फिजा-चांद की कहानी और मीडिया

आदित्य चौधरीपिछले कई दिन से मसालेदार फिल्मी ड्रामे के लिए तरस रहे मीडिया के लिए सोमवार का दिन “राहत ” लेकर आया. पूर्व में न्यूज चैनेल्स  के लिए सबसे बड़ी खबर बन चुकी चांद और फिजा की जोड़ी एक बार फिर से नया ड्रामा लेकर मीडिया के सामने थी. एक न्यूज चैनल पर खबर आते ही चंडीगढ़ में हड़कंप मच गया।

इस हड़कंप के पीछे सभी चैनल्स के हेड आफिस से आई उस कॉल का भी बड़ा हाथ था जिसमे फिजा का वन टू वन अविलम्ब मांगा गया था. फ़िर क्या था, देखते ही देखते फिजा का चेहरा और उनका दुख राष्ट्रीय समस्या बन गया. सारे चैनेल इसी खबर के पीछे पड़ गये. कोई फिजा का वन टू वन चला रहा था तो कोई उसका फोनो, खबर ये थी की फिजां का चांद गायब हो गया, हालांकि चांद जी को अक्सर गायब होने की आदत है लेकिन इससे पहले वे जब भी गायब हुए, कोई इस तरह चैनल्स पर उनके लिए रोया नहीं था. कई घंटे तक खबर चलती रही तो अचानक चांद ने मीडिया के कुछ पत्रकारों से संपर्क करके कहा कि न उनका अपहरण हुआ न वो गायब हुए, बस अपनी मर्जी से कहीं घूमने निकले हैं.

जब मीडिया ने उनसे सवाल किया कि ये सब ड्रामा क्यूं किया तो उनका कहना था की ड्रामा उन्होंने नहीं किया बल्कि मीडिया ने किया है. उन्होंने किसी को बुलाकर नहीं कहा था की उसके बारे में खबर चलाई जाए, इससे भी आगे बढ़कर वो मीडिया को ये भी बताने लगे की उन्हें कैसे रिपोर्टिंग करनी चाहिए. बड़ा सवाल ये भी पैदा होता है कि आखिर ये नौबत क्यूं आई है कि कोई राजनेता रिपोर्टिंग सिखा रहा है. दरअसल चांद पूर्व में चंद्रमोहन के नाम से जाने जाते थे और हरियाणा की राजनीति में बड़े रसूख वाले भजनलाल के बेटे है. प्यार में पागल होकर इन्होंने अनुराधा नाम की एक महिला से शादी कर ली. अनुराधा ने भी अपना नाम बदल लिया और ये बन गए चांद मोहम्मद और फिजा. एक महीना गायब रहने के बाद ये जब दिसम्बर में वापस आए तब स्टार न्यूज के जगविंदर पटियाल ने ही इस खबर और  इन दोनों के इंटरव्यू को लोगों के सामने पेश किया था.

डिप्टी सीम के बड़े पद के आदमी का इस तरह से प्यार में पागल होकर शादी करना और धरम तक बदल लेना बहुत बड़ी खबर थी. इस खबर को एक न्यूज चैनल ने कई दिन तक भुनाया. इस दौरान बाकी सभी चैनल अपने रिपोर्टर्स की क्लास लेते रहे की आखिर इतनी बड़ी खबर में वो पीछे क्यों रह गए. लेकिन कोई कुछ न कर पाया. चांद और फिजा मोहाली लौटे तो सारे चैनल्स की सांस में सांस आई और सभी ने  ने उनको लेकर घंटों के कार्यक्रम बनाए. कई ने चांद और फिजा को दिल्ली बुलाया अपने स्टूडियो में. उस समय खबर ने खूब टीआरपी बटोरी तो भला इस बार चैनल्स क्यों पीछे रहते. स्टार के बाद सभी चैनल्स ने इस खबर को पीटना शुरू कर दिया. मंगलवार को एक बड़े समाचार चैनल ने एक खबर ब्रेक की कि चांद की जुदाई से दुखी फिजा ने नींद की गोलिया खाकर आत्महत्या की कोशिश की. इसके बाद यह खबर सभी चैनलों ने एक के बाद एक करके ब्रेक कर दी और कुछ ही देर बाद एक चैनल को छोड़कर सभी पर फिजा के शॉट भी चलने लगे जिसमे फिजा को बेहोशी की हालत में गाड़ी में बिठाने और अस्पताल ले जाने के दृश्य थे. इसके बाद सभी कोशिश में थे कि इस गंभीर मामले में कुछ न कुछ ब्रेक करते रहें. ऐसा होता भी रहा. हालांकि इसमे न कोई खबर थी न ब्रेक करने लायक कोई मसला.

पूरे दिन ये खबर चली. शाम को एक धीर-गंभीर चैनल ने इस पर आधा घंटा महेश भट्ट, शेखर सुमन, गिरिजा व्यास और स्वामी इन्द्रवेश को बिठाकर चर्चा की, इस आधे घंटे में एक बार इन्द्रवेश ने ये कहकर मीडिया को आइना दिखने की कोशिश की कि देश की और समस्याएं खत्म हो गई हैं क्या जो इस मामले को इतना बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जा रहा है. उन्होंने ये भी कहा कि अगर कोई नींद की गोली खाता है तो खाए, आख़िर मीडिया देश की दूसरी बड़ी समस्याओं को छोड़कर ऐसे बेतुकी खबरों के पीछे क्यों पड़ता है. शेखर सुमन ने भी इससे इत्तेफाक किया. पूरी बातचीत का लब्बोलुआब ये था कि ऐसी खबरें दिखाई ही नहीं जानी चाहिए और मीडिया को किसी की निजी जिंदगी के घरेलू झगड़े को राष्ट्रीय मुद्दा या समस्या नहीं बनाना चाहिए. कमाल ये था कि इस खबर में हर पल कुछ न कुछ ड्रामा भी चल रहा था.

बुधवार को फिजा जैसे ही अस्पताल से छुट्टी करके निकली तो निकलते ही मीडिया पर बरस पड़ी और मीडिया को रिपोर्टिंग सिखाने लगीं. उनका कहना था कि मीडिया ने उनके बारे में गलत खबरें दिखाई हैं जो गलत है. उन्होंने किसी को अपने घर नही बुलाया और मीडिया खुद उनके घर आया था. जबकि पहले दिन उन्होंने ही मीडिया को बुलावा दे कर पूरे मामले को मीडिया की सुर्खी बनवाया था. ऐसे में उन्होंने जो आरोप मीडिया पर लगाए वो काफी हद तक गलत थे. कमाल की बात ये है कि चांद की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस को देने के फिजा के बयान को भी पुलिस ने गलत ही बताया लेकिन फिजा की झिड़की और सीख के बाद भी मीडिया ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और रात तक उनके घर पर डटा  रहा. चार न्यूज चैनल्स की ओबी वैन भी वहां तैनात रही। फिजा और मीडिया का तमाशा पड़ोसी भी देर रात तक देखते रहे. सभी के दिल में सवाल थे कि जब जरूरत होती है तो मीडिया खबर दिखने से मना कर देता है और जिसका मतलब कोई नहीं उस पर मीडिया में घंटो बहस होती है. टीवी के साथ अखबारों ने भी इस मामले को पूरा स्पेस दिया, लगभग सभी अखबारों ने इस मसले को मेन और लोकल पुलआउट में मेन लीड खबर के तौर पर पेश किया.

इस मामले ने एक बार फिर से ये सवाल खड़ा किया है कि क्या मीडिया को किसी की निजी जिंदगी में इस तरह से घुसना चाहिए और क्या इस तरह की खबरों पर घंटों के कार्यक्रम बनाए जाने चाहिए? बड़ा सवाल ये भी है कि अस्पताल से घर तक पहुंचते पहुंचते फिजा ने 3 बार मीडिया को संबोधित किया और ये साबित करने की कोशिश की कि मीडिया गलत खबरें चला रह है जो सही नहीं है. उसने मीडियाकर्मियों को पुलिस वालों की तरह पूछताछ न करने की हिदायत दी और काफी हद तक मीडिया का इस्तेमाल करती नजर आई फिर भी मीडिया उनके पीछे पड़ा रहा. क्या ये सही है? मीडिया इतना गया गुजरा हो गया है कि वो इस तरह किसी के पीछे पड़ा रहे जबकि वो मीडिया को नसीहत देता रहे और साथ ही ये भी कि मीडिया तब पीछे पड़े जब उस खबर से न सामाजिक सरोकार जुड़े हैं और न ही देश का कोई भला होने वाला है.


लेखक आदित्य चौधरी पिछले 10 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं। वे चंडीगढ़ में टीवी पत्रकार हैं। उनसे adityakuk@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

 

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