बस बहुत हो गया, आओ अब लौट चलें

मदन कुमार तिवारी हमें लौटना होगा। जमीन हमारी मां है। इसका उपयोग सदियों से अनाज उगाने के लिये हम करते आये हैं। उसी अनाज को दुबारा बीज के रूप में उपयोग करते हैं। बस हमें आज भी यही करने दिया जाय। मत लो हमारी जमीन। नहीं चाहिये यह विकास जहां हम मुर्दे बनकर रह गये हैं। जहां लाख रुपया हो तभी आपका बेटा पढ़ सकता है। दस लाख हो तो कोचिंग ले सकता है, आईआईटी की, आईएएस की। बस बहुत हुआ लौटा दो 1990 के पहले का देश। गरीब मर रहा है, आम आदमी चोर बन रहा है, भ्रष्ट बन रहा है, बेटे की शिक्षा के लिये, मकान के लिये, बेटी के दहेज के लिये,  बस बहुत हुआ। बच्चों का बचपन खो गया, सुबह चार बजे उठते हैं, स्कूल जाना है, होम वर्क है, आखिर यह सब किस लिये? पढ़कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नौकर बनने के लिये?

अब नहीं सहा जाता। पढ़कर आता है बेटा, नौकरी की तलाश, अगर अमीर का बेटा है तो बडे़ कालेज से निकलेगा, इसलिये नहीं की बहुत तेज बुद्धि है। शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। स्कूल या कालेज की पढ़ाई सिर्फ़ दिखाने भर को है। कोचिंग चाहिये, उसके लिये पैसा चाहिये। इंजीनियरिंग की कोचिंग करवानी है तो चल जाओ कोटा, डेढ-दो लाख कोचिंग का खर्च फ़िर रहने का। सबमिलाकर चार-पांच लाख,  तब बेटे का दाखिला होगा अच्छे कालेज में। समझना कठिन नहीं कि इन कोचिंग संस्थानों को पता रहता है किस प्रकार के प्रश्न आयेंगे यह सब पैसे का खेल है, जैसे पासपोर्ट कार्यालय में दलाल, या रेलवे के दलाल, उसी तरह शिक्षा के दलाल हैं इन्हें पता है, प्रश्न कौन सेट करता है, उसकी कीमत क्या है?  किसी तरह एक आम आदमी का बेटा अगर पढ़कर साधारण नौकरी पा भी गया तो वहां भी परेशानी,  सुबह निकलता है नौकरी के लिये, लौटता है थक कर रात दस बजे, मां-बाप को साथ नहीं रख पाता क्यों? यह कैसा विकास? कहने को आठ घंटे की नौकरी, लेकिन बारह घंटे  खटना है।

महानगरों की भागदौड़ क्यों? गांव, छोटे शहर मर रहे हैं धीरे-धीरे, मेट्रो, लाल बस, ओवर ब्रिज, कहीं पीने का पानी भी नही, यह क्या है? बुढे, लाचार, अक्षम रह गये हैं गांवों में और वहीं बसती है भारत की आत्मा। बीमार है आत्मा, मर जायेगी, लाश के रूप में रिश्तों की दरकन होगी, टूटते संबंध होंगे। यह सब किसके लिये? इंसान को मशीन बना देने के लिये, संवेदनाओं को मार देने के लिये। कोई मर रहा हो अस्पताल ले जाने का समय नहीं, क्योंकि आफ़िस का समय है। मां का फ़ोन आया है, पिताजी बीमार हैं, ले आने का मन है,  बड़ा शहर है,  अच्छा इलाज होगा, लेकिन खुद को रहने की जगह नही, पिताजी कहां रहेंगे। महानगर अपने आसपास के गांवों को सुरसा की तरह मुंह फ़ाड कर निगल रहा है। शहर का दायरा बढ़ता जा रहा है, गांव के खेत सिमट रहे हैं। रिश्तों का मीठापन दुनियादारी की भेंट चढ़ रहा है। किसान रो रहे हैं, मेरे खेत न लो। नहीं चाहिये फ़ैक्टरी। सरकार कह रही है पैसे ले लो कितना चाहिये, लेकिन पोस्को को खुलने दो। दैत्य की तरह अपना आकार बढ़ा रही हैं बड़ी कंपनियां। बड़ी-बड़ी इमारतें और सिकुड़ते रिश्ते।

क्या विकास का अर्थ है, जो पहले से है उसे छीन लेना या फ़िर खुशियों और सुविधाओ को बढ़ाना। सुविधायें तो बढ़ी लेकिन बहुत महंगी हो गईं, जिनके लिये सोचा था, उनकी पहुंच से बाहर। नर्मदा पर डैम बनाते हो गांवों को उजाड़कर, क्या कभी किसी शहर को उजाड़ कर गांव बसाने की भी सोची है। बसा भी नहीं सकते। एक बार कंक्रीट का जाल जहां फ़ैल जाता है बंजर हो जाती है जमीन। नेचर ने खेत दिये अन्न उगाने के लिये, कोई प्रयास करो न करो खुद उग आते हैं पौधे और पेड़। जंगलों को देखा है, न खाद न पानी लेकिन हरियाली भरपूर। भूमंडलीकरणवादी अगर जंगल पहुंच जायेंगे तो उसका भी कर देंगे विकास रूपी विनाश। रूको अभी भी वक्त है। शुरुआत करो गांवों से। हर स्कूल एक जैसा, हर स्वास्थ्य केन्द्र एक समान, मुफ़्त शिक्षा और चिकित्सा।

जिस अंतिम आदमी तक विकास की किरण पहुंचाने का वादा करते हो, वह तो छुपा बैठा है तुम्हारे विकास के डर से। उसको दोगे क्या,  जो है उसके पास वह भी छीन रहे हो। उसका खेत उसका न रहा, उसके बच्चे रोजी-रोटी के लिये महानगरों के मुहताज। तुम्हारा विकास रिश्ते को तार-तार कर देगा। हर बच्चे का छह बाप होगा, हर औरत का आठ-दस पति। आज उसके साथ कल दूसरे के साथ यही होगा तुम्हारे विकास का हाल,  फ़िर करोगे तलाश शांति की। 40  वर्ष पहले देखा था गांवों में शौचालय नहीं, ४० वर्ष बाद भी हालात वही। दो हजार में बनावा रहे हो शौचालय, कितने दिन टिकेंगे। क्या सबसे पहले यह जरुरी नहीं था। क्या बिजली से ज्यादा इसकी जरुरत नहीं थी। बस बहुत हुआ अब रुक जाओ। आओ लौट चलें समाजवाद की ओर। नहीं चाहिये बिडला-अंबानी, हमें चाहिये बच्चों की मुस्कान माई-बाबूजी का साथ। रिश्तों की गरमाहट, एक ही जैसे स्कूल में पढ़ते बच्चे। एक ही अस्पताल में इलाज।

लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.

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