प्रधानमंत्री जी ये तो आधा सच है!

सर्वप्रथम प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बधाई कि उन्होंने यह स्वीकार कर ही लिया कि बांगलादेश की 25 फीसदी आबादी जमाते इस्लामी के प्रभाव में है जो भारत के कट्टर विरोधी हैं. हालांकि उन्होंने यह स्वीकारोक्ति देश के वरिष्ठ संपादकों के साथ हुई एक ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में कही. यह टिप्पणी रात को उनकी वेबसाइट पर भी डाली गई तथा लगभग 30 घण्टे तक साइट पर रहने के बाद उसे हटा लिया गया. सरकार को डर था कि इससे दोनों देश के बीच खटास ना पैदा हो जाये क्योंकि विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा जल्द ही बांगलादेश यात्रा पर निकलने वाले हैं.

सालों बाद किसी प्रधानमंत्री ने यह हिम्मत दिखाई क्योंकि कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व वाली सरकारें हमेशा से इसे नकारते रही हैं क्योंकि उन्हें भारत और बांगलादेश के रिश्ते खराब होने और पार्टी की सेकुलरवादी छवि पर बुरा असर पडऩे का इतना डर सताता रहा है, लेकिन सालों बाद किसी प्रधानमंत्री ने इसकी परवाह ना करते हुए यह तो स्वीकार कर ही लिया कि बांगलोदश की 25 फीसदी आबादी देशविरोधी है. वैसे पिछले साल जयपुर में हुए बम धमाकों में जिस तरह बांगलादेशियों के नाम सामने आये, उसने प्रधानमंत्री के कथन पर मुहर तो लगा ही दी है.

डॉ. मनमोहनसिंह बोलने से ज्यादा काम करने में यकीन रखते हैं लेकिन इस बार उन्होंने जो चिंता जाहिर की है, वह देश के प्रधानमंत्री से कई दिनों से अपेक्षित था. बांगलादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हो या बांगलादेश में हिन्दुओं की दयनीय स्थिति का, देश के राष्ट्रभक्त संगठन, धार्मिक संत और राजनीतिक पार्टियां हमेशा से इस मुद्दे को उठाते रहे हैं. पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने भी एक प्रस्ताव पारित करते हुए केन्द्र सरकार पर बांगलादेशी घुसपैठ पर सख्ती बरतने को कहा था. आरएसएस वर्षों से इस मुद्दे को उठाते आया है और बांगलादेश में हिन्दुओं के धर्मांतरण तथा उन पर होते जेहादी अत्याचार के विरोध में कई मंचों से अपनी आवाज बुलंद की और सरकार का ध्यान आगाह किया लेकिन अपने आपको धर्मनिरपेक्ष दिखने का ढोंग करने वाली राजनीतिक पार्टियों ने इस गंभीर मुद्दे पर कान ही नहीं धरे क्योंकि उन्हें देशहित से ज्यादा वोट बैंक की चिंता रही है. भारत-विभाजन, पाकिस्तान, बांगलादेश और श्रीलंका जैसे देशों के जन्म के पीछे भी यही कमजोरी थी.

देश में बांगलादेशियों की घुसपैठ असम से शुरू हुई. 1991 में तीस लाख बांगलादेशियों के रहने की बात तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. हितेश्वर सैकिया ने स्वीकारी थी. आश्चर्य कि पूरे देश में यह संख्या एक करोड़ से ऊपर पहुंच गई है. असम में बांगलादेशियों को खदेडऩे के लिये छह सालों तक आंदोलन चला और जब यह चरम पर था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आंदोलनकारी संगठनों के साथ वादा किया था कि असम-बांगलादेश सीमा पर बाड़ लगाई जायेगी मगर वह आज तक पूरा नहीं हो पाया. दरअसल कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों के ही नेता बांगलादेशी घुसपैठ को लेकर कभी गंभीर नही रहे. मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कांग्रेस ने बांगलादेशियों को हमेशा ही बचाया. याद दिला दें कि भारी दबाव के बीच असम में आईएमडीटी (विदेश) कानून एक्ट लागू किया गया था और यही देश के लिये सरदर्द बन गया. इस एक्ट के मुताबिक शिकायत करने वाले व्यक्ति को ही यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि वह जिस व्यक्ति पर आरोप लगा रहा है, वह बांगलादेशी है. नतीजन लोगों ने घुसपैठ पर आपत्ति करना बंद कर दिया. नतीजन अगप सांसद सर्वानंद सोनोवाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और आईएडी एक्ट रद्द हो गया. इस मुददे पर भाजपा ने भी सिर्फ दिखावे की कार्रवाई की जैसा कि उसने कश्मीरी पंडितों के साथ किया. सत्ता में आने तक उसने कश्मीरी हिन्दुओं की खासी चिंता की सहानुभूति रखी और उसे वोट बैंक में तब्दील कर जम्मू-कश्मीर में अपना जनाधार बढ़ाया लेकिन केन्द्र में लगभग दस वर्षों तक काबिज रहने के बाद भी उसने कश्मीरी पंडितों के लिये कुछ खास नहीं किया.

वैसे पूरे सच से अभी पर्दा उठना बाकी है. लेखक साफ कर देना चाहता है कि वह ना तो अल्पसंख्यक विरोधी है और ना ही बांगलादेश विरोधी. सवाल सिर्फ यह है कि जो मुसलमान अल्पसंख्यक होने का दावा कर हिन्दुस्तान में विशेष रियायतें या सुरक्षा चाहते हैं, वे मुस्लिम देशों में हिन्दुओं के साथ हो रही बर्बरता तथा धर्मांतरण के खिलाफ आवाज बुलंद क्यों नहीं करते? पाकिस्तान से लेकर बांगलादेश और जम्मू कश्मीर, सभी जगहों पर हिन्दुओं की दयनीय स्थिति है. उन्हें इस्लाम कबूल ना करने पर प्रताडऩा दी जाती है, मां-बेटियों के साथ अत्याचार होता है और जेहादी बनने से इंकार करने पर देश छोडऩे या जान से मारने की धमकी दी जाती है. आंकड़ों पर जायें तो बांगलादेश में 8 से 10 प्रतिशत हिन्दु ही बचे हैं जबकि पहले यह संख्या 28 फीसदी के आसपास थी. डॉ. सब्यसाची घोष ने अपनी पुस्तक इंपायर्स लास्ट कैजुअलटी में दावा किया है कि इस्लाम स्वीकार न करने के कारण अब तक 30 लाख हिन्दुओं की हत्या हो चुकी है.

हिन्दुओं के पास बांगलादेश में कोई अधिकार नहीं हैं. उनका शासन-प्रशासन में कोई हस्तक्षेप नहीं है. वहां पर पहले सभी धर्मों को समान महत्व था मगर जिया-उर-रहमान के धर्मनिरपेक्ष से बदलकर इस्लामी रूप देने और जनरल इरशाद ने जब से इस्लाम को राष्ट्रधर्म का दर्जा दिया, उसके बाद हिन्दु, ईसाई और बौद्ध सभी दूसरे दर्जें के नागरिक कहलाने लगे. नतीजन हिन्दुओं का दमन अभी भी जारी है. दुर्गा पूजा, कृष्ण जन्माष्टमी पर शाम तक पूजा करना सरकार ने निषेध कर रखा है. इस्लामी चरपंथी हिन्दुओं के उपासना स्थलों को तबाह कर रहे हैं, उनकी जमीनों पर कब्जा और हिन्दु लड़कियों से बलात्कार और बाद में धर्मांतरण आम बात हो चली है. ढाका विश्वविद्यालय में हिन्दु लड़कियों के साथ बदसलूकी आम बात है. उन्हें सिंदूर और बिंदी तक नहीं लगाने दी जाती. ऐतिहासिक रामना काली मंदिर को इसलिए तोड़ दिया गया क्योंकि हिन्दुओं ने चंदा देने से इंकार कर दिया था. दु:खद यह है कि ऐसा करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं होती और ना ही सजा मिलती है. ब्रिटेन के चर्चित लेखक रिचर्ड एल बेकिन की पुस्तक पर जायें तो देश को और बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं. भारत में एक नये तरह का जेहाद आ चुका है जिसमें पाकिस्तान और बांगलादेश के चरमपंथी मिले हुए हैं इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री की स्वीकारोक्ति के बाद कांग्रेस पार्टी और उसके गठबंधन वाली सरकार देशहित में कुछ ठोस कदम उठायेगी. और हां, भाजपा अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकती.

लेखक अनिल द्विवेदी छत्‍तीसगढ़ में संडे इंडियन में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट हैं.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *