नेताओं के लिए धंधा बन गई है राजनीति : सोमनाथ चटर्जी

पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे माकपा के वरिष्ठ नेता दिवंगत ज्योति बसु को अपना राजनीतिक गुरू मानने वाले लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से काफी चिंतित हैं। उनका कहना है कि आजकल सत्ता में बने रहने और कुर्सी से चिपके रहने के लिए नेता हर वह हथकंड़ा अपना रहे हैं, जो उनके (नेताओं) के लिए फायदेमंद है। आजकल नेता देश नहीं, खुद के बारे में सोचने लगे हैं। कभी जनता सेवा, समाज सेवा और देश सेवा के लिए राजनीति में आने वाले लोग अब निज व परिवार सेवा को महत्व देने लगे हैं। यहीं कारण है कि जनता की नजर में आज नेताओं की वह इज्जत नहीं रह गई है, जो दस-बीस साल पहले होती थी या होनी चाहिए थी। 30 साल से ज्यादा समय तक सांसद और पांच साल तक लोकसभा अध्यक्ष रहे सोमनाथ चटर्जी से शुक्रवार के लिए शंकर जालान ने कोलकाता स्थित उनके निवास पर लंबी बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश।

– राजनीति में ईमानदारी कितनी जरूरी है?

ईमानदारी राजनीति ही क्यूं, हर क्षेत्र, हर काम और हर व्यवसाय में जरूरी है। हां इतना अवश्य कहूंगा कि बीते कुछ सालों के दौरान कई राजनेताओं ने ईमानदारी ताक पर रख दी है। आजकल राजनेता प्रतिष्ठा को नहीं, पैसे को महत्व देने लगे हैं। दुखद यह है कि अन्य क्षेत्र के लोगों की तुलना में नेताओं को ज्यादा ईमानदर होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। आज कुछ नेताओं को लिए राजनीति धंधा बन गई है।

– पहले लोग राजनीति में देश सेवा की भावना से आते थे, लेकिन अब पैसा कमाने के लिए, ऐसा क्या हो रहा है?

भौतिकवादी सुविधा हासिल करने और रातों-रात अमीर बनने की लालसा इसका मुख्य कारण है। हर नेता यह सोचना लगा है कि जीत मिली है। जनता ने जीताकर विधानसभा या लोकसभा भवन भेज दिया है। जितना कमा सको कमा लो, जितना लूट सको लूट लो। क्या मालूम भविष्य

सोमनाथ
सोमनाथ चटर्जी
में फिर मौका मिले या न मिले। ज्यादातर नेता चुनाव जीतने के बाद जनता से किए गए वायदे को पूरा करने की बजाए अपना घर भरने में लग जाते हैं।

– आखिर इस बदलाव का कारण क्या है?

राजनेताओं के लिए कोई मानदंड नहीं है। कोई भी अपराधी चुनाव लड़ व जीत सकता है। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है। मेरा मानना है कि जब तक राजनेताओं के लिए न्यूनतम मानदंड नहीं तय होगा, तब तक इस पर अंकुश लगाना संभव नहीं है।

– भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति कैसे संभव है?

जनता के जरिए। भ्रष्टाचार पर रोक कोई कानून, कोई व्यवस्था या कोई नेता फिर कोई पार्टी तब तक नहीं लगा सकती जब तक जनता जागरूक नहीं होगी। जनता को अपना वोट डालने से पहले सौ बार सोचना चाहिए कि वह किसे वोट दे। कौन सा उम्मीदवार अन्य उम्मीदवारों की तुलना में नेक और ईमानदार है। जनता अगर ऐसा करने लगेगी और अपराधी व अल्प शिक्षित उम्मीदवार को वोट देने से पहरेज करेगी। तो देर-सबेर राजनीतिक पार्टियां भी अपराधी व कम पढ़े-लिखे लोगों को चुनावी टिकट देने से कतराने लगेगी।

– आपकी नजर में फिलहाल कौन-कौन नेता ईमानदार हैं?

हंसते हुए, यह क्या सवाल पूछ लिया आपने। मोटे तौर पर कहे तो जो पकड़ा गया वह चोर व बेईमान बाकी सब ईमानदार।

– दिवंगत हो चुके नेताओं में आप किसे ईमानदार मानते हैं?

कई नेता थे, जिनको लोग ईमानदार, साफ-सुथरी छवि वाले, समाज सुधारक, लोकहितकारी के रूप में याद करने हैं। मेरी नजर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, समाजवादी नेता जयप्रकाश व विनोवा भावे और माकपा के वरिष्ठ नेता ज्योति बसु हैं।

– आपको लोग सच्चे और ईमानदार नेता के रूप में जानते हैं? इस पर आप की क्या प्रतिक्रिया है?

देखिए, मेरा राजनीति में आना एक संयोग था। बचपन से मेरी राजनीति में कोई रूचि नहीं थी। मेरी वकालत अच्छी-खासी चल रही थी। मुझे खेल से लगाव था। मुझे राजनीति में मेरी इच्छा के विपरीत ज्योति बसु ने लाया या यूं कहे कि जबरदस्ती लाया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 42 साल की उम्र में 1971 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता। इससे पहले मैंने कभी छात्र या युवा राजनीति में हिसा नहीं लिया था। दूसरे शब्दों में कहे तो जीवन के 42 बसंत देखने के बाद राजनीति में आया और सीधा संसद पहुंचा। जीवन का काफी अनुभव हो चुका था। ज्योति बसु ने भी यही बताया और सिखाया था कि ईमानदारी के मार्फत ही राजनीति के मैदान पर अधिक समय तक टिका जा सकता है। मैं ज्योति बसु को अपना राजनीतिक गुरू मानता हूं और उनके इस कथन को सदैव याद रखता हूं कि अगर व्यक्ति ईमानदार हो तो समाज सेवा व देश सेवा के लिए राजनीति से बेहतर कोई मंच नहीं है।

– राजनीति में ईमानदारी की आप को क्या-क्या कीमत चुकानी पड़ी है?

विशेष कुछ नहीं। जरा-बहुत चुकानी भी पड़ी है तो वह इतनी उल्लेखनीय नहीं है कि उसका जिक्र किया जाए। 35-40 साल के राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। मेरी नजर में चढ़ाव को उपलब्धि माना जा सकता है, लेकिन ढलान यानी उतार को कीमत चुकाना नहीं।

– वर्तमान व्यवस्था में ईमानदार नेता होना क्या अयोग्यता का परिचायक नहीं है?

यह प्रश्न ही दुखद है। ज्यादातर नेताओं ने ऐसा काम किया है कि लोगों का नेताओं से विश्वास उठ गया है। लोग नेताओं को नेता नहीं लेता (पैसा लेने वाला) कहने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसी स्थिति के लिए जनता नहीं पूरी तरह नेता जिम्मेवार हैं। भ्रष्टाचारी नेताओं को शर्म करनी चाहिए कि उनकी करतूत का खामियाजा न केवल जनता बल्कि देश को भुगतना पड़ता है। उनके गलत आचरण की वजह से लोग ईमानदार नेताओं को भी शक की नजर से देखने लगे हैं या अयोग्य कहने लगे हैं।

– आजकल चुनाव जीतते ही नेता महंगी गाड़ियों में घूमने लगते हैं, ऐसे में जनता में क्या संदेश जाता है?

गलत संदेश जाता है, लेकिन नेता यह नहीं समझते। उनकी नजरों में ऐसा करना वे अपनी शान समझते हैं। सत्ता और कुर्सी के नशे में चूर बड़ी-बड़ी व महंगी गाडि़यों में चलने वाले नेता यह सोचते हैं कि इससे जनता पर उनका प्रभाव और रूवाब बढ़ रहा है, लेकिन असलियत में ऐसा नहीं है।

– देश की ताजा राजनीतिक स्थिति पर कुछ कहिए?

बहुत दुखद है। यह कहना मुश्किल है कि आने वाले सालों में देश की क्या स्थिति होगी। हम जितना विकास की ओर जा रहे हैं नेता उतने ही भ्रष्टाचारी बनते जा रहे हैं। नेता घोटाला करने से बाज नहीं आते, इसका एक कारण कानून प्रक्रिया का सुस्त होना भी है। अदालतों व जांच एजेंसियों पर राजनेताओं का प्रभाव या हस्तक्षेप भी अन्य महत्वपूर्ण कारणों में से एक है।

– क्या पश्चिम बंगाल में परिवर्तन संभव है?

मेरी नजर में केवल सत्ता परिवर्तन को परिवर्तन कहना सही नहीं होगा। सरकार बदलने से ही बदलाव आ जाएगा ऐसा सोचने वाले खुद को धोखे में रख रहे हैं। सही मायने में बदलाव तभी आएगा जब व्यवस्था (सिस्टम) और नीति बदलेगी। नेता निज हित को दरकिनार कर लोकहित में काम करने लगेंगे तभी सूरत बदलेगी, चाहे किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न बने।

– आप ने बतौर सांसद और लोकसभा अध्यक्ष क्या फर्क महसूस किया?

काफी फर्क है। बतौर संसद पहुंचने पर केवल अपने क्षेत्र का विकास और पार्टी व संसद की गरिमा का ध्यान रखना होता है, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने के बाद जिम्मेवारी बहुत बढ़ जाती है। सदन का सही तरीके से संचालन करना, सभी दलों के सांसदों के साथ उचित व्यवहार करना, संसद के कीमती समय का ख्याल रखना समेत कई तरीके की जिम्मेवारी बढ़ जाती है, ये जिम्मेदारियां एक सांसद पर नहीं होती।

– क्या कभी राज्यपाल बनने का प्रस्ताव मिला है?

मिले तो कई थे, लेकिन मैंने ठुकरा दिया। अब यह मत पूछिएगा क्यों।

– कभी राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव मिला तो क्या करेंगे?

जब मिलेगा तब सोचा जाएगा।

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