भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन को इस तरह कुचलना अलोकतांत्रिक

दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकारी शह पर पुलिस ने आधी रात को जो ‘लीला’ रची है, उसने लोकतंत्र के चेहरे को बुरी तरह से कलंकित कर दिया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन से बौखलाई सरकार को जब कुछ नहीं सूझा तो उसने सभास्थल को उजाड़ने और लोगों को मार-भगाने में ही अपनी खैर समझी। सोते हुए लोगों पर जिस तरह से लाठियां भांजीं गयीं, आंसू गैस के गोले छोड़े गये और लोगों को खदेड़कर भगाया गया.. उसने इमरजेंसी की यादें ताज़ा कर दी हैं। सत्ता के गलियारों में अब सियासत इस मुद्दे पर आम आदमी को बांटने और उसका ध्यान भटकाने में लग गयी है। कांग्रेस, अंग्रेजों से विरासत में मिली ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का प्रयोग अपने ही लोगों पर कर रही है। जैसे ही भ्रष्टाचार को लेकर समवेत स्वर मुखर होते हैं, तो उसकी पूरी की पूरी मशीनरी इन आवाज़ों को दबाने में लग जाती है।

इससे पहले अन्ना हज़ारे द्वारा चलाए गये आंदोलन से जिस तरह से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश की गयी और एक बड़े मुद्दे को व्यक्ति केंद्रित कर दिया गया, ऐसा ही अब बाबा रामदेव के आंदोलन के साथ हो रहा है। आंदोलन को एक व्यक्ति विशेष तक ही समेटकर रखने की कांग्रेस की यह सोची-समझी चाल है। सरकार मुख्य मुद्दे से ध्यान बंटाने के लिए दिग्विजय सिंह जैसों के माध्यम से कवर फायर कर रही है। यदि बाबा रामदेव के आंदोलन को भाजपा का समर्थन प्राप्त है या इस आंदोलन के पीछे आरएसएस का हाथ है (जैसा कि दिग्वजिजय सिंह, कपिल सिबब्ल और दूसरे कांग्रेसी कह रहे हैं), तो भी इस शांतिपूर्वक चल रहे आंदोलन को इस बेरहमी से कुचलने का क्या औचित्य है? यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और इससे कांग्रेस का फासीवादी चेहरा ही सामने आ रहा है। यदि बाबा रामदेव ठग या टैक्स चोर हैं, तो यह सवाल आज ही क्यों उठाया जा रहा है, इससे पहले उन के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

दिल्ली पुलिस प्रशासन इस मामले में जो तर्क दे रहा है, वह भी ध्यान देने योग्य हैं। प्रशासन का कहना है कि यहां सिर्फ योग शिविर की इजाज़त थी और एक निश्चित संख्या तक ही लोगों को इकट्ठा होने की इजाज़त दी गई थी। जबकि स्वामी रामदेव स्वयं यह कहते रहे हैं कि इस आंदोलन में देश भर में करोड़ों लोग और दिल्ली में एक लाख लोग शामिल होंगे। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार और उसकी  सुरक्षा व खुफिया एजेंसियां उस समय सो रही थीं, जब हजारों की संख्या में लोग दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे?

सत्ता के लिए कानून के अपने मायने होते हैं। जब केंद्र सरकार के मंत्रियों की मान-मुन्नौवल नहीं चली तो उसने इस शांतिपूर्ण चल रहे आंदोलन को बर्बरता से कुचलने में भी देर नहीं की। यहां तक कि सुबह होने तक का इंतज़ार नहीं किया। यहां यह बात तो सही है कि सत्ता का अपना दम-खम होता है, लेकिन सत्ता को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता के दम पर सत्ता में हैं। यह पब्लिक है, यह सब जानती है और इतिहास गवाह है कि पब्लिक अर्श से फर्श पर लाना भी जानती है। कुल-मिलाकर ऐसा लग रहा है जैसे केंद्र की यूपीए सरकार अपने लिए खुद ही ताबूत तैयार कर चुकी है। बस उसमें आखिरी कील का ठोंका जाना बाकी है। अब तो इतना ही कहना है कि-

तुमने दमन किया तो हम और बढ़ गये,
पहले से आ गया है हममें निखार, देख।

लेखक सुरेन्‍द्र पॉल माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय में सहायक प्राध्‍यापक के रूप में कार्यरत हैं.

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