भाजपा के एकतीस साल : क्‍या खोया, क्‍या पाना है

पंकज झाजुलाई का महीना दिल्ली के लिए काफी गर्म होता है. पर यह धूप तब और कष्टकर हो जाता है जब आप बायो-डाटा लेकर नौकरी की तलाश में दिल्ली की सड़कों पर घूमते रहें. सन 2004 की ऐसी ही गर्मी में, जब दिल्ली की गद्दी से उतरे हुए भाजपा को ज्यादे दिन नहीं हुए थे, भाजपा की नौकरी करने का प्रस्ताव मिला. कहते हैं जब विकल्प नहीं हो तो तय करना आसान हो जाता है. लोकसभा चुनाव के बाद ताज़ा-ताज़ा बेरोजगार हुआ यह खादिम निकल पड़ा था कभी नक़्शे में ही देखे छत्तीसगढ़ की तरफ. एक झोला उठाये दोस्त से टिकट का पैसा उधार लेकर. सोच यह भी थी कि एक पार्टी को अंदर से जानने का मौका मिलेगा जिससे मुख्यधारा की पत्रकारिता में उन अनुभवों का लाभ भी लिया जा सकेगा.

तबसे लेकर आज पुनः वापस दिल्ली लौटने तक इन सात सालों में यमुना के साथ-साथ दिल्ली की आंखों में भी नमी का अभाव सा हो गया हो, लेकिन छत्तीसगढ़ की सदानीरा इन्द्रावती के अलावा पैरी, अरपा, महानदी आदि के साथ-साथ राज्य में भाजपा को भी ज्यादातर बहता, बढ़ता, बलखाता कभी कुलांचे मारता तो यदा-कदा सूखता भी देखता आ रहा हूं. कभी कर्मचारी के तौर पर तो कभी सदस्य, कभी अध्येता तो कभी ‘निंदक नियरे’ बन कर भी. स्वाभाविक तौर पर ज्यादातर काफी खुशी से तो कभी पीड़ा से भी. ज्यादातर गौरव के साथ तो कभी थोड़ी सी शर्मिंदगी महसूसते हुए भी. लेकिन एक भरोसा, एक बल, एक आस-विश्वास फ़िर भी हमेशा बना रहा कि चाहे कुछ भी हो कम से कम भाजपा को एक सबसे कम बुरी पार्टी तो कहा ही जा सकता है. यही सोच कर कि भरोसे के संकट के इस ज़माने में इतना भी विश्वास भी काफी है. आखिर अगर आज गांधी और दीनदयाल नहीं हैं, समाज के अच्छे-बुरे नागरिकों द्वारा ही राजनीतिक दलों को भी अपना कारवां आगे बढ़ाना है तो ज़ाहिर है उसकी अच्छाई या बुराइयों से कोई वंचित नहीं रह सकता है. लेकिन अगर समग्रता में मूल्यांकन करें तो अगर इस दल को कोई चीज़ अलग करती है तो वो है इसकी विचारधारा.

वह विचारधारा जो प्रेरणा प्राप्तकर्ता है भारत के शास्त्र-पुराण-वान्ग्मयों का, जिसे गर्व है अपनी महान सांस्कृतिक विरासत पर. वह गौरव भाव जो हज़ारों वर्षों की परंपराओं से रिसकर और छन कर, देश काल और परिस्थिति अनुसार परिमार्जित और संशोधित होकर, महाकाव्यों में वर्णित शुभासितों को संघ फ़िर जनसंघ से होते हुए इकतीस साल पहले के नव अंकुरित भाजपा द्वारा आत्मार्पित कर लेने के बाद और ज्यादा निखर कर सामने आया है. वह विचारधारा जो कहता है इदं राष्ट्राय, इदं न मम्, जो घोषणा करता है कि पहले राष्ट्र, फ़िर दल फ़िर स्वयं की बात हो. जो यह कहता है कि कोई तो एक सांस्कृतिक सूत्र है जहां हम एक हैं, कुछ तो ऐसा है जिसका सन्देश देने सुदूर केरल के ‘कालडी’ गांव से चल कर कोई युवक राष्ट्र के ‘उत्तरी ध्रुव’ तक पहुंच जाता है या जिसका सन्देश देने कभी सम्पूर्ण दुनिया को विवेक के आनंद से आप्लावित करने कोई नरेंद्र ‘शिकागो’ तक पहुंच, समूचे विश्व में स्वीकार्यता प्राप्त करता है. महज़ इतनी सी बात, इतना सा निचोड़ लेकर कि ‘एकैव मानुषी जाति’ की अगर वैचारिकता के सर्वोच्च शिखर पर देखें तो हम सब एक ही जाति हैं और वह हैं मानव जाति.

‘यत पिंडे तत ब्रम्हांडे’ की मान्यता का सरलीकरण करें तो हमारे लिए जितने पूज्य अपने ग्राम देवता हैं, उतनी ही आदरणीय पृथ्वी माता भी. यानी अपने परिवार को ‘दुनिया’ समझने में या फ़िर पूरी दुनिया को ही अपना परिवार मान लेने में कोई भी विरोधाभाष नहीं है. अगर हम अपनी जन्मदात्री मां के प्रति आदर भाव से भरे होंगे तो इसका यह भी अर्थ होगा कि धरती मां के प्रति भी अपना अनुराग बना रहेगा. महान नीतिज्ञ चाणक्य ने इसकी मर्यादा भी बतायी है कि ‘त्यज्देकं कुलस्यार्थे, ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत…’ यानी परिवार के लिए स्वयं का त्याज, कुल के लिए परिवार का त्याग, ग्राम के लिए कुल का त्याग …और इसी तरह क्रमशः राष्ट्र और दुनिया तक की बात आती है. यह विचार, ये गौरव भाव तो जगाता ही है कि ‘अहं ब्रह्मास्मी’ यानी मैं ही ब्रम्ह हूं लेकिन फ़िर यह भी जोड़ देता है कि ‘तत्वमसि’ यानी तुम भी ब्रम्ह ही हो. जब यह उपनिषद के इस सूत्र में कि ‘इशावाश्यमिदं सर्वं, यत्य्किंच्य जगतां जगत’ कि ईश्वर इस जगत के कण-कण में विद्यमान है, की बात करता है तो इसका मतलब यह भी होता है साम्यवाद को इससे ज्यादा अच्छी तरह व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है. समानता का इससे बड़ा सूत्र और कोई नहीं हो सकता.

यह विचारधारा उदारीकरण में भी भरोसा करता है लेकिन इस शर्त के साथ कि पहले ‘ये अपना है और वो पराया, ये जिद्द छोड़नी होगी. इसे भूमंडलीकरण भी चाहिए लेकिन उससे पहले वसुधा को ही अपना कुटुंब मान लेने की उदारता दिखानी होगी. यहां तक कि वह बाज़ार से भी बेज़ार नहीं होना चाहता, वहां भी खड़ा होना चाहता है लेकिन कबीरा की तरह लुकाठी हाथ में लेकर. वह अर्थशास्त्र भी जानता है लेकिन ‘रिसने के सिद्धांत’ वाला वह अर्थव्यवस्था नहीं जहां संसाधन ऊपर से नीचे की ओर जाए और संपत्ति पर कुंडली मारकर मुट्ठी भर लोग बैठे रहे. अपितु उसे अर्थशास्त्र का वह ‘आध्यात्मिक माडल’ चाहिए जहां कुण्डलिनी जाग्रत हो और ‘उर्जा’ का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर जाए, सहस्त्रार से मूलाधार की तरफ. कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति से बातें शुरू हो ऐसा शीर्षासन चाहिए.

ऊपर विचार के स्तर पर जितनी बातें कही गयी है वो सब भाजपा में विद्यमान है ऐसा कहना चाटुकारिता के अलावा और कुछ नहीं हो सकता. इस वर्णन का आशय यह नहीं है कि ‘ऐसा है’ बल्कि निवेदन यह है कि ‘ऐसा होना चाहिए.’ मोटे तौर पर यही वो चुनिंदा आदर्श हैं जिसपर चलने की अपेक्षा भाजपा से सदा की जाती रही है और की जायेगी भी. उसकी सफलता या विफलता भी इन्हीं मानदंडों पर कसा जाएगा कि वह अपने पूर्वजों के दिखाए इन राहों पर चलने में कितना सफल या विफल है. तुलसी ने मानस में लिखा है कि ‘प्रथम मुनिन्ह जेहि कीरति गाई, तेहि मग चलहि सुगम मोहि भाई’ यानी पूर्वजों ने जिस मार्ग का संधान किया है उस पर चलना ही सबसे सुगम है. तो केवल यह रास्ता सुगम तब हो सकता है जब आपकी निष्ठा अपने उस गौरवमयी विचार और परंपरा में हो तो.

स्वाभाविक रूप से भाजपा को प्रतिपक्ष द्वारा हमेशा कठघरे में खड़ा किया जाता है, किया जाना भी चाहिए. लेकिन वो कभी भाजपा के लिए संकट नहीं है. पार्टी की चुनौती है तो केवल ये कि वह अपने ही मानदंड पर खरा साबित हो. अपने ही और अपनों के ही कठघरे में खरा साबित होने की चुनौती से जिस दिन यह पार्टी पार पा जाय वही उसका सबसे बड़ा प्राप्य होगा. निश्चित ही कई निर्णायक अवसर पर विचारों को लेकर वह द्वंद्व का शिकार दिखती है. बच्चन के शब्दों में कहूँ तो ‘इस ओर प्रिये तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा’ के द्वंद्व से बाहर निकल, अपनी विरासत का ध्यान कर एक राह तय कर उसपर चलते जाना ही इसके लिए श्रेयष्कर होगा.

आज जब यह पार्टी अपना इकतीस साल पूरे कर चुकी है तो मानस का वह दोहा स्मरण हो आता है ‘खीचि सरासन श्रवण लगी, छोड़े सर इकतीस, रघुनायक सायक चले मानहु काल फनीस’ तो आज भी जिस तरह भ्रष्टाचार-आतंक रूपी विसंगतियों का रावण दसों मुंह बाए खड़ा है तब इकतीस साल की भाजपा काफी प्रासंगिक हो जाती है. अस्तु.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ड़ा. रमन सिंह जी के कक्ष में आपको लिखा मिलेगा ‘आप मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं.’ मोटे तौर पर यही इस पार्टी के विचारों का सबसे बड़ा सूत्र है. वास्तव में आज भाजपा, समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की अपनी सामासीय संस्कृति को जीवित करे, न केवल सामने बैठे बल्कि सुदूर खड़े अंतिम व्यक्ति को भी महत्वपूर्ण मान, समाज के अंतिम व्यक्ति की चिंता सबसे पहले करे तो निश्चय ही भाजपा का भविष्य उसके अतीत से भी बेहतर होकर सामने आयेगा. दीनदयाल के अन्त्योदय का स्वप्न अगर इस पार्टी में है तो उसे पूरा करने की क्षमता ही इसी में निहित हैं. क्या आप तैयार हैं?

लेखक पंकज झा छत्‍तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *