शनिवार की रात साढ़े 11 बजे दिल्ली पुलिस के एक महान अफसर रामलीला मैदान जाते हैं और बारीकी से मौका मुआयना करके वापस चले आते हैं। ठीक 11 बजकर 50 मिनट पर सो रहे देश को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बताता है कि पांच हजार पुलिस, सीआरपी और आरएएफ के जवानों ने रामलीला मैदान को घेर लिया है। साढ़े 12 बजे पता चलता है कि बाबा रामदेव को मंच के पीछे से पुलिस उठाकर ले जा रही थी और तब वे मंच पर आ गए थे। उनके समर्थक उन्हें घेर लेते हैं और खबर यह आती है कि पुलिस ने योग शिविर की अनुमति रद्द करके रामलीला मैदान में धारा-144 लगा दी है। रात 1.20 बजे पुलिस पंडाल में घुसती है और सत्याग्रहियों के साथ बदसलूकी प्रारंभ कर देती है।
ठीक तभी 15 फीट ऊंचे मंच से कूदकर रामदेव समर्थकों के बीच आ जाते हैं और अपने एक समर्थक के कंधों पर बैठकर पुलिस से गुंडगर्दी न करने, अपने समर्थकों से गांधीजी व उनकी अहिंसा को याद रखने और प्रधानमंत्री से अपील करते हैं कि वे गिरफ्तार होने को तैयार हैं, पर उन्हें सुबह गिरफ्तार किया जाए। इस अपील का पुलिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, होता यह भी है कि माइक बंद कर दिया जाता है। कुछ समाचार चैनलों पर आईं वह तस्वीरें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जिनमें पुलिस महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों से यूं पेश आ रही है कि उसे यदि दरिंदगी कहा जाए, तो यह ‘दरिंदे’ जैसे घृणित शब्द का भी अपमान है।
अंग्रेजों के जमाने के पुलिस एक्ट (1882) की धारा-52 के अनुसार भीड़ पर पानी की बौछार या आंसू गैस के गोले तब दागे जाते हैं, जब भीड़ सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर आमादा हो, पर रामलीला मैदान में हाथ जोड़कर खड़े और भारत माता की जय बोल रहे नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागे गए। कुल मिलाकर पुलिस ने जितनी बर्बरता हो सकती थी, उतनी करके रात एक बजे से लेकर सुबह साढ़े सात बजे तक रामलीला मैदान खाली करा ही लिया और बाबा रामदेव को दिल्ली पुलिस हरिद्वार छोड़ आई। यह सब कर्नल गद्दाफी के लीबिया में नहीं हुआ, बल्कि उस भारत में हुआ, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह माओवादियों के खिलाफ भी नहीं हुआ, बल्कि उनके खिलाफ हुआ, जो बापू के बताए मार्ग पर चलकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे थे व यह सब उस पार्टी की सत्ता के इशारे पर हुआ, जिसने सत्ता के लिए बापू का नाम सबसे ज्यादा भुनाया है। लिहाजा, देश अपना कर्तव्य पहचाने, वरना इतिहास उसे माफ नहीं करेगा।
एक वर्ग ऐसा भी सक्रिय है, जो रामदेव को कठघरे में खड़ा कर रहा है। हम कांग्रेस के नेताओं की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन तथाकथित बुद्धिजीवियों की बात कर रहे हैं, जो समाचार चैनल के स्टूडियोज में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं या फिर लेख लिखकर अखबारों में छपवा देते हैं। यह बात सही है कि बाबा रामदेव से, मैं दूसरों की नहीं जानता, मेरी ढेरों असहमतियां हैं। मगर, हम जिससे असहमत हों, उसके सभी कार्यों की निंदा करने लगें, तो यह चीयर लीडर्स की तरह फोकट में नाचना है। चीयर लीडर्स को तो दैहिक नंगापन दिखाने के बदले पैसे भी मिलते हैं, पर ये लोग तो वास्तव में फोकट में बौद्धिक जुगाली कर रहे हैं। माना कि वीर और बरखा जैसे धुरंधर भी अपने देश में पाए जाते हैं, पर ये सभी वीर-बरखा नहीं हो सकते कि सरकार इनकी ओर एक टुकड़ा भी फेंक दे। वर्तमान स्थिति में बाबा का विरोध भ्रष्टाचार का समर्थन करना है। यदि बाबा के विरोधी भ्रष्टाचार के भी विरोधी हैं, तो क्यों नहीं कहते कि रामदेव तुम अपना योग करो-कराओ, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई हम लड़ेंगे, पर जनता के बीच जाकर पसीना बहाना, उसको अपनी बात समझाना स्टूडियो में बैठकर बहस करने जितना आसान नहीं है।
माना कि अपने विचार व्यक्त करना इनका लोकतांत्रिक अधिकार है, पर यह सरकार जब लोकतंत्र को बचने देगी, तभी तो इनको अपने अधिकार का इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा। आज सरकार की गुंडागर्दी पर चुप्पी साध लेना या उसके पक्ष में इसलिए बोलना कि दूसरे मोर्चे पर रामदेव हैं, वह रास्ता साफ करेगा, जिस पर चलकर सरकार आगे इनकी बोलती भी बंद कर देगी। यूं तो इनको अपने दिमाग की जंग स्वत: साफ कर लेनी चाहिए, मगर यदि ये लोग स्थितियों को समझने की कोशिश नहीं करते हैं, तो इनसे बहस की जानी चाहिए और समझाया जाना चाहिए कि काले धन की अर्थव्यवस्था ने देश की हड्डियों को तक खोखलाकर दिया है, तो भ्रष्टाचार ने देश को मरणासन्न।
शासन-प्रशासन की रगों में यदि लोकतांत्रिक लहू की एक बूंद भी होती, तो गांधीजी के मार्ग पर चल रहे लोगों पर वह कहर नहीं ढाया जाता, तो ढाया गया है। मुझे तो अब यह भी संदेह होने लगा है कि जब अपने देश की चुनी हुई सरकार ही गांधीवादियों की छाती पर सवार होकर उनका टेंटुआ दबाने लग जाती है, तब क्या जिस तथाकथित आजादी की आबोहवा में हम सांस ले रहे हैं, वह गांधीजी ने ही दिलाई होगी या किसी और ने? अपनी सरकार की हैवानियत देखकर दो बातें साफ होती हैं-या तो अंग्रेज इन काले अंग्रेजों से ज्यादा रहमदिल थे, जो गांधीजी की बातें न केवल सुनते थे, बल्कि उनके सम्मान का भी ख्याल रखते थे या फिर अंग्रेज अगर हमारी इन सरकारों से ज्यादा खूंखार थे, तो फिर आजादी गांधीजी ने नहीं दिलाई, बल्कि या तो अंग्रेजों ने स्वयं दे दी कि भारत को जितना लूटना था, उतना लूट लिया, अब कौन चक्कर में फंसे या फिर आजादी किसी और ने दिलाई।
अगर गांधी इतने सबल थे कि उन्होंने अंग्रेजों को खदेड़ दिया था, तो फिर इस लोकतांत्रिक भारत में गांधीजी के दर्शन का सफल प्रयोग क्यों नहीं हो पा रहा है? इस सवाल का जवाब भी उसी कांग्रेस को देना चाहिए, जो गांधीजी की मूर्ति की सबसे बड़ी पूजक है और जिसने कभी देश पर आपातकाल थोपा था, अब अन्ना के साथ वैसी कुटिलता दिखाई, जैसी अंग्रेज भी नहीं दिखाते होंगे। फिर, बाबा रामदेव के साथ तो वह व्यवहार किया कि न जाने देश के कितने युवकों की गांधी और गांधीवाद पर से पूरी तरह आस्था उठ गई होगी। रही बात अपनी, तो अपन तो वैसे भी बहुत ज्यादा गांधीवादी नहीं थे। हां, शनिवार की रात यदि गांधीजी की कांग्रेस की सरकार गांधीवादी रामदेव के खिलाफ हिंसा का नग्न तांडव नहीं कराती, तो गांधीवादी हो सकते थे, हम।
बहरहाल, जो हुआ, वह बेहद शर्मनाक है। इसने देश का वर्तमान बिगाडऩे की चेष्टा की और इतिहास के साथ भी खिलवाड़ किया। गांधीवाद को संदेह की नजरों से देखने का मौका मिलना देश के इतिहास के साथ खिलवाड़ करना ही है। अलबत्ता, वह इतिहास जरूर दुहराया गया, जो देश पर आपातकाल थोपकर रचा गया था, बेहद डरावना, बेहद घिनौना और बेहद खूंखार, काला इतिहास और वह भी उस दिन, जिस दिन देश लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की वार्षिकी मनाता है। हम अपनी भूमिका पहचानें, यह वक्त की आवाज है। वरना, हमें वर्तमान मुर्दा मानेगा और भविष्य कायर।
लेखक राजेंद्र चतुर्वेदी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा राज एक्सप्रेस से जुड़े हुए हैं.

