पर्यावरण माने बड़बोलापन

जुगनू शारदेयपाखंड और आत्ममोह बिहार की विशेषता है। इससे जब पर्यावरण जैसे विषय जुड़ जाते हैं तो यह पाखंड और आत्ममोह और बढ़ जाता है। एक मायने में बिहार ही नहीं पूरा देश इस पाखंड से जुड़ा है। कभी मेनका गांधी ने इसे बढ़ावा दिया। अब जयराम रमेश इसे बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसी हालत में अगर बिहार इसे बढ़ावा दे रहा है तो इसमें कुछ अनोखा नहीं है। सालाना रस्म अदायगी है 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाना। फिर भारतीय परंपरा में इसे भूल जाना। यह भारतीय राज्य की विशेषता है कि जीवन से जुड़ी हर चीज को नष्ट करने के बाद उसे बचाने का बड़ा भारी भगीरथ प्रयास होता है। यह भी एक भारतीय परंपरा है कि हर चीज जो पश्चिम से या अमेरिका से आती हो , बहुत ही महान होती है। पर्यावरण भी यूरोपीय सोच – समझ है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अपना लिया।

प्रधानमंत्री की घास छील खेती

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 21 : लोकतंत्र में जनता जनार्दन जी को पटाने के लिए क्या-क्या नहीं होता। कोई एक नाम भी तो नहीं है इनका। आध्यात्मिक विचारवान के लिए यह जनता जनार्दन जी हैं तो भौतिकपन वालों के लिए आम आदमी। अदालत में जनहित याचिका हैं। अखबार में बाबूजीनुमा कार्टून हैं। यह कभी गलत नहीं होते। यह और बात है कि यह गलतियों के भंडार हैं। इन्हें कभी कोई दोष नहीं देता। यह भी दोषियों को अपना समर्थन देते हैं। इनकी गरीबी के बल पर लोग अमीर हो जाते हैं। अपनी गरीबी मिटाने के लिए यह तुरंत बिक भी जाते हैं। सब कुछ इनके नाम पर होता है। इनके पास कुछ नहीं होता। यह जब आम होते हैं तो आम के आम और गुठली के दाम होते हैं। जब यह गुठली के दाम होते हैं तो सभ्य लोगों की जबान में कंज्यूमर कहलाते हैं। संस्कृत में अनुवाद हो कर उपभोक्ता हो जाते हैं। इनमें से काफी लोग भूखे रहते हैं, पर खूब खाने वाले इन्हें पेटू भी कहते हैं।

प्याज की परत

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 20 : नहीं लगता आपको कि देश का असली वाला शासन प्याज की परत की तरह है। असली वाला शासन केंद्र वाला होता है। राज्य वालों का शासन तो मुंबई महानगर पालिका से भी चिरकुट होता है। समझिए कि राज्यों का शासन प्याज की वह परत होता है जो खाई नहीं जाती, दिखाई जाती है। राज्य को कभी पता नहीं होता कि फसल खराब हो गई है। दरअसल, राज्य को पता भी होता है तो वह इंतजार करता है कि केंद्र सरकार कोई कार्रवाई करेगी। केंद्र सरकार इंतजार करती है कि प्याज की कीमत बढ़ती रहे। प्याज का निर्यात होता रहे। हमारा देश तो शाकाहारियों का देश है प्याज – लहसुन नहीं खाएंगे तो क्या फर्क पड़ता है।

खेत खाए गदहा, मार खाए जोलहा

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 19 : कुछ कहावतें मजेदार होती हैं। मसलन एक कहावत बहुत ही मजेदार है। नारियां क्षमा करें, यह कहावत उनके खिलाफ है। पर है बहुत मजेदार। नारी, अगर इस कहावत को अपने पर न लें और अलग-अलग रुपकों में इसको समझें तो उन्हें भी मजा आएगा। तो कहावत है कि इयार का गुस्सा भतार पर! अब इसे यूं भी समझ सकते हैं कि हार का गुस्सा ईवीएम पर। या यूं कह सकते हैं कि मनमोहन का गुस्सा योजना आयोग पर। पता सिर्फ यह लगाना है कि मालिक कौन है। यहां भतार मालिक का प्रतीक है और इयार प्रतीक है उसका, जो मालिक की गैर मौजूदगी में एक झलक पाता है। यह झलक क्या है। झलक गृह मंत्रालय है। इसका इयार कौन है पी चिदंबंरम। अगर हमने इयार खोज लिया तो भतार भी खोजना पड़ेगा। बहुत परदे में रहता है गृह मंत्रालय। कुछ कुछ उस गाने की तरह कि परदा जो खुल गया तो फिर…भतार हो जाएगा नाराज। तो भतार श्री बहुत नाराज हैं। दिल्ली में बहुत बलात्कार होता है, उससे बहुत नाराज हैं। आसान लोकतांत्रिक तरीका तो यह था कि दिल्ली पुलिस को दिल्ली की नगरपालिका नुमा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार के जिम्मे छोड़ देते।

यह भी साड़ी, वह भी साड़ी

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 18 : आज कल देश में अमेरिका विरोध कम हो गया है। वरना जिस बात पर वामपंथी दल बंद करा देते थे, उस पर भारत सरकार औपचारिकता निभा देती है। संघ परिवार के लोग तो इसे देश की प्रतिष्ठा और महान भारतीय संस्कृति से जोड़ कर न सही दिल्ली, बंगलुरु – भोपाल तो बंद करा ही सकते थे कि भारत की प्रतिष्ठा की नाक कट गई। यहां हमेशा इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या भारत की प्रतिष्ठा की कोई नाक भी है। इस पर भी बहस हो सकती है कि वह सिर्फ नाक है या प्रतिष्ठा वाली नाक है। अगर नाक कट गई तो क्या प्लास्टिक की नाक नहीं लग सकती है। फिर असली नाक कटी है या मुहावरे वाली नाक कटी है। कोई यह भी कह सकता है कि अमेरिका में तो भारत की नाक न जाने कब से कट रही है। पर अबकी बार नाक कटने का बहाना साड़ी है। यहां यह भी कहा जा सकता है कि साड़ी स्त्रियां पहनती हैं, हम भारतीय स्त्री को कहां इस काबिल मानते हैं कि उसकी नाक कटने पर हमें तकलीफ हो, इस लिए कट जाने दो अमेरिका में नाक। हमारे यहां देखो हमने साड़ी की कितनी इज्जत बना दी है। हमारे यहां से मतलब मध्य प्रदेश है। यह भारत का हृदय प्रदेश है। यह हृदय प्रदेश भी नाक वाली ही बात है। वरना है तो यह बीमारु प्रदेश में से ही एक। अब तो इसके पास नाक भी नहीं है क्योंकि इसका एक नाक बाघ यहां बहुत खतरे में है।

भ्रष्टाचार का अचार

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब 16 : यह एक बहुत बढ़िया विचार है। इस विचार में सब कुछ है सदाचार भी और कदाचार भी। जैसे राजपाट में वापसी के बाद मुख्यमंत्री ने तय किया कि भ्रष्टाचार का अचार बनाया जाए। अचार और खिचड़ी का बड़ा मधुर संबंध होता है। इसी मधुर संबंध पर तो कहावत है कि खिचड़ी के चार यार – दही, पापड़, घी और अचार। अब न बड़े-बड़े भ्रष्टाचार होने लगे हैं। पुराना भ्रष्टाचार तो जन वितरण प्रणाली ही हुआ करता था। किसी जमाने में इसका भी एक कार्ड होता था – राशन कार्ड। इस राशन कार्ड के बिना जीवन अधूरा-अधूरा सा लगता था। इस कार्ड पर सब कुछ मिलता था। सिर्फ वह नहीं मिलता था जो देने का वादा यह कार्ड करता था। अब कार्ड भी आसानी से नहीं मिलता। यह युद्ध क्षेत्र भी हो गया है क्योंकि यह आंकड़ा हो गया है। इस युद्ध क्षेत्र का सबसे बड़ा हथियार आंकड़ा होता है। यह शोध का विषय है कि आंकड़ा सदाचार है या कदाचार या भ्रष्टाचार। आपको तो पता है कि राजपाट ही नहीं, सरकार भी आंकड़े से ही चलती है। बिहार की सरकार भी आंकड़े से चलती है और भारत सरकार भी आंकड़े से चलती है। कभी-कभी भारत सरकार आंकड़े से नहीं चलती है। यह भी कह सकते हैं कि जैसे संसद नहीं चलती है, वैसे ही भारत सरकार भी नहीं चलती है। अभी बिहार सरकार और भारत सरकार में बड़ा भारी आंकड़ा युद्ध चल रहा है। इसमें से एक असत्यवादी है। ऐसा बहुत कम होता है कि सरकार दो हों और असत्यवादी एक हो। सरकार हमेशा असत्य का निर्वहन करती है। उसके पास आंकड़ों का सत्य होता है। यहां भी है। यह बड़ा ही गंभीर विषय है। इसकी गंभीरता के सामने राडिया टेपवाणी कुछ भी नहीं है।

ताजा बासी खाना

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब – 15 : देश की राजनीति ही नहीं मन और मानसिकता भी ताजा-बासी खाना हो गया है। यह सब कुछ बहुत सारी वजहों से हुआ। बहुत सारी वजहों की तलाश करेंगे तो वजहों तक तो नहीं ही पहुंच पाएंगे – हो सकता है कि चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के विश्लेषक हो जाएं। यह बिरादरी ताजा-बासी खाना खाने और खिलाने में माहिर होते हैं। और क्यों न हों करोड़ों का धंधा है। खैर इस बिरादरी का लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का, बिहार के मामले में 24 नवंबर को रिजल्‍ट सामने आ जाएगा। उसके बाद भी, जब ताजा खाना सामने होगा – यह बिरादरी साबित करती रहेगी कि अभी भी बढ़िया होता है ताजा-बासी खाना। यह अच्छा नहीं लगता कि बिरादरी ने मुझे बिरादरी का नहीं माना है। फिर भी बिरादरी के गुण गाए जाता हूं। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि कांग्रेसियों के समान प्रधानमंत्री के ही गुण गाता हूं। या भ्रामक जनता पार्टी के समान कर्नाटक का मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को बनाए – बचाए – हटाए जाने के लिए भ्रामकता के गुण गाता हूं। जहां भी जाता हूं खाता हूं बासी-ताजा खाना।

पहले मुर्गी या अंडा

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब -14 : कुछ सवाल बहुत पुराने होते हैं । अकसर यह सवाल नहीं जवाब होते हैं । फिर भी सवाल अपनी जगह पर जमा होता है । जवाब भी जमा सा लचीला होता है । इसमें सब कुछ कसैला होता है । पर यह मीठा होता है । इसमें बड़ा ज्ञान होता है । यह ज्ञान बहुत अज्ञान फैलाता है । जैसे पिछले दिनों हमारे जीरोनुमा हीरो ने एक सवाल बिहार के चुनाव के अपने भाषण में समझाया । यह भी एक सवाल था । कितना बढ़िया सवाल था कि नीतीश कुमार अगर नरेंद्र मोदी विरोधी हैं तो वह भारतीय जनता पार्टी के साथ सत्ता में क्यों हैं ? क्यों का कभी कोई उत्तर नहीं होता क्योंकि यह क्यों ही कभी नहीं होता सत्ता में ईमानदार। सत्ता का जीव धर्म सरकार बचाना होता है । सरकार गठबंधन की होती है तो वह तरह तरह के अंडे सेंकती है । अंडा सेकना क्या है । अंडे को मुर्गी अपनी गर्मी से चूजा बनाती है ।

अब कासे कहूं पीर जिया की

जुगनू : कुछ बातें बेमतलब 13 : हाय हम हिंदुस्तानी अब तक न समझे हुमायूँ के मकबरे का मोल। अब जब ओबामा बाबू वहां जा चुके हैं तो आमिर खान भी जरूर जाएंगे। यहीं से होगा उनका राष्ट्र के नाम विरासत बचाओ संदेश : यह वही मकबरा है जहां ओबामा आ चुके हैं, वहां आ कर आप अपना प्यार भरा संदेश जरूर लिखें कि दिल्ली को ओबामा से बचाइए। आमिर खान आगे आपको बताएंगे कि दिल्ली का सारा रियल इस्टेट मकबरों–समाधियों में बिखरा पड़ा है। सरकार योजना बना रही है कि कैसे इसे भी सैर सपाटा में बदलें। जैसे आप दिल्ली आएं। दिल्ली एक ऐसी जगह है, जहां लोगों को आना ही पड़ता है। बस अड्डा, हवाई अड्डा, रेल अड्डा यानी किसी भी अड्डे से बाहर निकलें तो सामने एक मकबरा या समाधि होगी। यहां ओबामा आए थे। यहां ओबामा नहीं आए थे। प्रश्न का सही उत्तर देने पर अमरीका के वीजा की गारंटी। उत्तर गलत हुआ तो बिहार सरकारी खर्च से भेजा जाएगा।

आलतू-फालतू और बेफालतू

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 11 : अब आया आनंद! इस आनंद के अतिरेक में शरद जी के लिए कुछ सुझाव। शरद जी, हम पर कटे जरूर हैं – पर कटी नहीं। यह भी सही है कि हम आलतू भी हैं, फालतू भी और बेफालतू भी। अब थोड़ी देर के लिए शरद जी हम इन शब्दों की लोहियावादी व्याख्या करें। जहां तक हमें पता है कि हमने लोहिया का नाम भी नहीं पढ़ा है। आपने तो जरूर पढ़ा होगा। न पढ़ा हो तो समझने के लिए किसका नाम सुझाऊं जिसे आप समझ सकें। अच्छी बात तो यही है कि न हमने पढ़ा, न आपने पढ़ा – फिर यह शब्द आलतू – फालतू – बेफालतू किसने गढ़ा। अब यह समझना आवश्यक है कि ऐसा शब्द कौन गढ़ सकता है। इस कौन की तलाश का काम चुनाव के समय हम अगर खबरिया चैनलों पर छोड़  दें, 420 एसएमएस के बल पर सरकार बना सकते हैं। चूंकि इनका काम बकर – बकर – कचर – कचर करना होता है, इसलिए मान कर चला जा सकता है कि इन शब्दों को खबरिया चैनलों ने गढ़ा होगा। पर बेचारे न जाने कब से अपनी बात कहना भूल गए हैं। नेता की बात को ही अपनी बात बना कर बोलते हैं।

बिहारी बड़बोले बनाम राजा बाबू बम भोले

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 10 : राहुल बाबू 14 अक्तूबर को बिहार आए। बिहारी सूरमा लालटेनी, बिहार सूरमा बंगलाई और बिहारी सूरमा तीरंदाज, उस इलाके से वोट मांग कर दूसरा इलाका पकड़ चुके हैं। अब राहुल बाबू जाएंगे काटिहार के कोढ़ा में, अररिया के सिकटी में और सुपौल के निर्मली में। पर नहीं जाएंगे तो सदाकत आश्रम के बाहर नहीं जाएंगे, जहां कांग्रेस वर्कर धरना–प्रदर्शन कर रहे हैं। यहां भी वही रोग की टिकट में पक्षपात हुआ। क्या जमान आ गया है। एक टिकट के लिए लोग पक्षपात कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस साबित करना चाहती है कि वह बिहार के साथ पक्षपात नहीं कर रही है। वह तो टेलीविजनीय विज्ञापन से साबित करना चाहती है कि 20 साल से पैसेंजर की रफ्तार से चल रही है। कितना आसान है भूल जाना कि इसमें से पांच साल -2000 से 2005 तक लालटेन कांग्रेस के हाथ पर टिका हुआ था। जब लालटेन नहीं था तो बूटा सिंह का साल भरी राजपाट था। तो बचा15 साल। यह एनडीए के खाता में जाता है कि 15 साल, बुरा हाल। खैर, अब बिहार का नाम ऊंचा करना चाहती है कांग्रेस। स्वागतम्। इसके लिए विज्ञापन देती है कि नीतीश सरकार जवाब दो/पाई-पाई का हिसाब दो।

रघुवंशम् विरोधम् हुंकारम्

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 8 : बोले तो बोले रघुवंश बाबू भी बोले। लालू जी के विरोध में बोले। रामबिलास जी के विरोध में बोले। नीतीश कुमार पर चुप रहे। सुशील मोदी पर ध्यान ही नहीं दिया। कांग्रेस पर ध्यान दिया। अपने अनुज भ्राताश्री रघुपति का बचाव किया। सब कुछ किया पर यह समझ में न आया कि वह चाहते क्या हैं। जाहिर है कि अब जगदानंद की बारी है। वह रघुवंश बाबू के विरोध में बोल सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वह रघुवंश बाबू और लालू जी के बीच में न पड़ें। जगदानंद की गिनती समझदार लोगों में होती है। इतने समझदार हैं कि भ्रष्टाचार के डर से अपने विभागों में इतना भ्रष्टाचार मिटाया कि कुछ काम न हुआ। इसका फायदा नीतीश कुमार ने उठाया कुछ काम कर दिखाया। रघुवंश बाबू भी जब केंद्रीय मंत्री थे तो बहुत काम करते थे। बहुत बड़ा मंत्रालय था उनके पास – ग्रामीण विकास।

टिकट की कुश्ती

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 7 : इंडिया राष्ट्र मंडल खेल में अभी तो भारतीय खेल कुश्ती में आगे चल रहा है। शूटिंग में भी सही निशानेबाजी हो रही है। पता नहीं इंडिया वाले खेलों में भारत का हाल क्या होगा। एक बात तो माननी पड़ेगी कि हम कुश्ती में महाकुश्ती बाज हैं। अपना-अपना नजरिया है। हमें क्रिकेट को भी कुश्ती मान लेना चाहिए। राष्ट्र को कुश्तीबाजों के स्वर्ण पदक से ज्यादा इस बात पर खुशी हो रही है कि हमने किसी को क्रिकेट में हरा दिया। खबरिया चैनल इस खुशी से झूम रहे थे और बेचारा दूरदर्शन कह रहा था कि जाइए राष्ट्र मंडल खेल भी देख आइए। बहरहाल लाखों करोड़ के खेल के बाद कुछ सोना, कुछ चांदी के साथ देश कहेगा, देखा खेल की ताकत। और देखना चाहते हो तो चलो भारत के असली राष्ट्र बिहार चलो। असली महाराष्ट्र बिहार में टिकट की कुश्ती अभी भी चालू है। कहना मुश्किल है कि यह असली कुश्ती है या नूरा कुश्ती है। जो भी है चालू भी रहेगी। जब तक आखिरी दिन नामांकन का है, तब तक चालू रहेगी।

दिल बदलू का दल

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 5 : है अपना दल तो आवारा, न जाने किस पर आएगा/नीतीश ने बुलाया, बहुत समझाया, विकास भी दिखाया/उम्मीद भी जताया, भरोसा भी दिलाया, टिकट नहीं ही दिलाया… है अपना दिल तो टिकट का मारा। अब इसे बदल दें। कुछ यूं गाएं। मैं पार्टी का साथ निभाता चला गया/हर टिकट पाने, न पाने को भुलाता चला गया। भटकता हुआ लालू के दर पर भी माथा टिकाया/ कहा उनसे कि मैं तो पार्टी का साथ निभाता चला गया/लालू ने भी ठुकराया/तब आया, कहां-कहां भटके हम इधर-उधर/कांग्रेस का रास्ता भी अपनाया/वहां अपने को हमने रघुपति जैसा न पाया। रघुपति कोई एक नहीं है। मगर रघुपति एक ही हैं। लोहिया से आरंभ कर किशन पटनायक तक पहुंचे थे। बीच में एनजीओ भी हो जाते थे।

बिहार राष्ट्र मंडल का खेल

जुगनू शारदेय : कुछ बातें बेमतलब 4 : बिहार को भारत राष्ट्र मानें या ना मानें–आपकी मर्जी। पर बिहार है तो राष्ट्र ही। यूं अपने राष्ट्र में एक ही महाराष्ट्र है। इसका मतलब यह नहीं होता कि बिहार राष्ट्र नहीं है। हमारे अत्यंत ही लोकप्रिय अध्यापकीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार कहते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारी विरासत है। सच भी है। हर अच्छे अध्यापक के समान हमारे मुख्यमंत्री वही कहते हैं जो उनके पहले के मास्टर लोग कह चुके हैं। करते भी हैं। अब जैसे हमारी विरासत में मगध साम्राज्य भी है। चूंकि मुख्यमंत्री इस साम्राज्य के सिंहासन पर विराजमान हैं, इसलिए उन्हें विरासत की चिंता सताती रहती है। इसलिए भी सताती है कि लोकतांत्रिक साम्राज्य में हर पांच साल के बाद वोटर का अनुमोदन लेना पड़ता है। आने वाले सालों में यह शब्द वोटर समाप्त होने वाला है। तब कहा जाएगा–स्टेक होल्डर।

मिस्टर टर्न अराउंड का अर्धनारीश्वर

जुगनू शारदेय : कुछ बातें बेमतलब -3 : जब से संघ परिवार का कापी राइट भी हमारी परंपरा और संस्कृति पर हुआ है, तब से हम अर्धनारीश्वर की परंपरा भूल गए हैं। स्त्री–पुरूष की बराबरी की पहचान है अर्धनारीश्वर। इसका मतलब बहुत साफ है कि देह का आधा अंग महिला है और आधा मर्द। वैवाहिक मंत्रों में भी याद दिलाया जाता है कि हम दोनों एक दूसरे के लिए समर्पित हैं। बिहार में इस समर्पण का आदर्श उदाहरण पेश करते हैं बिहार ही नहीं देश के, और देश ही नहीं हमारे विकास प्रिय मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के पूर्व बड़े भाई और नवीनतम मुहावरा बाजी में मिस्टर टर्न अराउंड लालू प्रसाद। अपनी पत्नी के प्रति समर्पित ऐसा महापुरुष संपूर्ण भारत वर्ष में बहुत मुश्किल से मिलता है। सामान्य ज्ञान के विद्यार्थियों से प्रश्न पूछा जाए कि उस राज्य का नाम बताओ जहां पति–पत्नी दोनों मुख्य मंत्री रहे हों तो उत्तर होगा- बिहार।

सीडब्‍ल्‍यूजी : करप्शन वेल्थ गेम दिवस

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब – 2 : अहा, आज का दिन कितना पवित्र है। पवित्र ही नहीं महान भी है। देश की प्रतिष्ठा बच गई है कि लाख घूसखोरी हो, हम अपनी मंजिल पर पहुंच ही जाते हैं। हमारी भव्यता महान है। हम अपनी पुरानी पहचान को भी बनाए रखते हैं। कितने महान और पुण्य के भागी रहे होंगे वह लोग जिन्हें खेलगांव में नागराज के दर्शन हो जाते हैं। पुण्य प्राप्त करो। नोटो नहाओ, पैसा बहाओ। कभी भारत सांपों और मदारियों का देश माना जाता था। आओ देख लो, हमारे पास सांप भी हैं और एक से बढ़ कर एक मदारी भी हैं। अब इस पर कर लो बहस कि बड़ा मदारी कौन – सुरेश कलमाड़ी या शीला दीक्षित या संपूर्ण भारत सरकार या भारतीय सेना जो हफ्ते भर में बना देती है टूटा हुआ पैदल पुल। वह पुल ही क्या जो टूटे नहीं। पुल टूटने से ही पता चलता है कि हमारी गुणवत्ता कितनी महान है। टूटा पुल बनाना क्या है। असंभव को संभव बनाना। हम असंभव को संभव कर दिखा सकते हैं।