प्रमोशन की रेस में हार रहे जिंदगी की दौड़

यूपी में प्रमोशन पाकर सब इंस्पेक्टर बनने के लिए होने वाली शारीरिक क्षमता परीक्षा (फिजिकल फिटनेस टेस्ट) पुलिसकर्मियों पर लगातार भारी पड़ रही है। प्रमोशन की ललक में जिस तरह एक-एक करके पुलिसकर्मी बेहोश हो रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं, वो सोचने को मजबूर करता है। प्रमोशन की रेस में जिंदगी की रेस को दांव पर लगा रहे पुलिसकर्मियों की मौत असल में पुलिस मकहमे की कार्यप्रणाली, लचर ट्रेनिंग इंतजाम और अस्त-व्यस्त डयूटी के बोझ तले दबे फिजीकली अनफिट पुलिसकर्मियों की तस्वीर पेश करती है। देश के लगभग हर राज्य पुलिस फिजीकली अनफिट पुलिसकर्मियों और अफसरों से जूझ रही है।

सेना और अर्धसैनिक बलों के जवान जहां चुस्त-दुरूस्त और सतर्क दिखाई देते हैं वहीं राज्य पुलिस के सिपाही से लेकर अफसर तक अनफिट, तोंदू और सुस्त नजर आते हैं। जिनके कंधों पर नागरिकों की रक्षा की अहम और प्रथम जिम्मेदारी है, वो रक्षा पंक्ति कितनी बीमार और अनफिट है वो यूपी में प्रमोशन रेस में बीमार और मरते सिपाहियों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है।

दरअसल, लंबे समय के बाद यूपी में सिपाहियों का दरोगा के पद पर प्रमोशन होने का प्रासेस चल रहा है। यूपी में सब-इंस्पेक्टर के करीब 5380 पद खाली हैं। इस पद पर प्रमोशन के लिए पिछले मार्च में कराए गए लिखित परीक्षा में 3892 कैंडिडेट पास घोषित किए गए थे। इन्हीं कैंडिडेटों का फिजिकली फिटनेस टेस्ट के तहत 10 किलोमीटर दौड़ की परीक्षा मेरठ, आजमगढ़, कानपुर और सीतापुर पुलिस सेंटरों में 20 जुलाई से चल रही है। अब तक 1470  कैंडिडेटों ने दौड़ परीक्षा पास कर ली हैं। यह दौड़ एसआई रैंक पाने के लिए आयोजित की जा रही है। आजमगढ़, मेरठ और कानपुर में आयोजित फिजिकल टेस्ट के दौरान तकरीबन 41 पुलिसकर्मी बेहोश हुए और आजमगढ़ में हुई रेस के दौरान बेहोश हुए 37 वर्षीय पुलिसकर्मी अली सुजमा की मौत हो गई।

पुलिसकर्मियों के लगातार बेहोश होने और मौत की घटनाओं की परवाह किये बिना मौत की दौड़ बदस्तूर जारी है। अब तक चार सिपाही अपनी जान गंवा चुके हैं। कई की याददाश्त जा चुकी है। अनेक बेहोश होकर जिंदगी-मौत से जूझ रहे हैं। हाल ही में जिंदगी की रेस में फेल होने वाले दो सिपाहियों और इसके चलते ही बीमार पड़े 6 दर्जन सिपाहियों की खबर के बावजूद प्रमोशन बनाम लाइफ रेस का खेल यूपी में आगे जारी रहेगा। राज्य के स्पेशल डीजीपी बृजलाल ने यूपी के पुलिसकर्मियों से स्पष्ट किया है कि यदि वे अपने को फिजिकली फिट नहीं महसूस कर रहे हैं, तो वे प्रमोशन रेस में हिस्सा नहीं लें। बृजलाल ने माना कि कई जवान मोटापा-ब्लडप्रेशर एवं मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रस्त हैं, तभी इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। स्पेशल डीजीपी का कहना है कि जिंदगी ज्यादा महत्वपूर्ण है, पहले फिट हों, तभी प्रमोशन की रेस के बारे में सोचें। उनके अनुसार फिजिकल फिटनेस दौड़ यूपी में रोकी नहीं जाएगी। फिट सिपाही ही सब-इंस्पेक्टर बनने का पात्र होगा।

गौरतलब है कि देशभर में राज्य पुलिस के जवान अल्प साधनों और संसाधनों और अस्त-व्यस्त दिनचर्या के साथ जीवन यापन करते हैं। किसी भी राज्य में पुलिसकर्मियों के काम के घंटे निर्धारित नहीं हैं। वहीं पुलिसकर्मियों की कमी भी बड़ा मुद्दा है। आंकड़ों पर गौर करें तो देश में 1 लाख की आबादी के अनुपात में 142 पुलिसकर्मी तैनात हैं जो कि विश्‍व के तमाम छोटे-बड़े मुल्कों के मुकाबले काफी कम है। संविधान के अनुच्छेद सात के अंर्तगत ‘पुलिस’ और ‘लॉ एण्ड ऑर्डर’  राज्य सूची का विषय है। नागरिकों की सुरक्षा और सहायता के लिए बना पुलिस महकमा खुद कितना बीमार, ढीला, सुस्त और लाचार है ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है।

बेसिक ट्रेनिंग के बाद एकाध के अलावा किसी पुलिसकर्मी का फिजीकल फिटनेस से कोई नाता नहीं रहता है। ऊंचे पदों पर आसीन पुलिस अफसरों के लिए तो राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग और स्पेशल कोर्सेज की व्यवस्था का प्रावधान है लेकिन महकमे के मेरूदण्ड सिपाही से लेकर इंस्‍पेक्टर तक के लिए ट्रेनिंग का खास इंतजाम नहीं है। अधिकतर पुलिसवाले चौबीस घंटे डयूटी पर ही रहते हैं। उनके खाने, पीने और आराम का कोई निश्चित समय नहीं है। और ये बात समझ से परे है कि कोई व्यक्ति बिना खाये-पिये और आराम किये चौबीस घंटे पूरी ईमानदारी, निष्ठा और सर्तकता से डयूटी कर सकता है? वहीं अनियमित दिनचर्या से फिजिकल फिटनेस और शारीरिक क्षमता का क्षय होना स्वाभाविक है। सेना और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवान सारा साल फिजिकल फिटनिस और ड्रिल से जुड़े रहते हैं। लेकिन राज्य पुलिस के जवानों और अफसरों को वीआईपी डयूटी, थाना, कोर्ट कचहरी और वसूली से ही फुर्सत नहीं मिलती तो वो भला फिजीकल फिटनेस पर क्या ध्यान देंगे। दोष उस सिस्टम और लचर कानून का भी जिसके सहारे तथाकथित हाईटेक पुलिसिंग देश में काम करती है।

पुलिस महकमे के सुधार और पुलिस कर्मियों को बेहतर सुविधाएं दिलाने की गरज से कई आयोग और दर्जनों सिफारिशें सरकारी फाइलों में दबी पड़ी है। ये कड़वी सच्चाई है कि थानो में बिजली, पानी, टायलेट, स्टेशनरी और तमाम दूसरी सुविधाओं का सर्वथा अभाव ही रहता है। महकमे से जितना बजट किसी थाने को मिलता है उससे तीन बंडल पेपर खरीद पाना भी बड़ी बात है। जिन पुलिसकर्मियों के भरोसे लाखों लोगों की जान और माल की सुरक्षा की अहम् जिम्मेदारी है जब वो ही अनफिट और बीमार होंगे तो आम आदमी किसके सहारे खुद को सुरक्षित महसूस करेगा। जरूरत वक्त रहते पुलिस महकमे को चुस्त-दुरूस्त करने और फिजिकल फिट करने की है तभी वो आने वाले समय की चुनौतियों और संकटों का सामना पूरी मुस्तैदी से कर पाएंगे।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार तथा लखनऊ के निवासी हैं.

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