देश में नरपशुओं की पैदावार बढ़ाने को बना नया कानून!

लीजिए मुलाहिजा फर्माइये, देश में एक नया कानून लागू होने जा रहा है। जिसका मसौदा ‘मातृत्व सुविधा संशोधन विधेयक’ परसौं 11 अगस्त के दिन राज्यसभा ने पारित कर दिया है। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। इसके तहत अब देशभर में कामकाजी गर्भवती महिलाओं को 26 हफ्तों (6 माह) का मातृत्व अवकाश वेतन सहित मिल सकेगा। यह नियम सभी सरकारी संस्थानों के अलावा 10 से अधिक कर्मचारियों वाले निजी उपक्रमों पर भी बाध्यकारी होगा। देश के कानून में अभी केवल 12 सप्ताह के अवकाश का प्रावधान है। इस नये कानून के लागू होने के बाद अवकाश की अवधि की दृष्टि से भारत दुनिया में तीसरी पायदान पर पहुँच जायेगा। अभी तक अधिकांश विकसित देशों में इतनी लंबी छुट्टी का प्रावधान नहीं है। नये प्रावधान से देश की 18 लाख कामकाजी महिलाओं को लाभ होगा।

इस विधेयक पर चर्चा के दौरान महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी का कहना था कि परिवार लगातार छोटे होते जा रहे हैं। इससे नवजात शिशु को माँ का पूरा समय मिलने से उनके सम्बंधों में प्रगाढ़ता आयेगी और बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करने में मदद मिलेगी। विधेयक में बच्चे को गोद लेने वाली या किराये या उधार पर कोख देने वाली (सोरोगेट) माता की मदद से बच्चा हासिल करने वाली माँ को भी यह मातृत्व सुविधा दिये जाने का प्रावधान किया गया है। हालांकि अभी इसमें अपनी कोख में सोरोगेट माता के रूप में बच्चा पालने वाली महिलाओं को शामिल नहीं किया गया है।

यह विधेयक एकतरफा सोच का परिणाम है। यह नया कानूनी प्रावधान देश में नरपशुओं की पैदावार बढ़ाने और मखमल पर टाट के पैबंध लगाने जैसा है। क्यों? क्योंकि इससे बुजुर्गों को त्याग कर केवल दो सदस्यीय परिवारों तक सीमित रहने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। छः महीने तक बिना कोई काम किये मुफ्त का वेतन पाने की आशा से दिन-प्रतिदिन बुजुर्गों की देखभाल करने वाले जिम्मेदार युवाओं की संख्या घटेगी और बुजुर्गों की समस्याऐं बढ़ती जायेंगी। देखभाल ठीक नहीं हो पाने से एक ओर परिवार के वरिष्ठ नागरिक परेशान रहेंगे तो दूसरी तरफ एकल परिवार के बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से समाज के जिम्मेदार नागरिक बिल्कुल भी नहीं बन पायेंगे। बुजुर्गों के संरक्षण के अभाव में उन्हें घर-परिवार से लेकर देश व समाज के प्रति जिम्मेदारी का अहसास तथा अपनी सभ्यता-संस्कृति, रीति-रिवाजों की जानकारी कौन देगा? फिर मेनका गांधी और उनकी सरकार को केवल 18 लाख कामकाजी महिलाओं की चिन्ता है 28 करोड़ बुजुर्गों की नहीं।

मेनका गांधी को नवजात शिशु को माँ का पूरा समय न मिल पाने से उनके सम्बंधों में प्रगाढ़ता न आ पाने और बच्चों में कुपोषण की समस्या की तो चिन्ता है लेकिन इसके बरअक्स बुजुर्गों से युवाओं तथा बच्चों के संवाद, सम्बंधों तथा उनकी देखरेख की चिन्ता किसे होनी चाहिए? बुजुर्गों की उपेक्षा के कितने भयावह परिणाम आने वाले समय में इस देश व समाज को भोगने पड़ेंगे, इसका अन्दाजा लगाने और उनके निराकरण की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए?

पश्चिमी देशों में वर्षों के शोध में पाया गया है कि अधिकांश एकल परिवारों के बच्चे खुदगर्ज, अनुशासनहीन, बेपरवाह, गैर-जिम्मेदार, उछृंखल, परपीड़क (सैडिस्ट), आत्म-केन्द्रित और कुंठित मनोवृत्ति के शिकार होते हैं। ऐसी अस्वस्थ मानसिकता वाले बच्चे विशुद्ध नरपशु का नमूना नहीं तो और क्या कहे जाने चाहिए? मानवीय संवेदनाओं से रहित सिर्फ एक जीता-जागता रोबोट! अभी जिस तरह वैध-अवैध अंधी कमाई वाले नव-धनाढ्य वर्ग तथा नेताओं के बिगड़ैल बच्चे पुलिस-प्रशासन और अन्य लोगों के लिए सिरदर्द साबित हो रहे हैं क्या हमें ऐसे ही लोगों से भरपूर सामाजिक संरचना की आवश्यकता है? घटिया दर्जे की यह एकांगी कोरी आधुनिकता हमें कहाँ ले जाकर पटक देगी, इस पर देश के कर्णधार नहीं तो और कौन सोचेगा?

श्यामसिंह रावत
वरिष्ठ पत्रकार
ssrawat.nt@gmail.com

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