निजी क्षेत्र में क्‍यों नहीं है आरटीआई का प्रावधान?

बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर के जयन्ती के अवसर पर “आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन ऑफ इण्डिया” द्वारा लक्ष्मी नगर में “यदि आज अंबेडकर जीवित होते”  विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में संस्था के महासचिव गोपाल प्रसाद (आरटीआई एक्टिविस्ट) ने कहा कि यदि आज अंबेडकर जीवित होते तो वे निश्चित रूप से दलितों को सूचना का अधिकार प्रयोग करने, आरटीआई एक्ट को सशक्त करने तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून में कठोर प्रावधान अवश्य करते. वास्तव में सूचना का अधिकार (RTI) का अधिकाधिक प्रयोग करके ही भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं को उजागर किया जा सकता है. भ्रष्टाचारियों  को नकेल डालकर ही कानून का भय बनाया जा सकता है. जब तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनहित हेतु आरटीआई एक्ट को और अधिक शक्ति नहीं दिया जायेगा तब तक कानून तोड़नेवालों के दिल में कानून के प्रति सम्मान कैसे हो सकता है?

वास्तव में कानून का सम्मान ही भारतीय संविधान निर्माता डा. भीमराव अंबेडकर का सम्मान है और यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी. कालाधन वापस लाने एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन का सबसे अधिक फायदा दलितों, शोषितों एवं उपेक्षितों को होगा. हमें जनजागृति लानी होगी कि आज हमें सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, रोजगार का अधिकार आदि प्राप्त है. चिंता का विषय यह है कि इसके बारे में आम जनता को अभी भी जानकारी प्राप्त नहीं है. हमें सरकार पर निर्भर रहने के बजाय स्वैक्षिक स्तर पर जनजागरण के माध्यम से इस आन्दोलन को तेज करना होगा. जब जनता जागेगी तो बदलाव अवश्य आएगा. आन्दोलन और जनजागृति में अन्योनाश्रय सम्बन्ध है अर्थात ये एक दूसरे के पूरक हैं.

सन 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन अभियान में लगभग 5 फीसदी लोग ही शामिल थे और उसी की बदौलत हमने ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंका था. आज भी पांच प्रतिशत जनता इस आन्दोलन के सहभागी बन जाएँ तो बदलाव आने में कोई विलम्‍ब नहीं होगा. अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल विधेयक लागू करने हेतु आमरण अनशन की सफलता इसका प्रत्यक्ष उदहारण है. हमें मौन रहने के बजाय अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रतिकार करने की क्षमता लानी होगी. जब शोषित समाज आवाज उठाएगी तभी हुक्मरान सही कदम उठाने को मजबूर होगा और इसके लिए हमें दूसरों की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं पहल करना होगा. दलित भागीदारी के बिना कोई आन्दोलन मानवाधिकार आन्दोलन नहीं हो सकता. इसके लिए बौद्धिकता और तर्क को विकसित करना होगा.

आज यदि अंबेडकर जीवित होते तो निश्चित रूप से निजी क्षेत्र में आरटीआई का प्रावधान लागू करने एवं कालाधन जमा करने वालों पर सख्त कानून बनाते. क्या निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार नहीं है? भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट नौकरशाह एवं भ्रष्ट उद्योगपतियों की तिकड़ी ने अपराधियों के बलबूते निर्दोष जनता के हक़ को छीनकर बुनियादी सुविधाओं एवं विकास के मद के सरकारी कोष में हेराफेरी से प्राप्त धन को देश से बाहर एवं देश के अन्दर अन्य नाम से जमा कर रहे हैं. यही कालाधन है. सरकार को इसपर टैक्स लगाने के बजाय बिहार और मध्‍य प्रदेश्‍ा की तरह पूर्णतः जप्त कर जनहित मद में प्रयोग करने का प्रावधान बनाना चाहिए. अब तक 40- 45 आर्थिक समितियों एवं आयोगों द्वारा किये गए विश्लेषण के बाद भी आज तक कोई भी सरकार इस कालाधन को प्राप्त करने एवं देश की बुनियादी आवश्यकताओं में इसका उपयोग करने कि पहल क्यों नहीं की?

हमारे राजनेताओं में इच्छाशक्ति की कमी तथा नीति एवं नीयत में खोट रहने के कारण समस्याएँ घटने के बजाय बढ़ रही हैं. कालेधन की अर्थव्यवस्था न होती तो आज हम जापान और चीन को पीछे छोड़कर विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश का गौरव प्राप्त कर पाते. भ्रष्ट देशों की सूची में हमारे देश का नाम ऊँचे पायदान पर नहीं होता. आज आंबेडकर जीवित होते तो निश्चित रूप से संविधान में संसोधन के बजाय समसामयिक समस्याओं के मद्देनजर नया संविधान लिखते. अपनी बातों के समर्थन में होसंगाबाद (म.प्र.) के सजीवन मयंक के गीत “नया विधान लिखें”  का अवश्य जिक्र करना चाहूँगा जो काबिलेगौर है :–

हमने अपने संविधान में इतने संशोधन कर डाले,
बेहतर हो हम सब मिलजुलकर अपना नया विधान लिखें..
हर कुटिया को मिले उजाला,
हर बचपन को प्यार मिले,
सबकी जाति हो हिन्दुस्तानी,
जन- जन को अधिकार मिले,
हर बच्चे को मिले खिलौना सबके घर हो नरम बिछौना.
हर मुखड़े पर भारतवासी स्वाभिमान प्रतिमान लिखे,
कल की बातें वर्तमान में,
अक्सर छल कर जाती हैं,
परिवर्तित बातें जीवन में,
सब कुछ हल कर जाती हैं,
अपनी भूलें सुधारे खुद ही औरों से क्या लेना है.
हर मंदिर हर भाषा में हम सबका भगवान लिखें..
राजनीति का अर्थ देश को,
स्वर्ण सवेरा देना है,
आजादी को इस आँगन में,
अटल बसेरा देना है,
यह माटी हम सबकी जननी इसका नव श्रृंगार करें.
सभी जाति के लोग नाम के आगे बस ‘इन्सान’ लिखें..

लखनऊ के प्रो. ओमप्रकाश गुप्त ‘मधुर’ के गीत “कौन श्रेष्ठ कह सकता है?” में हमारे वक्तव्यों की झलक दीख पड़ती है :–

भारत के इस लोकतंत्र को, कौन श्रेष्ठ कह सकता है,
लोक जहाँ पर लोप हुआ, क्या तंत्र शेष रह सकता है?
नेताओं नौकरशाहों में ऐसी हुई जुगलबंदी,
व्यापारी दोनों हाथ से लूट रहे कह कर मंदी,
आम नागरिक भूखा नंगा, ठोकर ही सह सकता है,
लोक जहाँ पर लोप हुआ, क्या तंत्र शेष रह सकता है?
शासन तो दुष्यंत बना, जनता बन बैठी शकुंतला,
भोग लिया फिर भूल गया, अपने महलों की ओर चला,
जनता की आँखों के बदव में, सागर दह सकता है,
लोक जहाँ पर लोप हुआ, क्या तंत्र शेष रह सकता है?
वोटों के सौदागर देते जाति-पांति के आरक्षण,
प्रतिभा को पीलिया हुआ है, लकवाग्रस्त हुआ है शिक्षण,
एक सुनामी और हुई तो, तंत्र -मंत्र दह सकता है,
लोक जहाँ पर लोप हुआ, क्या तंत्र शेष रह सकता है?

अजीत शर्मा ‘आकाश’ (जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी,इलाहबाद) के गजल में अंबेडकर के सूत्रवाक्य नजर आते हैं :—

नाम अत्याचार का जड़ से मिटाएगी जरूर,
देख लेना क्रांति की लहर आएगी जरूर,
राख़ में लिपटी हुई ये आग हवा चलते ही,
एक न एक दिन शोषकों का घर जलाएगी जरूर,
आज तो सूरत प्याला जहर का पी जाएगा,
कल मगर उसको ये दुनिया सर नवाएगी जरूर.
रख सकोगे कब तलक वंचित ये जनता एक दिन,
तय समझ लो अपना हर अधिकार पाएगी जरूर,
एक बेंजामिन मरेगा जन्म लेंगे सैकड़ों,
उन्हें सरकार फांसी पर चढ़ाएगी जरूर,
अब बगावत पर उतर आओ, सुनो अहले चमन,
ये खिजां वर्ना सितम तुम पर भी ढायेगी जरूर,
संगठित होकर दिखा दो, संगठन में शक्ति है,
जो विरोधी शक्ति होगी मुंह की खाएगी जरूर,
मांगने से यदि न मिल पाए तो बढ़कर छीन लो,
हर सफलता खुद-ब-खुद कदमों में आयेगी जरूर,
हौसला तूफान से लड़ने का होना चाहिए,
सीना-ए-दरिया पे कश्ती डगमगाएगी जरूर.

नवलगढ़ (राजस्थान) के ओमप्रकाश व्यास की चार पंक्तियाँ हमारे लिए प्रेरक है :–

देश आतंक से घिरा है, अब तो उसपर ध्यान धर,
छेड़ मत फिल्मी तराने,  देशभक्ति का गान कर,
मिट रही अपनी विरासत, नष्ट हो रही संस्कृति,
इन सभी को बचाना, राष्ट्रीयता का पान कर.

लेखक गोपाल प्रसाद आरटीआई एक्टिविस्‍ट हैं.

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