देश में लोकतंत्र के क्षरण की पटकथा हम सबने मिलकर लिखी है!

श्यामसिंह रावत

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इन तीन स्तभों पर टिका देश का लोकतंत्र समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत सबके लिए समान अवसर, समान न्याय, समान दर्जा, स्वतंत्र मतदान, अभिव्यक्ति की आजादी आदि जैसे तमाम नैतिक आदर्शों की गारंटी तो देता है लेकिन क्या व्यवहार में ऐसा है भी?  विधायिका का हाल यहाँ तक आ पहुँचा है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत के 535 निर्वाचित सदस्यों में से 241 दागी निकले और संसद में पैसे लेकर सवाल पूछे जाने लगे। सरकारी खर्च पर इनके ठाट-बाट, वेतन-भत्तों और अन्य सुविधाओं में बेतहाशा वृद्धि और वहाँ पहले की अपेक्षा अधिक डिग्री वालों के होने के बावजूद चालू सत्र में बैठने वालों का टोटा और सदन में काम के घंटों में गिरावट साफ देखी जाती है। जनप्रतिनिधियों का काम जनसेवा नहीं बल्कि सरकारी धन की लूट और देश के संसाधनों पर डाका डालना भर रह गया है। ऐसी ही तमाम बातों से पता चलता है कि विधायिका के स्तर में गिरावट आई है।

कार्यपालिका के भ्रष्टाचार के महासागर में आकंठ में डूबने, लालफीताशाही, जबावदेही का न होना, दायित्व-निर्वहन में लापरवाही, कार्य-संस्कृति का अभाव, धूर्त नेताओं व अपने से बड़े अधिकारियों तथा प्रभावशाली लोगों की चमचागिरी और उनके दबाव में कानून से खिलवाड़ करने आदि सम्बंधी शिकायतें पुरानी पड़ चुकी हैं। कर्तव्यबोध तो जैसे सरकारी तंत्र में सिरे से ही गायब हो चुका है। सूचना का अधिकार जैसा पारदर्शी कानून अब उतना असरदार नहीं रह गया है क्योंकि इससे बच निकलने का जुगाड़ भी कर लिया जाता है। देश भर में गरीब-गुरबे, साधनविहीन, वंचितों और शोषितों की सहायता के स्थान पर उनका हर स्तर पर तिरष्कार, अन्याय, लूट-खसोट, हिंसा आदि सम्बंधी घटनाओं में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है। पहले कभी सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार की बातें सुनने में आती थी, परन्तु अब साफ दिखाई दे रहा है कि सरकार केवल भ्रष्टाचार के लिए ही है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इस देश में सरकार नाम की कोई चीज है ही नहीं।

जहाँ तक न्यायपालिका का प्रश्न है, वहाँ भी नैतिक मूल्यों, आदर्शों, मर्यादाओं तथा दायित्व निर्वहन की भावना का क्षरण हुआ है। कर्तव्यपालन में शुचिता का अभाव लगातार बढ़ता दिखाई देता है। जब-तब उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों तक पर न केवल रिश्वत लेकर फैसले लिखने के आरोप लगते रहे हैं, बल्कि उन पर महाभियोग तक चले हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे भी कापुरुष निकले जो ऐसी नौबत आने से पहले ही त्यागपत्र देकर भाग खड़े हुए। पहले लोग न्यायालयों के निर्णयों पर टीका-टिप्पणी करने से बचते थे। अब सर्वोच्च न्यायालय तक के फैसलों को लेकर लोग सार्वजनिक तौर पर तीखी आलोचना करने में भी नहीं हिचकते। जिला अदालतों से लेकर उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय तक में मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। जिससे आमजन के लिए न्याय दिन-प्रतिदिन महंगा और पहुँच से बाहर होता जा रहा है। लोगों में यह धारण बढ़ती जा रही है कि न्यायालयों में सत्य का असत्य से नहीं बल्कि झूठ का महाझूठ से मुकाबले में अमूमन सत्य को ही पराजित होना पड़ता है क्योंकि वहाँ भी पैसे और पहुँच की जरूरत होती है। जिसके पास यह दोनों ही नहीं होते वह न्याय से वंचित रह जाता है।

स्वयं को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ और प्रहरी होने का दावा करने वाला प्रेस जिन नैतिक मूल्यों और आदर्शों की दुहाई देता है, उनकी उपेक्षा वह खुद ही करता है। पहले अखबारों के मालिक कोई दूसरा व्यवसाय नहीं करते थे, अब देश के उच्चस्तरीय औद्योगिक घरानों, पूंजीपतियों और वोट जुगाड़ू राजनीतिबाज नेताओं ने इस क्षेत्र पर भी कब्जा कर लिया है। मालिकों की अधिक धन-लोलुपता के कारण इनके द्वारा किये जाने वाले शोषण के चलते अखबारों व चैनलों में काम करने वालों की दुश्वारियां बढ़ी हैं। संपादक का नाम वहाँ केवल उसकी मौजूदगी का संकेत भर होता है जबकि वह संपादन के बजाय मालिकों के हित-साधन के अन्य कामों में लगा रहता है। पत्रकारों के लेखन पर मालिकों-संपादकों का अंकुश बढ़ गया है जिनके व्यावसायिक हित विभिन्न राजनैतिक दलों व उनके नेताओं, उद्योगपतियों तथा अन्य प्रभावशाली लोगों व अपराधी गिरोहों से ही नहीं बल्कि विदेशी धनकुबेरों तक से जुड़े रहते हैं। इनके लिए कुछ संपादक-पत्रकार पत्रकारिता की आड़ में लॉबीइंग करते हैं। अपनी दलगत सेवाओं की बदौलत ही कई पत्रकार राज्यसभा की सदस्यता तो कुछ विभिन्न खेल संगठनों या अन्य मलाईदार जगहों पर ऊँची कुर्सी हथियाने में कामयाब हो गये। यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।

यदि गंभीरतापूर्वक विचार कर देखा जाये तो लोकतंत्र का अर्थ ही है–लोक का तंत्र अर्थात् जनता की, जनता के लिए, जनता की शासन व्यवस्था। परन्तु भारत में इस अवधारणा का मूल तत्व ‘लोक’ ही अपनी भूमिका के निर्वहन में असफल सिद्ध हुआ है। अब तक का अनुभव बताता है कि एकाध बार को छोड़कर, जब भी इसे अवसर मिला, यह या तो यथास्थितिवाद का शिकार हो गया या फिर सांपनाथ के बदले नागनाथ को  सत्ता सौंप कर सो गया। इसने कभी यह सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं की कि जिन्हें वहाँ भेज कर उसने आफत मोल लेने की गलती की थी, उन्हें सत्ता से दूर रखने में ही उसकी भलाई है। इससे उसकी अपनी ही मुश्किलें बढ़ी हैं। इससे भी देश में राजनीतिक अस्थिरता, अराजकता, विकास के नाम पर संसाधनों की लूट-खसोट, महंगाई, दबंगई, जघन्य अपराधों के साथ ही गरीब की गरीबी और अमीर की अमीरी में वृद्धि, जन-सरोकारों की उपेक्षा आदि विभिन्न कारणों से आम आदमी की समस्याओं में बढ़ोतरी हुई है। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि धन-साधन व पहुँच विहीन का जीना मुश्किल होता जा रहा है।

यदि देखा जाये तो यह परिदृश्य हमारे लोकतंत्र के क्षरण की पटकथा है, जिसे तैयार करने में हम सब सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं। ऐसा कदापि नहीं है कि इस घटाटोप अंधकार से मुक्ति का मार्ग है ही नहीं। है, अवश्य है। यदि प्रयत्न किया जाये तो हमें सर्वत्र सुख-शांति, समता, उन्नति का राजपथ अवश्य मिल सकता है। इसके लिए हमें एक राष्ट्रीय इकाई और सभ्य समाज के तौर पर जाति, मजहब, क्षेत्र, अपना-पराया आदि भेदभावों को तिरोहित कर एक स्वस्थ समाज के मानक अपनाने होंगे। यह आजादी हम पर स्वतंत्रता की बेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले हमारे अपने पूर्वजों का ऋण है, इससे उऋण होने के लिए जरूरी है कि हम उनके सपनों का भारत बनायें। जयहिंद!

Shyam Singh Rawat
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