: शाहन के शाह : वो फकीर ही क्या जो मंदिर और मस्जिद में फर्क करे। किसी भी पूजा या उपासना स्थल पर फकीर को सिर्फ और सिर्फ एक ही शान दिखायी पड़नी चाहिए। इसके अलावा अगर उसे कुछ और दिखने लगेगा तो फिर वह फकीर कैसा। अपने खुदा पर भरोसा रखो, उसके अलावा किसी और के सामने हाथ क्या फैलाना। जब ऊपर वाला ही नहीं चाहेगा तो किसी की क्या मजाल जो वह किसी को कुछ दे सके। अरे फकीरी करनी है तो कफन पहनो और दीन-दुनिया से मुक्त हो जाओ। न किसी से मांगो और ना किसी को कुछ दो। भले ही वह दुआ हो, बद्दुआ। दुआ और बद्दुआ देने का काम फकीर का नहीं। यह काम वे करते हैं जिनके मन में या तो लालच होता है या ईर्ष्या। कुल मिला कर यह, कि फकीर सवाली नहीं हो सकता।
यह ऐलान हुआ बाराबंकी से तो लोग दंग रह गये। यह फकीरी की आम रवायत से बिलकुल अलग। एक महज 13 साल के बच्चे ने जब यह बात ऐलानिया कही तो अचानक किसी को यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन जब कफन पहन कर यह बच्चा पैदल ही सीधे हज करने निकल पड़ा तो लोगों की आंखें फटी की फटी ही रह गयीं। शुरुआत में तो लोगों ने इसे एक बच्चे की जिद समझा, लेकिन इस मासूम बच्चे के अजमेर पहुंचने से पहले ही उसकी ख्याति वहां पहुंच चुकी थी। लोगों का हुजूम उस बच्चे के साथ था, लेकिन अब वह बच्चा बच्चा नहीं, बल्कि लोगों की निगाह में एक पहुंचा हुआ फकीर था। अंदाज बिलकुल औघरेश्वर कीनाराम जैसा, जो बहुत पहले ही कह गये थे कि फकीरी सहज नहीं, पग धरते निकले दूध छटी का। और अब बाराबंकी का यह बच्चा उन फकीरों को छटी का दूध याद दिलाने निकला है, जिनके रोजगार का जरिया घर-घर जाकर सवाल करना होता है, फकीरी नहीं। इस बच्चे का नाम था वारिस अली उर्फ मिट्ठन मियां, जो बाद में हाजी वारिस अली के नाम पर मशहूर हुआ। शाह का ओहदा तो इस शख्स को हर धर्म, मजहब, और फिरकों के स्त्री–पुरूष समर्थकों ने अता फरमाया। और इस तरह इस फकीर का पूरा नाम हो गया हाजी वारिस अली शाह जिसकी दरगाह देवां शरीफ के नाम से दुनिया भर में मशहूर है और सूफी समुदाय के अनुयायियों के बीच बेहिसाब आस्था का केंद्र।
यह बात है सन 1820 यानी इस्लामी तारीख के मुताबिक 1238 हिजरी की पहली रमजान की, जब बाराबंकी के देवां में मिट्ठन का जन्म हुआ। मूलत: ईरान में निशापुर के रहने वाले खानदान के मिट्ठन को हजरत इमाम हुसैन और इमाम हसन की 26 पीढ़ी के तौर पर माना जाता है। तीन साल की उम्र में ही इनके पिता सैयद कुर्बान अली उर्फ दादा मियां और मां चांद बीबी का निधन हो गया। दादी हयातुन्निसां की देखभाल में मिट्ठन पले-बढे़। नाम रखा गया वारिस अली। साढे़ चार साल का होने पर इनकी पढ़ाई शुरू हुई। उस्ताद बने अमीर शाह व मौलाना सैयद मजहर अली। दो साल के भीतर ही मिट्ठन यानी वारिस को पूरी कुरान इन्हें कण्ठस्थ हो गयी। यानी सात साल की उम्र तक वारिस अली हाफिज-ए-कुरान हो गये। बाद की तालीम सैयद खादिम अली शाह ने दी। लेकिन माना तो यह जाता है कि वारिस अली को रूहानी उलूम का दर्जा खुद खुदा ने ही अता फरमाया था। वारिस अली तो पैदाइशी वली-ए-कामिल थे। बहरहाल, दस साल की उम्र में वारिस अली जंगल में चले गये। कई दिन बाद नमूदार हुए।
ग्यारह बरस के होने पर रस्म के मुताबिक सैय्यद खादिम अली ने हाजरी तौर पर अपना खलीफा बनाकर खिलाफत का खर्का दिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद सैय्यद खादिम अली शाह की मौत लखनऊ के गोलागंज क्रिश्चियन कालेज परिसर में हो गयी। उनकी जगह पर अब वारिस अली को चुना गया। इसके बाद से ही वारिस ने अपनी बैंत के दरवाजे सभी धर्मों के लिए खोल दिये। दो साल बाद ही वे हज के लिए लखनऊ से उन्नाव, कानपुर, इटावा, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद, आगरा, फतेहपुर सीकरी होते हुए अजमेर शरीफ पहुँचे। अब तक आपने जूता पहनना छोड़ दिया। हज के बाद उन्होंने नजफ से निसबते अवसिया हासिल की। करबला व बगदाद शरीफ में रियाजत व मुजाहिदा किया। वहां से ईरान, कुसतुनतुनिया, रूस, जर्मनी, अफ्रीका तथा फ्रान्स की यात्रा की। कुसतुनतुनिया में तो वहां के बादशाह सुल्तान अब्दुल मजीद पूरे खानदान के साथ वारिस का अनुयायी बन गया।
अब तक हाजी बन चुके वारिस अली ने कुल 27 बार हज यात्राएं कीं। तीन दिन से ज्यादा किसी के घर ना टिकने वाले वारिस अली के लिए मक्का मदीना, ईरान, ईराक की मुस्लिम इबादतगाहों के अलावा दूसरे मजहबों की इबादतगाहों में कोई भी फर्क नहीं था। वे हर जगह जाते। जहां जाते ईश्वर को देखते और इबादत करते। अल्लाह के अलावा उन्होंने अपनी दिक्कतें न तो किसी को बतायीं और ना ही किसी से कुछ मांगा। पूरा जीवन अविवाहित रहने वाले हाजी वारिस अली को अब तक लोग शाह भी कहने लगे थे। शाहों के इस नायाब शाह ने सभी मजहबों को एक समझा तथा मोहबब्त व एकता का पैगाम देते हुए कहा कि जो रब है, वही राम है। फिर भेदभाव कैसा? यही वजह रही कि उन्हें सभी धर्मों के लोग मानने लगे। वारिस अली शाह ने कभी भी करामात या जादूगरी का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने लोगों के दिलों पर राज किया और खुदा की राह बताते हुए मोक्ष का दरवाजा दिखाया।
यात्रा के दौरान वे अपने साथ लोटा, रस्सी, चाकू और महज एक कपड़े अलावा कुछ नहीं रखते थे। इनकी खास आदतों में था खुदा को एक जानना, हर जगह तन्हा रहना, जरूरत की हर चीज को त्याग देना, खुदा पर भरोसा रखना और जो सफर में मिल जाता वह दूसरों में बांट देना। सादगी पसंद थी। कहते हैं कि नंगे पांव रहने पर भी उनके पैरों में कीचड़ नहीं लगता था। अंदाज ऐसा कि लोग सुधबुध खो बैठें। सादगी का आलम यह उबली घुइयां या भुने आलू से रोजा खोलते थे। पूरी जिन्दगी सादगी से गुजारने वाले हाजी वारिस अली शाह ने सात अप्रैल 1905 में यह दुनिया छोड़ दी। लेकिन अपने अनुयायियों के लिए एक ऐसा पवित्र स्थान छोड़ गये जहां सभी धर्मों के लोग हर साल लाखों की तादात में वारिस अली शाह जैसा बनने का संकल्प लेने आते हैं।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

