुनिया के नक्‍शे में एक ऐसा देश है जिसके पास अपनी विशेष प्राकृतिक सम्पदायें हैं। एक तरफ विशाल उपजाऊ भूमि है तो दूसरी तरफ खनिज पदार्थों से भरपूर पर्वतीय श्रृंखलाएं, हमारे यहां विशाल जंगल है तो देश भर में फैली नदियों की जल धारा, एक तरफ अभेद्य हिमालय है तो दूसरी तरफ सागर की लहरें हैं। भारत में प्राकृतिक सम्पदा के साथ ही अपार मानवी सम्पदा भी देश के कोने-कोने में प्रचुर मात्रा में बिखरी पड़ी है। हमारे देश में सबसे कठिन से कठिन शारीरिक श्रम करने वाले लोग हैं, वहीं हर तरह की बौद्धिक चुनौतियों का सामना करने वालों की कमी नहीं है।इन प्राकृतिक सम्पदाओं के साथ भारतीयों की बौद्धिक व शारीरिक शक्ति का विवेक व न्यायपूर्ण, समतामूलक सामंजस्य स्थापित कर दिया जाए तो भारत के पास इतनी क्षमता है कि वह न सिर्फ सभी भारतीयों की खुशहाली व जरूरतों को पूरी करते हुए पूर्ण प्रगति कर सकता है बल्कि दुनिया के एक तिहाई भूख व गरीबी से तिलमिला रही मानवता के लिए सहायक भी बन सकता है।

गोपाल राय

गोपाल राय

गोपाल राय

: मेरी किताब भाग -1 : 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है :  देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है : इसका जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें भारत की वर्तमान परिस्थतियों पर गौर करना होगा। आप जानते हैं भारत दुनिया के नक्‍शे में एक ऐसा देश है जिसके पास अपनी विशेष प्राकृतिक सम्पदायें हैं। एक तरफ विशाल उपजाऊ भूमि है तो दूसरी तरफ खनिज पदार्थों से भरपूर पर्वतीय श्रृंखलाएं, हमारे यहां विशाल जंगल है तो देश भर में फैली नदियों की जल धारा, एक तरफ अभेद्य हिमालय है तो दूसरी तरफ सागर की लहरें हैं। भारत में प्राकृतिक सम्पदा के साथ ही अपार मानवी सम्पदा भी देश के कोने-कोने में प्रचुर मात्रा में बिखरी पड़ी है। हमारे देश में सबसे कठिन से कठिन शारीरिक श्रम करने वाले लोग हैं, वहीं हर तरह की बौद्धिक चुनौतियों का सामना करने वालों की कमी नहीं है।इन प्राकृतिक सम्पदाओं के साथ भारतीयों की बौद्धिक व शारीरिक शक्ति का विवेक व न्यायपूर्ण, समतामूलक सामंजस्य स्थापित कर दिया जाए तो भारत के पास इतनी क्षमता है कि वह न सिर्फ सभी भारतीयों की खुशहाली व जरूरतों को पूरी करते हुए पूर्ण प्रगति कर सकता है बल्कि दुनिया के एक तिहाई भूख व गरीबी से तिलमिला रही मानवता के लिए सहायक भी बन सकता है।

इसके उलट आज भारत की क्या स्थिति है? एक तरफ बढ़ती अमीरी की चमक से कुछ लोगों की आंखें चकाचौंध हो रही हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों-करोड़ भरतीयों की आंखों का अपनी गरीबी व मजबूरी पर डबडबा जाना रोजाना की कहानी है। हकीकत तो ज्यादा बदतर है मगर यदि हम सरकारी आंकड़ों की ही माने तो देश में 37.2 प्रतिशत यानी 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है। सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्त कमेटी की रिपोर्ट हमें बताती है कि देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है। कालाबाजारियों के राज में आसमान छूती महंगाई में 20 रू. में करोड़ों लोग कैसे जिंदगी गुजर कर रहें हैं इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे हालात में जी रहे लोगअपने बच्चों को कैसे शिक्षा दे पायेंगे? कैसे उनके स्वास्थ्य की देख-रेख करेगें? उनके भविष्‍य को कैसे बेहतर बना पायेंगे? यह आप खुद सोच सकते हैं। जिन बच्चों को ये किसान-मजदूर अपने स्वयं नंगे व भूखे रहकर किसी तरह इंटरमीडिएट, स्नातक, परास्नातक की शिक्षा दिला भी देते हैं फिर भी उनका क्या हश्र है? इन डिग्रीधारी करोड़ों युवक-युवतियों की आधी उम्र रोजगार की तलाश में कार्यालयों के चक्कर लगाने में गुजर जा रही है। नौकरी न मिलने पर थके-हारे कुछ युवा स्वरोजगार की योजनाएं बनाते हैं जिसके लिए लोन हेतू बैंकों का चक्कर लगाते-2 आधी ऊर्जा खर्च हो जाती है।

कुछ नौजवान शहरों में काम की तलाश में भागते फिर रहे हैं, एक तो उनको काम नहीं मिलता अगर मिलता भी है तो मजदूरी इतनी कम कि शहर में रह पाना मुश्किल है। कुछ नौजवान थक हार कर खेती-बाड़ी में ही अपने को खपाने के लिए लिए बाध्य हो जाते हैं लेकिन हम सभी जानते हैं कि कमर तोड़ मेहनत के बावजूद खेती घाटे का सौदा बन चुकी है। यह ऐसी नीतियों के साजिश का शिकार हो चुकी है कि लागत निकालने के बाद मेहनतना भी नहीं बचता। जिन क्षेत्रों में सुनहरे रोजगार के अवसरों के ढोल बड़े जोर-शोर से पीटे जा रहे हैं उन क्षेत्रों के रोजगार से और हमारे कालेज व विश्‍वविद्यालय की डिग्रियों दूर-2 का कोई लेना-देना नहीं है तथा जिस आईटी, मैनेजमैंट, इंजीनियरिंग व मेड़िकल की डिग्रियों की बदौलत ये रोजगार मिल रहे हैं उनको 20 रु. प्रतिदिन की आमदनी करने वालों के बेटी-बेटियों को हासिल करने की औकात नहीं है। भारत के पास सभी क्षमता रहने के बावजूद अगर 90 प्रतिशत भारतीय इस हालत में घुट-2 कर जीने के लिए मजबूर हैं तो फिर आप ही सोचें कि कौन आजाद है? और कैसी आजादी है? इतना ही नही अगर गहराई में देखें तो हालात और भी बदतर हो चुके हैं। पूरा देश विदेशी व देशी बहुराष्‍ट्रीय कम्पनियों के कब्जे में आता जा रहा है। जिनका मूल मकसद विकास व रोजगार का लॉलीपाप दिखाकर भारत से अधिक से अधिक मुनाफा लूट कर विदेशी बैंको में जमा करना बन चुका है।

आज अंग्रेजों के समय की गुलामी से ज्यादा खतरनाक हालात पैदा हो चुके हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के नाम पर दस-दस हजार एकड़ तक के साढ़े पांच सौ जगहों पर इन कंपनियों द्वारा कम पैसे देकर किसानों को जबरदस्ती बेदखल करके जमीनें हड़पी जा रही हैं। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा व पश्चिम बंगाल के जंगलों के नीचे अपार खनिज पदार्थों का दोहन करने के लिए पूरा जंगल इन कंपनियों को बेच दिया गया है। यहां अनादिकाल से रहने वाले आदिवासियों को बन्दूक की नोक पर जंगल छोड़कर भागने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जो भागने के लिए तैयार नहीं हैं उनको इन कम्पनियों के इशारे पर सरकार सुरक्षा बल या फौज लगाकर गोलियों से शिकार (ग्रीन हण्ट) बनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड में पूरी की पूरी नदियों को ये कम्पनियां खरीद कर अपने कब्जे में कर रही हैं। पेप्सी, कोका कोला जैसी बोतल बन्द पानी की व्यापारी कम्पनियां बेचने के लिए जमीन से इतना अधिक पानी निकाल रही हैं,  जिससे जल स्तर इतना नीचे चला गया है कि लोगों को हैण्ड पम्प से पीने के लिए मिलना पानी मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है। भारत के इतिहास में कभी भी पानी बिकने का उदाहरण नहीं मिलता। लेकिन आज सोलह रुपये लीटर पानी बिक रहा है। अगर 20 रू. दिन भर में आमदनी करने वाला इन्सान भरपेट पानी भी पीना चाहे तो कैसे पी सकता है?

अंग्रेजों के राज में हमारे किसान इतने गुलाम कभी नहीं हुए, क्योंकि उनके पास अपने बीज थे। वे अपनी मेहनत से खेत की जुताई करके अपनी फसल उगा सकते थे। लेकिन आज किसानों के हाथ से बीज छीन लिया गया। वे कम्पनियों से बीज खरीदने के लिए मजबूर हो चुके हैं। इन बीजों के साथ पैदा हुए नये-नये रोगों के लिए दवाईयां खरीदना इनकी मजबूरी बन चुकी है। बड़े-बड़े ख्वाब दिखाती कम्पिनयों के बीजों के चक्कर में आकर बर्बाद हुए लाखों किसानों की आत्महत्या की दास्तान हमारे सामने है। जरा सोचिए! यदि ये विदेशी कम्पनियां बीज देना बन्द कर दें तो हमारी खेती का हाल होगा ? संकट के बादल केवल किसान, मजदूर, छात्र व नौजवानों पर ही नहीं मंडरा रहे हैं बल्कि सबसे ज्यादा खतरा व्यापार तथा लघु व मध्यम उद्योगों पर छाया हुआ है। हर क्षेत्र में घुसपैठ कर रही विदेशी व देशी बहुराष्‍ट्रीय कम्पनियों की पूंजी के सामने छोटी पूंजी से उद्योग करने वालों को अपने आप को टिकाये रखना मुश्किल होता जा रहा है। उनके सामने सिर्फ दो ही विकल्प बचे हैं या तो वो बरबाद हो जाएं या फिर अपने आप को विदेशी  कम्पनियों को सौंप दें। इसका उदाहरण कोल्ड ड्रिंक्‍स के क्षेत्र में देखा जा सकता है।

भारत के अन्दर पेप्सी व कोका कोला के अलावा जितनी भी कम्पनियां थी या तो बर्बाद हो गईं या उन्हें पेप्सी,  कोक ने खरीद लिया। आज बाजार में चाहे किसी भी नाम या रंग की कोल्ड ड्रिंक्‍स मिलती है उसके मालिक पेप्सी या कोका कोला हैं। व्यापार के क्षेत्र में इन बड़ी कम्पनियों के जगह-जगह खुल रहे मॉल रूपी बुल्डोजर ने छोटे-छोटे व्यापारियों के अरमानों को कुचलना शुरू कर दिया है। देश में चौतरफा बढ़ती लूट, बरबादी, बेरोजगारी व गरीबी भारत में कई गुना ज्यादा बढ़ चुकी है। इस लूट के खिलाफ भारतीयों का कोई प्रतिरोध न पैदा हो इसके लिए साम्राज्यवादी गुलाम सांस्कृतिक चेतना का प्रसार चौतरफा किया जा रहा है। जिसके मूल में दो बातें हैं- पहला नैतिक पतन, दूसरा भारतीय समाज में फूट। नैतिक पतन के अभियान के तहत हर इन्सान को स्वार्थी बनाने की कोशिश की जाती है। सबको सीख दी जा रही है कि अगर आगे बढ़ना चाहते हो
तो मेहनत की कमाई से कुछ नहीं होगा। विकास के लिए लूट में शामिल  होने के रास्ते तलाशो! सिर्फ अपने बारे में सोचो! परिवार, समाज व देश के बारे में सोचने की बात बेवकूफी है। इसलिए आज भारतीयों का मूलमंत्र ऊपर से शुरू होकर नीचे तक ‘अपने हिस्से के हिन्दुस्तान को लूटना’ बनता जा रहा है। अपवादों को छोड़ दें तो प्रधानमंत्री से लेकर गांव के चौकीदार तक को किसी भी काम के लिए सुविधा शुल्‍क (रिश्‍वत) चाहिए।

इसके मूल में यह है कि हर आदमी को इतना अनैतिक बना दो कि वह प्रतिरोध के लिए नैतिक साहस ही न जुटा सके। लूट और रिश्‍वत की बदौलत भारत में बढ़ रहा मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा ऊपरी तौर पर भले ही मालदार होता दिख रहा हो लेकिन अन्दर की हकीकत यह है कि तमाम लुभावने सपने दिखाकर तथा इच्छाओं को जगाकर यह बड़ी कम्पनियां मकान, फ्रिज, कूलर, टी.वी, व गाड़ियां आदि-आदि जिन्दगी के लिए ‘अति जरूरी‘ सामान खरीदवाकर अंततोगत्वा सारा माल अपने खाते में ही इकट्ठा कर लेती हैं। उनके पास बचती है सिर्फ जिन्दगी भर लोन की किस्तें चुकाने की रसीदें।भारतीय समाज में फूट डालने के अभियान के तहत भारतीय समाज के विभिन्न धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के विविध समुदायों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करके उनके अन्दर अविश्‍वास पैदा किया जा रहा है। आज उनके विभिन्न ऐजेंटों के द्वारा इस गरीबी को पैदा करने वाली अमेरिकी गैंग की लूट के असली चेहरे को छिपाने के लिए यह प्रचारित किया जा रहा है कि हिन्दू इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि सारी छूट मुसलमानों को दी जा रही है। मुसलमानों को यह समझाया जा रहा कि मुसलमान इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि सब कुछ हिन्‍दुओं के हाथ में हैं।

सवर्णों को समझाया जा रहा है कि तुम इसलिए पिछड़ते जा रहे हो क्योंकि सारा अवसर दलितों और पिछड़ो कों आरक्षण के कारण मिलता जा रहा है। दलितों, पिछड़ों को यह समझाया जा रहा है कि चूंकि वर्षों से सभी जगह अगड़ों का कब्जा है इसलिए तुम आगे नही बढ़ पा रहे हो। मराठियों और असमियों को यह समझाया जा रहा है कि तुम्हारे रोजगार इसलिए छिनरहे हैं कि हिन्दी भाषी तुम्हारे यहां आकर सब हड़प ले जा रहे हैं। यूपी, बिहार वासियों को यह समझाया जा रहा है कि तुम इसलिए पिछड़ रहे हो, क्योंकि दूसरे राज्य तुम्हारा हक हड़प ले रहे हैं। लेकिन यह सच का एक गौड़ पहलू है, असली सच तो यह है कि पूरे देश के हर जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के लोगों का एक बड़ा तबका लगातार गरीब, बेरोजगार बदहाल होता जा रहा है। कोई थोड़ा कम या कोई थोड़ा ज्यादा।

जिसका सिर्फ एक कारण है, भारत की प्राकृतिक संसाधनो व मानवीय श्रम की चौतरफा लूट। इस तरह पूरे देश को बाहर व अन्दर से लूटने का ऐसा गोरखधन्धा जारी है जिससे अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और गरीब होते जा रहे हैं। इसका मूल कारण है भारत में बढ़ती अमेरिकी गैंग का राजनितिक, आर्थिक, सांस्कृतिक नियंत्रण यानी नई साम्राज्यवादी गुलामी। जब तक नई साम्राज्यवादी गुलामी से भारत व भारतीयों को मुक्ति नहीं मिलती तब तक गरीबी से मुक्त, सबकी खुशहाली व विकास का रास्ता नही खुल सकता। इसी लिए गरीबी व गुलामी से मुक्त पूर्ण आजाद, भारतीय जनराष्‍ट्र की स्थापना के लिए शुरू हुआ है तीसरा स्वाधीनता आंदोलन।

लेखक गोपाल राय तीसरा स्वाधीनता आन्दोलन के राष्ट्रीय संगठक है.

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