
राघवेन्द्र
हमारे देश की सरकार आज भी मध्ययुगीन व्यवस्था में जी रही है, जिसकी पोल मुम्बई के आतंकी हमले में खुल चुकी है। ईश्वर न करे कभी देश को परमाणु हमले की विभीषिका का सामना करना पड़े, यदि ऐसा हुआ तो उसकी तैयारी की भी एक झलक हमारे सामने आ चुकी है। दिल्ली के मायापुरी इलाके में स्क्रैप कोबाल्ट के रेडिएशन से कुछ लोग प्रभावित हुए, जिसे समझने में डाक्टरों को कई दिन लग गये। समझने के बाद चिकित्सको द्वारा उनके इलाज की व्यवस्था किस प्रकार की जाय, समझ नहीं आ पाया। अन्त में भाभा एटामिक रिसर्च सेन्टर की मदद के बाद उक्त समस्या का निदान हुआ। जिसमें काफी दिन लग गये।
जरा हम इस बात की कल्पना करे। मात्र एक मेगा टन का एटम बम यदि कही गिरता है तो तबाही का मंजर क्या होगा। बम गिरने वाले स्थान से छह मील के दायरे में सभी भवन ध्वस्त तथा जितनी भी आबादी होगी, गामा किरणों के कारण मोम की तरह पिघलकर धुएं में विलीन हो जाएगी। उनका पता भी नहीं चलेगा वे कहां चले गये। उक्त विस्फोट से एक आग का गोला बनता है, जिसे यदि कोई पचास मील दूर से भी देख ले तो उसे जीवन भर के लिये धुंधला दिखने लगता है। विस्फोट स्थल से सौ मील के दायरे में तबाही का मंजर बेहद भयावह होगा। लोगों के शरीर आंशिक गले होगे, शरीर की मौलिक्यूलर संरचना टूटने लगेगी, सिर के बाल झड़ने लगेगे तथा उक्त प्रभावित क्षेत्र में लोगों को इस कदर प्यास लगेगी, जो पानी से नहीं भुझेगी। व्यक्ति को लगेगा जीवन से मौत बेहतर।
आज यह समय परमाणु बम उचित है या अनुचित की चर्चा का नहीं है। विषय है देश की निरीह जनता की सुरक्षा का। देश की सरकार विभिन्न कम उपयोगी या बेवजह की योजनाओं पर बेतहाशा खर्च करती है परन्तु अपने समक्ष उत्पन्न होने वाले सम्भावित इस संकट के बारे में विचार करने की चिंता नहीं है उसे। यह बात सत्य है, किन्हीं परिस्थितिओं में पाकिस्तान एटामिक आक्रमण करता है। चाहे वह युद्ध हो या आतंकियो का हमला, पलटवार में भारत ही भारी पड़ेगा लेकिन उन कुछ एक मिनटों में हमारे देश में जान-माल की जो तबाही होगी उसकी कल्पना भी भयकारी है। भारत के दोनों पड़ोसी देश चीन तथा पाकिस्तान परमाणु बम सम्पन्न राष्ट्र है और आज उनकी गलबहियां जगजाहिर है। चीन भी भारत का हितौषी नहीं है। जो पूर्व तथा वर्तमान की कुछ घटनाओं से स्पष्ट हो चुका है। जो अत्यन्त चिन्ता का विषय है।
इस बात को हम किंचित मात्र भी नकार नहीं सकते है कि भारत पर एटम बम आक्रमण का खतरा बराबर बना हुआ है। कोई भी देश या आतंकी संगठन जो वैश्विक स्तर पर अपनी ताकत को दिखाने के लिये कर सकता है। अतः हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते। यह मुमकिन है कि आतंकी संगठनों के पास परमाणु बम आ चुके हो। यदि नहीं भी तो हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में उनकी पहुंच से दूर नहीं है। चूंकि वहां लम्बे समय से अस्थिरता का वातावरण बना हुआ है। कट्टरपंथियों के दबाव में सरकार लगातार है। अमेरिका चाहे जितनी भी कोशिश कर ले या गारंटी ले ले पाक एटम बम की, सब निरर्थक ही है। वहां किसी भी समय कुछ भी घटित हो सकता है।
आक्रमण रूपी विभीषिका भारत पर अचानक ही आयेगी। स्वाभाविक है उनका लक्ष्य राजस्थान का मरूस्थल न होकर घनी आबादी का क्षेत्र ही होगा। हमारे देश की सरकार एटम बम के हमले के विषय पर कानों में तेल डालकर बैठी है। मानो हमलावर उन्हें समय दे तथा बताकर आक्रमण करेगा। अचानक एक मिसाइल एटमबम के साथ भारतीय सीमा को चिरती हुयी अपने लक्ष्य पर गिरेगी और तबाही का मंजर मानव सभ्यता के अन्त तक हमेशा याद रखा जायेगा। हमारी सरकार इस बात को दावे से नकार नहीं सकती कि आतंकियों के पास एटमबम नहीं है। वह विश्व को दहलाने के लिये अमेरिका या अन्य ताकतवर देश हमला करने वाले नहीं। उनके लिये सबसे सुलभ और आसान लक्ष्य भारत ही है। तीन तरफ समुद्री खुली सीमाएं तथा कमजोर सुरक्षातंत्र उनके लिए सोने पर सुहागा होगा। जिस प्रकार आतंकियो ने मुम्बई पर हमलाकर सम्पूर्ण विश्व को अपनी अराजकता के संदेश को भेजने का कार्य किया, वे इसी प्रकार का कुछ एटमबम विस्फोट से भी घटित कर सकते है।पाकिस्तान का परमाणु बम चाहे जितनी भी सुरक्षा में हो, वहां की सरकार ही आतंकियो से पूरी तरह असुरक्षित है। पाक में उक्त बम की सुरक्षा बेईमानी सी लगती है।
हमारे देश की भारत सरकार को चाहिये उक्त विभीषिका से निपटने के लिये ईमानदारी से समाज के निचले स्तर से ऊपर की ओर जागरूकता अभियान चलाये। समाज को उसकी भयंकरता, सम्भावित सुरक्षा तथा उपचार के तरीके बताने चाहिये। जो विभिन्न प्रचार माध्यमों से हो सकते है। उपचार की औषधियां निःशुल्क या अत्यधिक कम कीमत पर सरकारी अस्पतालों तथा दवाखानों में पर्याप्त मात्रा में हमेशा उपलब्ध रहे। जिसे व्यक्तियों को अपने घरों में पहले से रखने का आग्रह सरकार द्वारा बराबर किया जाना चाहिये। इस कार्य में स्वयं सेवी संस्थाओं की भी मद्द ली जा सकती है। चूंकि एक बार रेडिएशन फैलने के बाद बचे हुये लोगों का इलाज किसी भी तरीके से सरकार नहीं कर सकती। अतः उसे अपनी योजना का विकेन्द्रीयकरण करना चाहिये। उक्त समस्या के इलाज हेतु स्वयं व्यक्ति को सरकार द्वारा इतनी जानकारी उपलब्ध करायी जाये कि वह कम से कम अपनी तथा अपने परिवार की आकस्मिक चिकित्सा कर सके। इस सम्भावित विभीषिका का सामना करने के लिये सरकार को देश की जनता का मानस ईमानदारी से बिना किसी राजनैतिक सोच या हानि लाभ के बनाये रखना चाहिये। इस विषय पर पक्ष-विपक्ष या अन्य सहयोगी पार्टियों को भी सरकार का पूरा सहयोग करना चाहिये।
उक्त एटमबम तबाही से पहले यह नहीं भेद करेगा कौन सरकार तथा कौन विपक्ष, वह अमीर तथा गरीब भी नहीं देखेगा, उसे हिन्दू तथा मुसलमान भी नहीं नजर नही आयेगे और न ही दिखेगा पंथ तथा मजहब की आड़ में एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखने वाले। वो सभी को एक ही झटके में अपनी कठोर एवं निष्ठुर मारक क्षमता का एहसास करा देगा तथा दे जायेगा हमेशा के लिये न भूलने वाली वेदना भरी असहनीय पीड़ा। ऐसा नहीं है कि बम तबाही के तुरन्त बाद सब कुछ ठीक हो जायेगा। उक्त बम विस्फोट आगे आने वाली पीढ़ी को कैंसर, ल्यूकेमिया जैसी घातक बीमारी का असीमित वेदना देता रहेगा। कुल मिलाकर जो लोग उक्त तबाही से जिन्दा बच भी गये, उनकी आगे की नस्लें भी लम्बे समय तक तबाह रहेगे।
पाकिस्तान की सरकार को भी चाहिये चूंकि आणविक बम मानव सभ्यता के प्रश्न चिन्ह के रूप में उभरा है। अतः उसे पूरी संजीदगी से इस विषय पर चिन्ता करनी चाहिये। उसे इस विषय पर पूरी ईमानदारी से ध्यान देना चाहिये कि किसी प्रकार भी गैर जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था के हाथ में वह न पड़ने पाये। जिससे अनर्थ की सम्भावना हजार गुना बढ़ जायेगी। इस विषय पर वह भारत के साथ मिलकर साझी योजना भी बना सकते है। चूंकि उक्त विषय से भारत ही सबसे अधिक प्रभावित होने वाला है।
अतः उसे भी पूरी निष्ठा से सहयोग देना चाहिये। पाकिस्तान को बेवजह अपनी राजनैतिक, भौगोलिक तथा आर्थिक कमजोरियों को कम से कम भारत से नहीं छिपाना चाहिये। ईमानदारी से उससे चर्चा कर सहयोग की अपेक्षा करनी चाहिये। निश्चित ही व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के लिये अपनी कमजोरियों को छिपाना अन्त में कष्टदायक ही होता है। कष्ट के समय उसे समय रहते किसी को उसका भागीदार न बनाने की भूल याद आती है। किन्हीं भी कारणों से भारत पर एटामिक आक्रमण हुआ। पलटवार में पूरा पाकिस्तान इतिहास में बदल जायेगा। दोनों देशो में तबाही का वह मंजर होगा, जिसे देखकर प्रकृति भी कांप उठेगी। इसलिये दोनों देशों को चाहिये अपनी जनता के हितों की रक्षा के लिये पूरी जिम्मेदारी तथा ईमानदारी से अपने-अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करें।
लेखक राघवेन्द्र सिंह पत्रकार हैं.

