भ्रष्टाचारियों के सरदार

संजयजीएक पुरानी कहानी है, जिसमें राजा अपनी आंखें बंद करके अपना तंत्र चलाता है और दावा करता है कि उसकी सरकार अब तक की सबसे काबिल सरकार है, क्योंकि वो सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा और ईमानदार है। जबकि उसके सिपहसलार दोनों हाथों से जनता के खून-पसीने की कमाई को लूटने में लगे रहते हैं और भ्रष्‍टाचार चरम सीमा पर पहुंच जाता है। जनता त्राहि-त्राहि करती रहती है और राजा के करीबी गले तक भ्रष्टाचार में फंसे रहते हैं। अगर इस कहानी को सुनकर आपको दिल्ली दरबार की याद आ रही हो तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने मुंह मियां मिट्ठू बने की तर्ज पर भले ही ये कहें कि नेहरू के बाद उनका मंत्रिमंडल सबसे योग्य है। मगर हकीकत इससे कहीं जुदा है। आजादी के बाद से कांग्रेस की किसी भी सरकार के प्रधानमंत्री इतने कमजोर नहीं दिखाई दिये और न ही कांग्रेस की कोई सरकार भ्रष्‍टाचार दर भ्रष्‍टाचार में उलझी रही और अब प्रधानमंत्री ने खुद ही यह मानकर कि गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती है और उनसे भी गलती हो गई। खुद सारी तस्वीर साफ कर दी है। पांच राज्यों में हो रहे चुनाव के एक साल के भीतर ही देश के सबसे बड़े सूबे में चुनाव है और सरकार बनाने का सपना देखने वाली कांग्रेस समझ नहीं पा रही है कि वो बढ़ती हुई बेतहाशा महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर आम आदमी को क्या जवाब दे?

कांग्रेस ने अपने यूपीए-2 की सरकार में भी दावा किया था कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ मगर हकीकत यही रही कि कांग्रेस लगातार आम आदमी से दूर होती चली गई। इस दौर में जिस तरह से एक के बाद एक घोटाले सबके सामने आ रहे हैं। उसने कांग्रेस के माथे पर बल डाल दिये हैं। प्रधानमंत्री भले ही दावा करें कि वो इतने गलत नहीं हैं, जितना उनके बारे में कहा जा रहा है मगर इस पर विश्वास करने को कोई तैयार नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों से बातचीत में प्रधानमंत्री ने ये कहकर कि गठबंधन सरकार की मजबूरी होती है। सारा ठीकरा अपने सहयोगी डीएमके के सिर पर फोड़ने की कोशिश की है। मगर हकीकत इससे कहीं अलग है। अगर ए राजा प्रधानमंत्री की नाक के नीचे इतना बड़ा खेल कर रहे थे तो प्रधानमंत्री की जवाबदेही इस बात से खत्म नहीं हो जाती कि उन्होंने इस बात के संबंध में राजा को पत्र लिख दिया था। दरअसल हकीकत ये है कि ए राजा को बचाने की भरसक कोशिश की गई मगर जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस घोटाले की निगरानी शुरू कर दी और विपक्ष ने जेपीसी के मामले में संसद एक भी दिन नहीं चलने दी तब मजबूरी में राजा की विदाई का कार्यक्रम तय किया गया।

अपने दामन पर छींटें लगते देख प्रधानमंत्री ने गठबंधन सरकार पर इसका दोष मढ़ दिया : वास्तव में इस आरोप के बहाने प्रधानमंत्री एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं। एक ओर वो अपनी छवि ईमानदारी की दिखानी चाहते हैं साथ ही ये मैसेज भी देना चाहते हैं कि अगर कांग्रेस की सरकार होती तो इस तरह का भ्रष्टाचार नहीं हो सकता था। मगर हकीकत सभी जानते हैं और हकीकत ये है कि अगर सिर्फ कांग्रेस की सरकार होती तो मनमोहन सिंह नहीं बल्कि गांधी परिवार का कोई व्यक्ति ही प्रधानमंत्री होता।

डीएमके पर आरोप लगाकर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को बचाने की नाकाम कोशिश की है। सवाल ये भी है कि सिर्फ 2जी स्पेक्ट्रम के ही दाग सरकार के दामन पर नहीं हैं और भी छींटे लगे हैं। कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर आदर्श सोसायटी के घोटालों की बात हो या अब इसरो में दो लाख करोड़ का एक और सनसनीखेज मामला सामने आने की बात हो इन सबमें सरकार के सहयोगी दल नहीं बल्कि कांग्रेस के ही माननीय नजर आ रहे हैं। जाहिर बात है कि कांग्रेस के नेता ही दोनों हाथों से इस कोशिश में लगे हुए है कि किसी भी तरह जितनी ज्यादा हो सके उतनी दौलत इकट्ठी कर ली जाये। कॉमनवेल्थ गेमों की किरकिरी को लेकर भी सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा। कलमाडी की जब छुट्टी की गई तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आदर्श सोसायटी घोटाले में शर्मनाक तरीके से कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण और उसके पहले के भी दिग्गज अपने रिश्तेदारों को उन फ्लैटों को देते नजर आए जो कारगिल के शहीदों के परिजनों को देने के लिए बनाए गए थे। जाहिर है कि ये सब के लिए शर्मनाक था। अगर किसी को शर्म नहीं आ रही है तो वह कांग्रेस के दिग्गज हैं, जो इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि मीडिया किसी बड़े घोटाले को उजागर करे और सरकार उसकी लीपापोती करने में जुट जाए। इस बात से कोई सबसे ज्यादा परेशान है तो वह हैं उत्तर प्रदेश के नेता।

उत्तर प्रदेश में एक साल के भीतर ही चुनाव होने की संभावना है। कांग्रेस के युवराज लंबे समय से मिशन 2012 का नारा देकर यूपी में सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं। सभी जानते हैं कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता यूपी से होकर जाता है। इन हालातों में यूपी के नेता पसीने-पसीने हैं कि वह किस मुंह को लेकर जनता के सामने जाएं। अब तक उनके सामने कहने के लिए सिर्फ एक ही बात थी कि माया सरकार भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी हुई है, मगर जिस तरह से कांग्रेस सरकार के घोटाले दर घोटाले सबके सामने आ रहे हैं उसने इन नेताओं को कुछ भी कहने का मौका नहीं छोड़ा है। जाहिर है कि अब भ्रष्टाचार की गेंद माया सरकार के पाले से छिटक कर कांग्रेस के पाले में जा गिरी है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पता है कि कांग्रेस की अकेली सत्ता में आने की स्थिति में सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री होंगे। प्रधानमंत्री के लिये यह सहज स्थिति है कि कांग्रेस को कुछ सहयोगी दलों के साथ ही सरकार बनानी पड़े। ऐसी स्थिति में मजबूरी में ही सभी लोग मनमोहन सिंह के नाम पर ही सहमति जताएंगे और यही बात ममोहन सिंह चाहते भी हैं। संपादकों के साथ बातचीत में मनमोहन सिंह ने इशारों ही इशारों में प्रणव मुखर्जी को भी अप्रत्यक्ष रूप में घेरने की कोशिश की। यह इशारा साफ था कि विकल्प उन्हें मंजूर नहीं। यह अनायास ही नहीं था कि पहली बार राहुल गांधी का नाम पूरी बातचीत के दौरान नहीं आया। दरअसल मनमोहन सिंह को सबसे बड़ा खतरा राहुल गांधी से ही है। उन्हें निपटाने के लिए मनमोहन सिंह किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं। भले ही लोग उन्हें भ्रष्टाचारियों के सरदार क्यों नहीं कहे।

लेखक संजय शर्मा वीकेंड टाइम्‍स के संपादक हैं.

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