पहले मुर्गी या अंडा

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब -14 : कुछ सवाल बहुत पुराने होते हैं । अकसर यह सवाल नहीं जवाब होते हैं । फिर भी सवाल अपनी जगह पर जमा होता है । जवाब भी जमा सा लचीला होता है । इसमें सब कुछ कसैला होता है । पर यह मीठा होता है । इसमें बड़ा ज्ञान होता है । यह ज्ञान बहुत अज्ञान फैलाता है । जैसे पिछले दिनों हमारे जीरोनुमा हीरो ने एक सवाल बिहार के चुनाव के अपने भाषण में समझाया । यह भी एक सवाल था । कितना बढ़िया सवाल था कि नीतीश कुमार अगर नरेंद्र मोदी विरोधी हैं तो वह भारतीय जनता पार्टी के साथ सत्ता में क्यों हैं ? क्यों का कभी कोई उत्तर नहीं होता क्योंकि यह क्यों ही कभी नहीं होता सत्ता में ईमानदार। सत्ता का जीव धर्म सरकार बचाना होता है । सरकार गठबंधन की होती है तो वह तरह तरह के अंडे सेंकती है । अंडा सेकना क्या है । अंडे को मुर्गी अपनी गर्मी से चूजा बनाती है ।

यह सरकार या सत्ता में कहां से आती है । सच वाला जवाब है कि यह गर्मी भ्रष्टाचार से आती है । राहुल गांधी की बेनामी सरकार भी इसी भ्रष्टाचार की गर्मी से चल रही है। भ्रष्टाचार भी कुछ ऐसा ही सवाल है कि पहले मुर्गी या अंडा। मतलब कि गठबंधन सरकार चलाने के लिए भ्रष्टाचार जरूरी है। यहां यह सवाल राहुल गांधी नहीं उठाते कि जब मनमोहन सिंह ईमानदार हैं तो उनकी सरकार के मंत्री भ्रष्ट क्यों हैं? इस क्यों का असली जवाब है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के प्रधानमंत्री के लिए जरूरी है सरकार – चाहे वह जितना भी करे भ्रष्टाचार सरकार के प्रधानमंत्री तो हैं ईमानदार।

ईमानदारी क्या है? इसकी व्याख्या या परिभाषा या अवधारणा बहुत अलग-अलग है। इस अलग-अलग की समझ तभी हो सकती है जब सरकार कोई आयोग बनाए। जैसा कि आपको पता होता है कि आयोग का काम अपनी रफतर से चलता है। आयोग का बुनियादी दर्शन होता है कि कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। फिर उसकी रपट सरकार के सामने पेश होती है। न जाने क्या होता है कि सांसद जब तक संसद न बंद करा दें तब तक उस रपट पर सरकार कुछ नहीं बोलती। तब तक जनता को पता होता है कि आयोग की रपट में भ्रष्टाचार की जो भी परिभाषा की गई है, उसके अनुसार तो पूरी सरकार ही भ्रष्ट होती है। सरकार का एक-आध मंत्री, दो-चार अफसर तो भ्रष्ट होना तो चल सकता है – पूरी की पूरी सरकार कैसे भ्रष्ट हो सकती है। यह कैसे हो सकता है कि सरकार भ्रष्ट और प्रधानमंत्री ईमानदार।

प्रधानमंत्री को यह साबित करने के लिए कि सब कुछ हो सकता है, पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री कभी भ्रष्ट नहीं हो सकता। इसके लिए तरह-तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं । कुछ लोग तो ईमानदारी से स्वीकार कर लेते हैं कि हमने अब तक पापड़ नहीं बेला है। जैसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। जब चुनाव आता है तो वह वादा करते हैं कि अगली बार बनी सरकार तो मिटा कर रहेंगे भ्रष्टाचार। यह प्रधानमंत्री को कभी पसंद नहीं आता कि कोई मुख्यमंत्री ऐसा दावा करे। उसका भी तो एक-आध मंत्री नहीं होता ईमानदार। प्रधानमंत्री को यह भी साबित करना होता है कि वह ईमानदार तो उसके मंत्री भी ईमानदार।

ऐसे में आयोग की रपट काम में आती है। सरकार के सामने साफ होता है कि सरकार को ईमानदार साबित करने के लिए कुछ ऐसा किया जाए कि लोग भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार न चिल्लाएं। सरकार कोई नया अधिनियम बनाती है। इस अधिनियम में तरह तरह के  उपनियम – परिनियम आदि-आदि होते हैं, जिसके तहत सरकार बना सकती है एक निगम। यह तो आपको पता ही है कि निगम हमेशा एक सरकारी उपक्रम होता है। निगम का नाम होता है भारत भ्रष्टाचार विकास निगम। यही तय करता है कि जब तक निगम किसी को भ्रष्ट न माने तब तक सब हैं ईमानदार। पहले मुर्गी या अंडा यही है उत्तर ईमानदार।

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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