पैबंद लगाने से नहीं लिबास बदलने से बदलेगा भारत

गोपाल अग्रवालसाझा सरकारों के गठन की बाध्यताओं के राजनीतिक दौर में विरोधाभासी मुद्दों को दर-किनार करना मान्य नीति बना चुकी है, साथ ही आम सहमति के बिन्दुओं तक सीमित राष्ट्रीय एजेन्डे के सिद्धान्त को सभी मोर्चों ने अपनी नियमित कार्य प्रक्रिया बना लिया है। किन्तु, प्रबन्ध विज्ञान के दृष्टिकोण से यह अक्षमता का निम्नतर स्तर होगा और इससे कभी भी अच्छे परिणाम नहीं आ सकते। राजनीतिक प्रबन्ध में समूचे राष्ट्र को एक संस्था मानकर उन‍ नीतियों का निर्धारण किया जाना चाहिए, जिनसे संस्था का प्रत्येक सदस्य लाभान्वित हो। व्यवस्था के नियम ऐसे जो निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को चलाते हुए सभी को अवसरों की समानता प्रदान करें।

राष्ट्रीय लक्ष्य विकास  पर आधारित राष्ट्रीय सम्पन्नता का होना चाहिए। इसकी प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों को अपनी-अपनी बेहतर क्षमता प्रदर्शन के बजाय सम्पूर्ण क्षमता प्रदर्शन के सिद्धान्त को अपनाना होगा। इस सिद्धान्त के विरोधी इसे उच्च आदर्श स्थिति का काल्पनिक प्रतिबिंब कहकर अव्यवहारिकता की संज्ञा से धूमिल करने का प्रयास कर सकते हैं। यदि सत्ता की बागडोर पकड़े हुए हाथों से पूछा जाये कि एक दिशा में अच्छे से अच्छा कार्य करने से राष्‍ट्र उत्थान सम्भव होगा या सभी दिशाओं में सम्पूर्ण अच्छा करने से होगा तो सही उत्तर मिल सकता है। केवल मानवता ही नहीं पूर्णत: मानवता जिसमें प्राणी हित के संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक पेटभर भोजन, व समूचे राष्ट्र के समक्ष किए गए वायदों को पूरा करने के लिए हर एक समस्या को चुनौती मानकर उसका समाधान देना पड़ेगा। यदि हर साक्षा सरकार आसान-आसान सवालों का जवाब देने तक अपने को सीमित व उत्सुक रखेगी तो देश के समक्ष खड़े कठोर प्रश्नों का हल कौन निकालेगा? यह कोई बच्चों का प्रश्न पत्र नहीं कि कोई पांच प्रश्नों का उत्तर दो। कोई पांच विभाग किसी सरकार की कुशलता या भरोसे के परिचायक कदापि नहीं हो सकते। इसलिए विश्व के संविधान शास्‍त्रियों ने शासकों की मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व नियत किया है।

बीसवीं सदी में बेतहर प्रबन्ध का सिद्धान्त पुराना हो गया है। अब इसका स्थान सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रधान प्रबन्ध ले चुका है। निजी कम्पनियों में उत्पाद हो या सेवा, सम्पूर्ण गुणवत्ता के बिना बाजार में ठहरना कठिन है। यदि सरकार में सम्पूर्ण क्षमता का अभाव हो तो देश के संसाधनों की सम्पूर्ण क्षमता का वह प्रयोग नहीं कर पायेगी। अन्तत: परिणाम वहीं रहेंगे जो विगत चौंसठ वर्षों से हम देख रहे हैं। सरकार वहीं क्षमतावान है जो देश का मस्तक ऊँचा कर दे। परन्तु जब तक चालीस करोड़ व्यक्ति भूखे सोयेंगे तो राष्ट्र का मस्तक कैसे उठ सकता है? जिस दल के पास इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं है, वह पाखण्ड व थोथे नारों की मानसिकता से ग्रसित है। अचरज है कि प्राथमिकताओं की सूची में इन्सानी भूख, दवाई व छत की बुनियादी जरूरतों से ऊपर एटम बम ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। भूख से तड़पते बच्चों वाले परिवार में खूंटी पर बन्दूक टंगी हो तो दृश्य कैसा होगा?

भारत में राजनीतिक दलों ने एक चूक की है। विभिन्न पार्टियों ने छाया मंत्रिमंडल बनाकर कभी भी वैकल्पिक व्यवस्था प्रस्तुत करने की हिम्मत नहीं दिखाई। कभी-कभी शक होता है कि ऐसा न करना, कहीं क्षमता में कमी का द्योतक तो नहीं है। साठ वर्षों का समय विचारधारा को तराश कर सही आकार देने के लिए कम नहीं है। आदर्श स्थिति वही मानी जायेगी जब हम आलोचना के साथ अपने वैकल्पिक सुझाव व उनके अनुपालन की चरणबद्ध प्रक्रिया प्रस्तुत कर पायेंगे।

वर्तमान दौर की राजनीति कुतर्क आलोचना या एक-दूसरे के कथनों को चातुर्यता से काटना मात्र है। भ्रमवश कुछ नेता शोर-शराबे को अपने चेहरे की चमक का नुस्खा समझ बैठे हैं। भारत का मतदाता बहुत समझदार है। वास्तव में उसके सामने कोई विकल्प न होने के कारण वह वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को सूखे कंठ ही सटक रहा है। नेताओं के छल-कपट से परिपूर्ण थोथे आदर्श के वाक्य गले से नीचे नहीं उतर पा रहे हैं। जिस दिन सम्पूर्ण क्षमता के बोध से युक्त नेतृत्व का विकल्प सामने आ गया उसी दिन मतदाता का गुस्सा बाहर आ जायेगा। वर्तमान सभी सरकारें ध्वस्त कर दी जायेंगी व नयी सत्ता का आलिंगनबद्ध स्वागत होगा।

राजशाही में शासक की कुशलता के गुणदोष की गुंजाइश न हो परन्तु लोकशाही में नीतियों को कसौटी पर कसने का अधिकार है। जिन्हें राजनीति करनी है वे यह समझ लें कि यह प्रबन्ध का आधुनिकतम विज्ञान है। जनता परिणाम चाहती है उसके लिए चेहरे, रंगरूप, भाषाई अलंकार सब गौण है। धर्म का जादू उतर रहा है। जातिवाद भी अन्तिम पड़ाव पर है। जनता उस कर्म पुरूष को खोज रही है जो राजनीति प्रबन्ध की विज्ञान पर आधारित बिन्दुवार व्याख्या कर दे। नियमों तथा इनके प्रवर्तन का माध्यम भी प्रस्तुत कर दे। जो राजनीतिक दल इस कार्य को करने का साहस रखता है उसे सर्वप्रथम उन वर्गों की पृथक-पृथक पहचान करनी होगी जो अपनी कुशलता से अधिक या कुशलता से कम प्रतिफल पा रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए उत्पादन व व्यापार की नीति बननी चाहिए। कृषि के क्षेत्र में देश की तमाम खाली पड़ी जमीन को कृषि योग्य बनाने के लिए बेरोजगारों की सेना बनानी चाहिए। राजनैतिक दलों व नेताओं की ‍स्थिति सामाजिक प्रबन्धक व न्यासी की होगी। वे निजी स्वार्थ के लिए किसी भी योजना में लाभार्थी नहीं हो सकते।

हमें चुने हुए लोग व चुनने वाले मतदाता के बीच की खाई को भी पाटना चाहिए। ताकत मिलने पर राजनीतिक प्रबन्धकों ने स्वयं को मजबूत किया जिसमें निजी धन संचय को प्राथमिकता पर रखा गया। यह गलत है दूसरी प्राथमिकता अपने विरोधियों को कमजोर करने के षडयन्‍त्र को दी, इसे रोकना चाहिए। प्रबन्ध विज्ञान का नियम है कि जब कोई अपने पद से अधिक शक्तिशाली हो जायेगा तो निर्णयों में त्रुटि आने लगेगी।

राजनीतिक प्रबन्ध की सही परिभाषा राष्ट्र में रह रहे प्रत्येक मनुष्य को समाजवादी समाज की ईकाई में परिवर्तित करने का विज्ञान है। जिसमें न तो कोई भूखा सोयेगा और न ही खुले आसमान को छत मानने को बाध्य होगा। यह कैसे होना है इसकी व्याख्या अलग-अलग राजनीतिक दल अपने हिसाब से करें। यही राजनीतिक दलों के सिद्धान्त होंगे। घोषणा पत्र अपूर्ण दस्तावेज हैं। वह मात्र कुछ बिन्दुओं या दिशाओं में किये जाने वाले कार्यों का वादा है। इसका विकल्प “नीति पत्र” है जिसमें सभी दिशाओं में क्रान्ति के निरन्तर प्रवाह की ऐसी संहिता हो, जिसमें केवल इच्छायें न होकर उनकी पूर्ति के लिए प्रयोग किये जाने वाले साधन व प्रक्रिया का विस्तृत उल्लेख हो। अभी राजनीति को मात्र सत्ता हस्तगत करने का चातुर्य ही समझा जाता है जहां लूली-लंगड़ी व्यवस्था पर सत्ता प्राप्त करने वाले मुखिया सवार होकर जनता को केवल इतना सन्देश देते हैं कि अब नौकरशाहों को उनके आदेशों के अनुरूप दायें-बायें होना है। उनका व्यवहार ट्रान्सफर उद्योग के उद्योगपति की तरह होता है। बड़े नेताओं के खास समझे जाने छुटभैयों के हिस्से में नीचे की अफसरों की कृतज्ञता आती है। घोषणा पत्रों में तो केवल इतना बताया जाता है कि इस सड़े-गले लिबास पर कहां-कहां पैबन्द लगाने की कसम हम खाते हैं।

ताज्जुब है कि डा. लोहिया या उनके समकक्ष समाजवादियों को छोड़ किसी ने नहीं कहा कि आजादी के बाद का हिन्दुस्तान बनाने के लिए पूरा लिबास बदलना पड़ेगा। अभी जो लिबास चलन में है उसकी स्थिति गरीब की इज्जत की तरह है, एक कोने को ढको तो दूसरे से धोती सरक जाती है। किसी भी अंग का गैर समानुपाती विकास भी विकलांग बना देता है। समाज में भी श्रम विभाजन का ऐसा दायरा बनाना पड़ेगा जिससे प्रत्येक व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा व रोटी की एक मानक परिधि में रहेगा और इसका दायरा इतना दरम्यानी हो जिससे न्यूनतम व अधिकतम की स्पष्ट परिभाषा हो सके। इसकी पैमाइश या खाई की चौड़ाई राजनीतिक दल अपनी सिद्धान्त पुस्तिका में करेंगे।

अभी ये हवाई बातें लगेंगी क्योंकि राजनीतिक दल वैज्ञानिक प्रबन्ध की ओर नहीं बढ़े हैं। किसी ने भी देश में रह रहे प्रत्येक नागरिक को स्वप्नशील व कर्मशील बनाने के लक्ष्य से संगठन तैयार नहीं किया। इसीलिए संगठनों में ऐसे प्रबन्धक भी नहीं हैं जो प्रगतिशील व समानुपाती व्यवस्था का रेखाचित्र बना पाते। सफाई और सम्पूर्ण सफाई में जो अन्तर है वहीं अधिकतम क्षमता व पूर्ण क्षमता में है। फर्श साफ करने में कुछ पत्थर साफ व कुछ अधूरे साफ और किनारे अछूते रहें तो उसे सफाई नहीं कहा जा सकता। वर्तमान में धर्म, जाति या वर्गों को लक्ष्य करके बातें की जाती हैं। सम्पूर्ण प्रबन्ध जिसे एक बार सम्पूर्ण क्रान्ति कहा गया था, के बारे में बहस चलाने का अवसर ही नहीं आ रहा है। कुछ दिशाओं में आंशिक क्षमता के बजाय सभी दिशाओं के सम्पूर्ण क्षमता का सिद्धान्त राजनीतिक दलों के अस्तित्व और नये युग में प्रवेश के लिए अनिवार्य तथ्य होगा।

लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। इन दिनों समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के हिस्से हैं। मेरठ निवासी गोपाल से संपर्क agarwal.mrt@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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