मेरा रंग दे बसंती चोला… गीत से लोगों में जोश और ओज भरने वाले बाबा रामदेव रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के दौरान कायरता क्यों दिखा गए? उन्हें खाकी वर्दी के खौफ ने ऐसा करने विवश किया या फिर अचानक हुई पुलिसिया कार्रवाई में वे डर गए और आपा खो बैठे। उनका मंच से कूदना, लोगों में शामिल होना, भीड़ में गुम होना फिर महिलाओं के वस्त्रों में मिलना यह सब क्या था? गेरुआ लंगोटी वाले बाबा को बाद में झक सफेद कपड़ों में जिसने भी देखा हैरान रह गया। उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी और तमतमाए क्रोध में उनसे बोलना मुश्किल हो रहा था। हरिद्वार में अपने आश्रम में पत्रकार वार्ता के दौरान उनके आंसू भी निकल आए इसके बाद वे जो बोले उससे लोगों को उनके प्रति सहानुभूति उपजी जिसकी दरकार कहां थी? अपने योग कार्यक्रमों में वे लोगों में देशभक्ति का जज्बा भी पैदा करते रहे हैं।
भारत माता की जय-जयकार कराने वाले बाबा की राष्ट्रभक्ति पर कोई संदेह नहीं लेकिन वे उस जुल्मोसितम वाली रात में लाला लाजपत राय की तरह पुलिसकर्मियों के सामने डट जाते तो क्या होता? सच मानें उनके जैसा हश्र तो कदापि नहीं होता फिर क्यों डर गए बाबा? वे तो खुद कहते रहे हैं कि उन्हें मौत से कोई डर नहीं लगता और वे हर हर खतरे का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। माया, मोह, लोभ, यश और अपयश से उन्हें कोई सरोकार नहीं है क्योंकि वे तो संन्यासी है। भरी जवानी में उन्होंने घर छोड़ दिया था। अरबों रुपए की ट्रस्ट की संपत्ति से उनका कोई मतलब नहीं है। उनके दावे के मुताबिक उनका कोई बैंक खाता नहीं है फिर बाबा पुलिस दस्ते के सामने क्यों नहीं डटे? जान जाती तो चली जाती वे जन-जन के नायक बनकर उभरते। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका यह अभियान राष्ट्र अभियान बन जाता। यह सब नहीं हो सका क्योंकि बाबा पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए। उनकी जिंदगी में यह पहला मौका था, लेकिन वे अपनी शूरवीरता साबित नहीं कर सके और सांसों को बचाने की कवायद में वह कर बैठे जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी।
देश की सवा अरब की आबादी का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले बाबा क्यों नहीं सीना तानकर खड़े हुए, उन्हें क्या डर था? अपमान, पिटाई या फिर मौत के भय ने उन्हें इतना भीरू बना दिया कि भाग खड़े हुए। उनके आदर्श तो महान शहीद चंद्रशेखर है क्या उस समय उन्हें वे याद नहीं आए? फांसी के फंदे पर झूलने से पहले उनके चेहरे की वह मुस्कान भी नहीं दिखी, याद नहीं आए होंगे भगत सिंह और रामप्रसाद बिस्मिल के चेहरे। घटना के बाद बाबा नायक तो नहीं रहे, कुछ लोगों ने उनकी छवि खलनायक के तौर पर जरूर पेश की लेकिन संन्यासी को इन सबसे कोई सरोकार नहीं रखना चाहिए। संभव है बाबा भी इससे इत्तेफाक रखते हों। उम्मीद है कुछ संयत होने के बाद बाबा इन सवालों के जवाब देंगे।
अब तस्वीर के दूसरे पक्ष की कुछ बातें। रामलीला मैदान में अब शांति है, देश या दिल्ली को अब कोई खतरा नहीं, केंद्र और दिल्ली की सरकार अब निश्चिंत होकर राजकाज के काम निपटा सकती हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ सत्याग्रह कर रहे हजारों लोगों को रात में जानवरों की खदेड़ने वाली दिल्ली पुलिस और उनसे यह धत्तकर्म कराने वाले इस सफलता से खुश हुए होंगे। भ्रष्टाचार के खिलाफ उपवास रखकर सत्याग्रह करने वाले देश से दूर दराज के हिस्सों से आए लोगों से दिल्ली को खतरा हो गया था ना? बेवजह के खतरे को टालने के लिए पुलिस की उस कार्रवाई की जितनी भर्त्सना की जाए कम है। पुलिस दिल्ली की हो या पंजाब, हरियाणा या किसी भी हिस्से की उसका काम आदेश का पालन करना होता है, लिहाजा वहां पुलिस ने वही किया जो उसे आदेश दिया गया। यही पुलिस देश की व्यवस्था को पंगु बनाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं कर पाती, क्या उसे ऊपर से आदेश नहीं मिलते?
हाल में राजस्थान में हुए गुर्जर आंदोलन और हरियाणा में जाट आरक्षण के उदाहरण हमारे सामने है, किस तरह से उग्र और हथियारबंद लोगों ने देश की शासन व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करके रख दिया। अंत में न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। दोनों मामलों में मांगें मंजूर हुई और बिना पुलिस के ही मामला निपट गया। तब क्यों नहीं संबधित राज्यों की पुलिस ने कार्रवाई की? क्यों नहीं रात के साए में पुलिस ने कार्रवाई की? इसलिए क्योंकि वे हथियारबंद लोग मरने-मारने और कुछ भी करने पर आमादा थे। उनसे तो हिंसा या अराजकता का खतरा भी था, पर दिल्ली के सत्याग्राहियों से क्या खतरा था जो दिन उगने का भी इंतजार नहीं किया और रातों रात हजारों लोगों जानवरों की तरह पीट-पीट कर भगा दिया। आंदोलन को कुचलने के बाद सफलता पर मंद-मंद मुस्कुराने वाले जान लें व्यवस्था बदलने के लिए ऐसे ही निहत्थे लोग क्रांति के सबब बनते रहे हैं।
लेखक महेंद्र सिंह राठौड़ पत्रकारिता जुड़े हुए हैं.

