निराशा के दौर में उम्मीद के सपने : राजनीतिक शून्‍यता की उपज है अन्‍ना आंदोलन

‘यह आधी जीत है, आधी बाकी है। अनशन अभी स्थगित हुआ है, छूटा नहीं है।’  मतलब साफ है। न अन्ना जीते हैं और न भ्रष्टाचार हारा है। लड़ाई जारी रहेगी। यह पड़ाव है। अभी जन लोकपाल के मात्र तीन बिन्दुओं के प्रस्ताव को संसद ने पारित किया है, वह भी आंदोलन के दबाव से। स्टैण्डिंग कमेटी क्या रुख लेती है, यह आगे की बात होगी। अन्ना की आगे की राह आसान नहीं। पटाखे फोड़ने और जश्न मनाने का आह्वान है। पर इससे ज्यादा जरूरी है आगे की तैयारी हो। उस झोल पर भी बात होगी जो जन लोकपाल में है तथा इस आंदोलन में भी देखा गया है। जिनने जन लोकपाल में एनजीओ तथा निजी व कॉरपोरेट जगत को इसकी परिधि में लाने का मुद्दा उठाया है, अब उनके लिए इन मुद्दों पर मुहिम छेड़ने की बारी है।

लोगों ने मान लिया था कि यहाँ कुछ नहीं हो सकता। महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सकता। इसे स्वीकार कर लेने में ही भलाई है। सरकारें बदल कर भी उन्होंने देख लिया। बकौल धूमिल ‘जिसकी पूँछ उठाई, उसको मादा पाया’। सरकार देश की प्रगति और विकास के आँकड़े पेश करने में लगी रही। विकास का मिथक गढ़ा जाता रहा और देश के विश्व की आर्थिक शक्ति बन जाने का खूब ढ़िंढ़ोरा पीटा जाता रहा। पर सच्चाई तो कुछ और ही कहानी कहती रही। आम आदमी के रोजमर्रा की जिन्दगी में कठिनाइयाँ बढ़ती ही गई। गरीब- गुरबा की क्या कहें, मध्यवर्ग तक की परेशानियां बढ़ गईं। उसके खाने में दाल है तो सब्जी गायब हो गई और सब्जी आ गई तो कुछ और चीजें नदारत। भले ही आम आदमी अपना वोट देकर सरकार बनाता और बदलता रहा, पर राजनीति से उसका विलगाव बढ़ता ही गया। सिविल सोसायटी और अन्ना हजारे इसी राजनीतिक शून्यता की उपज हैं।

अन्ना हजारे के आंदोलन की खासियत यह रही कि यह आंदोलन हमारे नागरिक समाज के उस हिस्से को आंदोलित करने में सफल रहा है जो राजनीति से दूरी बनाकर चलता हैं। मौजूदा राजनीति में बढ़ती सड़ांध ने नागरिक समाज में राजनीति के प्रति उदासीनता पैदा की है और आज हालत यह है कि उसका सभी राजनीतिक दलों से करीब करीब मोहभंग हो चुका है। ऐसे में अन्ना हजारे जैसा स्वच्छ व ईमानदार छवि वाला सुधारवादी, गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता जब उन मुद्दों को लेकर सामने आता है और आमरण अनशन करता है,  जिनसे नागरिक समाज त्रस्त है तो इसकी अपील समाज में दूर तक जाती है और उसे गहरे रूप में संवेदित करती है। अन्ना हजारे उसे किसी गाँधी या जेपी का नया अवतार जैसे लगते हैं। इस आंदोलन में यही हुआ और नागरिक समाज ने बढ.-चढ़ कर इसमें भागीदारी की। बल्कि इसकी कमान भी ऐसे लोगों के हाथों में रही जिनकी छवि आमतौर पर अराजनीतिक रही है।

युवा शक्ति के बारे में यही कहा जाता रहा है कि वह नवउदारवादी चमक दमक का शिकार हो गया है। बाजारवादी व्यवस्था ने इसके अन्दर के प्रतिरोध की ऊर्जा को सोख लिया है। महानगरों से लेकर कस्बों तक फैली यह युवा शक्ति अमेरिका जैसे उन्नत देशों में अपना भविष्य देखती है। ‘राहुल ब्राँड’  इसके आदर्श हैं। इसी युवा शक्ति को हमने अन्ना के आंदोलन में देखा। यह इस आंदोलन की मजबूत ताकत बनकर उभरी। बेशक कई जगह इसमें लम्पटता व अराजकता भी देखने को मिली। इसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि आइसा- इनौस जैसे रेडिकल वामपंथी छात्र-युवा संगठनों तथा ‘स्टूडेन्ट एण्ड यूथ अगेंस्ट करप्शन’ रात दिन आंदोलन की तैयारी में लगे रहे। उन्हें दमन भी झेलना पड़ा। इनके द्वारा जो पिछले तीन महीने से भ्रष्टाचार विरोधी संगठित व जुझारू अभियान संचालित किया गया, उसने युवाओं के बीच भ्रष्टाचार विरोध की वैचारिक जमीन तैयार की।

रही बात भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तो शायद ही कोई दिन हो जब लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ वामपंथी व अन्य दलों व जन संगठनों की ओर से धरना, प्रदर्शन न हुआ हो। छोटे-छोटे शहरों से लेकर दिल्ली तक में बड़ी बड़ी रैलियाँ हुई हैं। यहाँ तक कि गाँव-गाँव से, जंगल व आदिवासियों की ओर से विरोध के प्रबल स्वर उठे हैं। चाहे टाटा का कलिंगनगर हो, पोस्को, नियमगिरि  इन तमाम जगहों में किसानों का तीखा प्रतिरोध जारी है। इन आंदोलनों की सीमा यह है कि ये बहुत कुछ वैचारिक अभियान बन कर रह जाते हैं और इस विचार पर केन्द्रित हो जाते हैं कि यह व्यवस्था भ्रष्ट है और इसे बदले बिना भ्रष्टाचार खत्म नहीं किया जा सकता है। जन लोकपाल से भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता। इसलिए हमें व्यवस्था बदलाव पर केन्द्रित करना चाहिए। इस संघर्ष में कोई पड़ाव नहीं है। देखने में यही आया कि इस समझ के संगठन और बुद्धिजीवी इस आंदोलन के दौरान इसके मुखर आलोचक थे। इनकी हालत लहरों से जूझते नाविक की न होकर तट पर बैठे तमाशबीन की बनकर रह गई।

पर अन्ना के आंदोलन की विशेषता यह रही कि इन्होंने जन लोकपाल कानून की माँग पर अपने को केन्द्रित किया जिसकी परिधि में सरकार के प्रधानमंत्री से लेकर सांसद व ऊपर से लेकर नीचे के अधिकारी आ सके। भले ही इससे भ्रष्टाचार खत्म हो या न हो लेकिन जनता में इसकी अपील गई। वे अपने रोजमर्रा के जीवन में रोज ही इनसे सताये जाते रहे हैं। जन लोकपाल उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि अब उनका काम होगा और नहीं होता है तो कम से कम न्याय के लिए वे लोकपाल के पास जा तो सकते हैं। इस तरह अन्ना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ठोस मांगों को सूत्रबद्ध करने तथा यह प्रचारित करने में सफल रहे कि जन लोकपाल के बन जाने से उन्हें भ्रष्टाचार से राहत मिल जायेगी। एक अपील यह भी थी कि सरकार भ्रष्ट है। वह अन्ना को अनशन तक करने नहीं देना चाहती। सरकार के दमन ने आंदोलन के लिए आवेजक का काम किया। 16 अगस्त के बाद से लगातार अन्ना पर तरह तरह के दबाव बनाये जाते रहे लेकिन अन्ना ने जिस दृढ़ता का परिचय दिया, वह आंदोलन की दृढ़ता बन गई।

अन्ना का यह आंदोलन भ्रष्टाचार से शुरू हुआ। लेकिन इसने जनता बनाम संसद, सत्‍ता के विकेन्द्रीकरण, चुनाव सुधार जैसे कई मुद्दों को उठा दिया है। यह पहलू सामने ला दिया है कि हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था रुग्ण हो चुकी है। इसमें सुधार की जरूरत है। अन्ना इसे ‘व्यवस्था परिवर्तन’  कह रहे हैं। अहिंसा के रास्ते सत्याग्रह, अनशन, जन आन्दोलन आदि इनके हथियार हैं। कुछ लोग इसे दबाव की राजनीति या सरकार के साथ ‘ब्लैकमेल’  कहते हुए इसकी आलोचना करते हैं। इस सम्बन्ध में मुझे गाँधी जी की एक बात याद आती है। जब उनसे पूछा गया था कि आपके सपनों का भारत कैसा होगा तो उन्होंने कहा कि स्वराज को प्रत्येक गरीब की कुटिया तक पहुँचाना हम सबका काम होगा और मेरे सपनों का भारत ऐसा होगा जिसमें हर आदमी यह महसूस कर सके कि यह देश उसका है, उसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है।

पर सच्चाई यह है कि आज आवाज किसी की गूँज रही है तो वह धनपशुओं, दबंगों, राजनीतिक सौदागरों और अपराधियों की है। क्या हमारी संसदीय व्यवस्था इसी आवाज की प्रतिनिधि नहीं होती जा रही है? ऐसे में क्या संसदीय तानाशाही की जगह लोकशाही को जाग्रत करना जरूरी नहीं? अन्ना के आंदोलन ने यही किया है, निराशा के दौर में आशा के सपने जगाये हैं। अभी ये सपने हैं, इसे यथार्थ होना बाकी है। इसे कोई ‘दूसरी आजादी’, ‘अरब का वसन्त’ या ‘अगस्त क्रान्ति’  नाम दे सकता है लेकिन यह अभी तो शुरुआत है, वह भी स्वतः स्फूर्त। फुनगी से इसे जड़ तक पहुँचना है। यह लम्बा और कठिन संघर्ष है। काले अंग्रेजों के राज में उनका काला शरबत पीते-पीते, तिल-तिल कर मरने की जगह कुछ करने का आह्वान है जैसा वीरेन डंगवाल अपनी कविता में कहते हैं:

हमने यह कैसा समाज रच डाला है,
इसमें जो दमक रहा, वह शर्तिया काला है,
कालेपन की वे संतानें,
है बिछा रहीं जिन काली इच्छाओं की बिसात,
वे अपने कालेपन से हमको घेर रहीं
अपना काला जादू है हम पर फेर रहीं
बोलो तो कुछ करना है
या काला शरबत पीते-पीते मरना है।

लेखक कौशल किशोर एक्टिविस्‍ट हैं, ब्‍लॉगर हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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