बुलंदशहर पुलिस लाइन में गोलीबारी अचानक नहीं-बारह साल पहले भी किया था आगाह

बुलंदशहर (22 अगस्त 2016)- कहते हैं जब किसी ख़तरे से आगाह किये जाने के बावजूद लापरवाही की जाती है तो उसके नुक़सान अक्सर दोबारा सामने आते ही रहते हैं। मानसिक तनाव और बेतरतीब ड्यूटी करने वाले पुलिस बल के अंदर का लावा और तनाव कब ख़ूनी खेल बन जाए इसकी एक बार फिर मिसाल मिली है बुलंदशहर में। जहां एक सिपाही ने अपने ही साथियों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी, जिसमें दो सिपाही मौत की गोद समा गये।सोमवार रात को हुई फायरिग के दौरान एक सिपाही की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो सिपाही गंभीर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद आरोपी सिपाही ने भी खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। कहा जा रहा है कि फायरिग करने वाले सिपाही का बार-बार ट्रांसफर किया जा रहा था, जिसको लेकर वो मानसिक तनाव में था और उसने यह खतरनाक कदम उठाया। वहीं, गंभीर रूप से घायल दोनों सिपाहियों को मेरठ के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सोमवार रात को पुलिस लाइन में क्वार्टर गार्ड संतरी सौरभ त्यागी ने थ्री नॉट थ्री बोर की राइफल से अपने साथियों पर गोलियां बरसा दीं। पहली दो गोलियां सामने खड़े मुंशी मनोज यादव को लगीं, जिससे उसकी मौत हो गर्इ। बीच-बचाव करने आए एचसीपी चन्द्रपाल और मनवीर को भी उसने गोलियां मार दीं। इससे मनवीर और चन्द्रपाल गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद सौरभ ने लाइन के मैदान में पहुंचकर खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, सौरभ बार-बार ट्रांसफर होने से परेशान था। उसका दो साल में तीन बार ट्रांसफर हो चुका था। ट्रांसफर को लेकर उसने अपने साथी सिपाही से भी कई बार कहा था। बताया जा रहा है कि सौरभ दो दिन पहले ही पुलिस लाइन में आया था। वह छह माह आजमगढ़ पीएसी में ट्रेनिंग सेंटर में तैनात था। दोनों सिपाहियों की हालत नाजुक बनी है। देर रात मेरठ के एसएसपी जे. रविंदर गौड़ भी अस्पताल में सिपाहियों का हाल जानने पहुंचे।

अचानक नहीं होते ऐसे शूटऑउट
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये शूटऑउट अचानक हुआ है या इसको लेकर पुलिस और प्रशासन अंजान था। नहीं ऐसा हरगिज़ नहीं कहा जा सकता। अगर पुलिस विभाग इस तरह के हालात और पुलिस जवानों के तवान से अंजान होने की बात करता है तो सरासर झूठ है। बतौर एक पत्रकार मैं ख़ुद इस समस्या को बेहद नज़दीक से महसूस करते हुए लगभग 12 साल पहले उत्तर प्रदेश शासन और पुलिस विभाग को चेताया था। दरअसल बांदा में हुए इसी तरह के एक शूटऑउट के बाद मैंने अपने क्राइम शो में इस समस्या पर विस्तार से पड़ताल की थी। सहारा समय पर प्रसारित होने वाले साप्ताहिक क्राइम शो तफ़्तीश में इस मुद्दे पर न सिर्फ गहराई से छानबीन की गई थी बल्कि पुलिस के जनावों को होने वाली समस्याओं और उनके तनाव को भी साझा करते हुए तत्कालीन अधिकारियों को आगाह किया था।

पहले भी क्या था आगाह
इत्तिफाक़ से उस शो की वीडियो उपलब्ध थी और बुलंदशहर हादसे के बाद इसको साझा करने का मन हुआ। साल 2003-2005 में प्रसारित होने वाले क्राइम शो तफ्तीश को उस दौर का में बेहद पसंद किया जाता था।  आप भी नीचे दिये लिंक को क्लिक करके बुलंदशहर में होने वाले पुलिस शूटऑउट को उस समय आगाह करते हुए मुझको देख सकते हैं। https://www.youtube.com/watch?v=9bJDx75aAwY

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं सहारा समय, डीडी आंखों देखी, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़ सहित कई राष्ट्रीय चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य चुके हैं।

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