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बांसगांव की मुनमुन (चौदह)

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : और यह देखिए सुबह का सूरज सचमुच मुनमुन के लिए खुशियों की कई किरन ले कर उगा। अख़बार में ख़बर छपी थी कि सभी शिक्षा मित्रों को ट्रेनिंग दे कर नियमित किया जाएगा। दोपहर तक डाकिया एक चिट्ठी दे गया। चिट्ठी क्या पी. सी. एस. परीक्षा का प्रवेश पत्र था। मुनमुन ने प्रवेश पत्र चहकते हुए अम्मा को दिखाया तो अम्मा भावुक हो गईं। बोली, ‘तो अब तुम भी अधिकारी बन जाओगी?’ और फिर जैसे उन का मन कांप उठा और बोलीं, ‘अपने भइया लोगों की तरह!’

: दयानंद पांडेय का उपन्‍यास : और यह देखिए सुबह का सूरज सचमुच मुनमुन के लिए खुशियों की कई किरन ले कर उगा। अख़बार में ख़बर छपी थी कि सभी शिक्षा मित्रों को ट्रेनिंग दे कर नियमित किया जाएगा। दोपहर तक डाकिया एक चिट्ठी दे गया। चिट्ठी क्या पी. सी. एस. परीक्षा का प्रवेश पत्र था। मुनमुन ने प्रवेश पत्र चहकते हुए अम्मा को दिखाया तो अम्मा भावुक हो गईं। बोली, ‘तो अब तुम भी अधिकारी बन जाओगी?’ और फिर जैसे उन का मन कांप उठा और बोलीं, ‘अपने भइया लोगों की तरह!’

मुनमुन अम्मा का डर समझ गई। अम्मा को अंकवार में भर कर बोली, ‘नहीं अम्मा, भइया लोगों की तरह नहीं, तुम्हारी बिटिया की तरह! पर अभी तो दिल्ली बहुत दूर है। देखो क्या होता है?’

पीसीएस की तैयारी तो आधी अधूरी पहले ही से थी, उस की। पर मुनक्का राय की सलाह मान कर मुनमुन ने स्कूल से छुट्टी ले ली। लंबी मेडिकल लीव। और तैयारी में लग गई। दिन-रात एक कर दिया। वह भूल गई बाक़ी सब कुछ। जैसे उस की ज़िंदगी में पीसीएस के इम्तहान के सिवाय कुछ रह ही नहीं गया था। बांसगांव के लोग तरस गए मुनमुन की एक झलक भर पाने के लिए। बांसगांव की धूल भरी सड़क जैसे उसकी राह देखती रहती। पर वह घर से निकलती ही नहीं थी। वह अंदर ही अंदर अपने को नए ढंग से रच रही थी। गोया खुद अपने ही गर्भ में हो। खुद ही मां हो, खुद ही भ्रूण। ऐसे जैसे सृजनकर्ता अपना सृजन खुद करे। बिखरे हुए को सृजन में संवरते -बनते अगर देखना हो तो तब मुनमुन को देखा जा सकता था। वह कबीर को गुनगुनाती, ‘खुद ही डंडी, खुद ही तराजू, खुद ही बैठा तोलता।’ वह अपने ही को तौल रही थी। एक नई आग और एक नई अग्नि परीक्षा से गुज़रती मुनमुन जानती थी कि अगर अब की वह नहीं उबरी तो फिर कभी नहीं उबर पाएगी। जीवन जीना है कि नरक जीना है सब कुछ इस परीक्षा परिणाम पर मुनःसर करता है, यह वह जानती थी। अम्मा कुछ टोकतीं तो मुनक्का रोकते हुए कहते, ‘मत रोको, सोना आग में तप रहा है, तपने दो!’

जाने यह संयोग था कि मुनमुन का प्रेम कि मुनमुन की इस तैयारी के समय मुनक्का राय और श्रीमती मुनक्का राय दोनों ही कभी बीमार नहीं पड़े। न कोई आर्थिक चिंता आई। हां, इधर राहुल का भेजा पैसा आया था सो मुनमुन को वेतन न मिलने के बावजूद घर खर्च में बाधा नहीं आई। बीच में दो बार मुनमुन के स्कूल के हेड मास्टर भी आए ‘बीमार’ मुनमुन को देखने।  पर वह उन से भी नहीं मिली। मुनक्का राय से ही मिल कर वह लौट गए।

कहते हैं न कि जैसे सब का समय फिरता है वैसे मुनमुन के दिन भी फिरे। समय ज़रूर लगा। पर जो मुनक्का राय कहते थे कि, ‘सोना आग में तप रहा है, तपने दो!’ वह सोना सचमुच तप गया था। मुनमुन पीसीएस मेन में सेलेक्ट हो गई थी। अख़बारों की ख़बरों से बांसगांव ने जाना। पर अब की इस ख़बर पर आह भरने के लिए गिरधारी राय नहीं थे। न ही ललकार कर मुनमुन के नाम से चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी। मुनमुन ने तिवारी जी को इस मौके़ पर बहुत मिस किया। बधाई देने वाले, लड्डू खाने वाले लोग बहुत आए बांसगांव में उस के घर। पर मुनमुन के भाइयों का फ़ोन भी नहीं आया। न ही घनश्याम राय या राधेश्याम राय का फ़ोन। दीपक को फ़ोन कर के ज़रूर मुनमुन ने आशीर्वाद मांगा। दीपक ने दिल खोल कर आशीर्वाद दिया भी। हां, रीता आई और थाईलैंड से विनीता की बधाई भी फ़ोन पर। बहुत बाद में राहुल ने भी फ़ोन कर खुशी जताई।

ट्रेनिंग-व्रेनिंग पूरी होने के बाद मुनमुन अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक तहसील में एसडीएम तैनात हो गई है। बांसगांव से आते वक्त उस ने अम्मा, बाबू जी को अकेला नहीं छोड़ा। बाबू जी से बोली, ‘छोड़िए यह प्रेक्टिस का मोह और चलिए अपनी रानी बिटिया के साथ!‘

‘अब बेटी की कमाई का अन्न खाएंगे हम लोग?’ अम्मा बोलीं, ‘राम-राम, पाप न पड़ेगा!’

लेकिन मुनक्का राय चुप ही रहे। पर जब मुनमुन ने बहुत दबाव डाला तो वह धीरे से बोले, ‘तो क्या इस घर में ताला डाल दें?’

‘और क्या करेंगे?’ मुनमुन बोली, ‘अब मैं आप लोगों को इस तरह अकेला नहीं छोड़ सकती!‘ फिर उसने जोड़ा, ‘छुट्टियों में आते रहेंगे!’

‘फिर तो ठीक है!’ मुनक्का राय को जैसे राह मिल गई।

‘लेकिन!’ मुनमुन की अम्मा ने प्रतिवाद किया।

‘कुछ नहीं अब चलो!’ मुनक्का राय बोले, ‘इस का भी हम पर हक़ है। अभी तक हमारे कहने पर यह चली। अब समय आ गया है कि इस के कहे पर हम चलें।’ वह ज़रा रुके और पत्नी का हाथ थाम कर बोले, ‘चलो बेटी चलते हैं।’

मुकदमों की सारी फाइलें वग़ैरह उन्हों ने जूनियरों और मुंशी के सिपुर्द की। घर का बाहर वाला कमरा जूनियरों को चैंबर बनाने के लिए दे दिया। और अपनी नेम प्लेट दिखाते हुए जूनियरों से बोले, ‘यह नाम यहां और बांसगांव में बना रहना चाहिए। उतारना नहीं यह नेम प्लेट और न ही हमारे नाम पर बट्टा लगाना। और हां घर में दीया बत्ती करते रहना। मतलब लाइट जलाते रहना।’ जूनियरों ने हां में हां मिलाई।

बाक़ी घर में ताला लगाते हुए मुनक्का राय बांसगांव से विदा हुए सपत्नीक मुनमुन बेटी के साथ। और बोले, ‘देखते हैं आबोदाना अब कहां-कहां ले जाता है!’ फिर एक लंबी सांस ली। संयोग ही था कि पड़ोसी ज़िले में धीरज भी अब सीडीओ हो गया था। कभी कभार कमिश्नर की मीटिंग में धीरज, मुनमुन आमने-सामने पड़ जाते हैं तो मुनमुन झुक कर धीरज के चरण स्पर्श करती है। धीरज भी मुनमुन के सिर पर हाथ रख कर आशीष देता है। पर कोई संवाद नहीं होता दोनों के बीच। न सार्वजनिक रूप से न व्यक्तिगत रूप से।

ऐसी ही किसी मीटिंग के लिए एक दिन जब मुनमुन कलफ लगी साड़ी में गॉगल्स लगाए अपनी जीप से उतर रही थी तो वह बीएसए सामने पड़ गया, जिसने सुनीता के पति की शिकायत पर उस से जवाब तलब करने के लिए उस को बुलाया था। देखते ही वह चौंका और ज़रा अदब से बोला, ‘मैम आप !’और फिर जैसे उछलते हुए बोला, ‘आप तो बांसगांव वाली मुनमुन मैम हैं!’

‘हूं।’ वह गॉगल्स ज़रा ढीला करती बोली, ‘आप?’

‘अरे मैम मैं फला बीएसए।’ वह ज़रा अदब से बोला, ‘जब आप ……. !’

‘शिक्षा मित्र थी….!’

‘जी मैम, जी…. जी!’

‘तो?’ मुनमुन ने ज़रा तरेरा!

‘कुछ नहीं मैम, कुछ नहीं। प्रणाम!’ वह जैसे हकला पड़ा।

‘इट्स ओ.के.!’ कह कर मुनमुन बिलकुल अफ़सरी अंदाज़ में आगे निकली। तब तक धीरज अपनी कार से उतरता सामने पड़ गया। तो उसने हमेशा की तरह झुक कर चरण स्पर्श किया। और धीरज ने भी हमेशा की तरह उस के सिर पर हाथ रख कर आशीष दिया। निःशब्द! इस बीच मुनमुन ने कानूनी रूप से राधेश्याम को गुपचुप तलाक भी दे दिया। बड़ी खामोशी से। भाइयों को यह भी पता नहीं चला।

हां, राधेश्याम अब भी कभी कभार पी-पा कर बांसगांव आ जाता है। कभी मुनक्का राय के ताला लगे घर का दरवाज़ा पीटता है तो कभी पड़ोसियों के दरवाजे़ पीटता है। इस फेर में वह अकसर पिट जाता है। पर उसे इस का बहुत अफ़सोस नहीं होता। वह तो बुदबुदाता रहता है कि, ‘मुनमुन मेरी है!’ लोग उसे बताते भी हैं कि मुनमुन अब यहां नहीं रहती। अब वह भी अपने भाइयों की तरह अफ़सर हो गई है। राधेश्याम बहकते हुए लड़खड़ाती आवाज़ में कहता है, ‘तो क्या हुआ! है तो मेरी मुनमुन!’

मुनमुन भी कभी कभार अम्मा बाबू जी को ले कर बांसगांव आ जाती है। क्या करे वह बेबस हो जाती है। वह रहे कहीं भी पर उस के दिल में धड़कता तो बांसगांव ही है। बांसगांव की बेचैनी उसके मन से कभी जाती नहीं। कभी-कभी वह हेरती है उन तिवारी जी को बांसगांव के बस स्टैंड पर जो मुनमुन नाम से एक समय चनाजोर गरम बेचते थे। वह तिवारी जी, जो वह जानती है कि अब जीवित नहीं हैं। तो भी। करे भी तो क्या वह! सुख-दुख, मान-अपमान, सफलता-असफलता सब कुछ दिखाया इस बांसगांव ने। अल्हड़ जवानी भी बांसगांव की बांसुरी पर ही उसने गाई, सुनी और गुनी। और फिर जवानी बरबाद भी इसी बांसगांव के बरगद की छांव में हुई। उन दिनों वह गाती भी थी, ‘बरबाद कजरवा हो गइलैं !’तो भला कैसे भूल जाए इस आबाद और बरबाद बांसगांव को यह बांसगांव की मुनमुन। संभव ही नहीं जब तक वह जिएगी, जैसे भी जिएगी, बांसगांव तो उसके सीने में धड़केगा ही। लोग जब तब उस के बदले अंदाज़ या साहबी ठाट-बाट पर चकित होते हैं या उस से उस के संघर्ष पर बात करते हैं तो वह लोगों से कहती है, ‘स्थाई तो कुछ भी नहीं होता। सब कुछ बदलता रहता है। सुख हो,दुख हो या समय। बदलना तो सब को ही है।’ फिर वह जैसे बुदबुदाती है, ‘हां, यह बांसगांव नहीं बदलता तो क्या करें?’

‘उ तो सब ठीक है।’ एक पड़ोसिन कहती है, ‘मुनमुन बहिनी शादी कब कर रही हो?’

मुनमुन चुप लगा जाती है। जहां मुनमुन एस. डी. एम. है वहां भी अधिकरी कॉलोनी में उस की एक पड़ोसी औरत ने उसी के घर में उसी से ठीक मुनक्का राय के सामने पूछ लिया है, ‘दीदी आप ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’ वह मुनमुन के विवाह और तलाक के बारे में नहीं जानती। यहां कोई भी नहीं जानता। मुनमुन जनाना भी नहीं चाहती। पर वह औरत अपना सवाल फिर दुहराती है कि, ‘दीदी आप ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’

‘इन्हीं से पूछिए !’ मुनमुन धीरे से बाबू जी को इंगित करते हुए कहती है।

मुनक्का राय ने कोई जवाब देने के बजाय छड़ी उठा ली है। और टहलने निकल गए हैं। रास्ते में सोच रहे हैं कि क्या मुनमुन अब अपना वर भी खुद ही नहीं ढूंढ सकती? कि वह ही फिर से ढूंढना शुरू करें। मुनमुन के लिए कोई उपयुक्त वर। क्या अख़बारों में विज्ञापन दे दें? या इंटरनेट पर? घर लौटते वक्त वह सोचते हैं कि आज वह इस बारे में मुनमुन से स्पष्ट बात करेंगे। वह अपने आप से ही बुदबुदाते भी हैं, ‘चाहे जो हो शादी तो करनी ही है मुनमुन बिटिया की!’

समाप्‍त

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’  नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इस उपन्‍यास के पहले के भागों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंगों पर क्लिक करें. दयानंद पांडेय के अन्‍य लेखों को पढ़ने के लिए सर्च बाक्‍स में उनका नाम डालकर खोजें.

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