मध्‍य पूर्व एशिया में लोकतंत्र की बयार और अमेरिका

मध्य-पूर्व एशिया के अधिकतर मुस्लिम राष्ट्रों में इस समय तानाशाही के विरोध और लोकशाही के समर्थन में प्रचंड बयार चल रही है. टयूनिशिया और मिस्र में जनता सफलता के झंडे लहरा चुकी है. दोनों देशों के तानाशाहों ने जनाक्रोश के सम्मुख सर झुकाते हुए शासन जनता को सौंप दिया है. जबकि मोरक्को, सूडान, जॉर्डन, लीबिया, बहरीन, यमन और अल्जीरिया आदि में लोकशाही के समर्थन में जनता प्रदर्शन कर रही है. असंतोष की खबरें सउदी अरब से भी आ रही हैं.ये असंतोष किसी त्‍वरित घटना के फलस्वरूप नहीं पैदा हुआ है बल्कि वर्षों से शांत पड़ा ज्वालामुखी था, जो फूट पड़ा.

मध्य-पूर्व एशिया इतिहास के जानकर जानते हैं कि दितीय विश्व युद्ध के बाद से ही मध्य-पूर्व पर अमरीका और पश्चिमी देशों की निगाह लगी हुई थी. अमरीका ने साजिश रच कर मध्य-पूर्व के अधिकतर देशों में अपने इशारे पर नाचने वालों को सत्ता पर काबिज़ करा दिया था. 1951 में जब ईरान के मोससादेह शासन ने अपनी संसद के बहुमत की मर्ज़ी से अंग्लो-ईरानियन आयल कंपनी का राष्ट्रीकरण कर दिया था तो अमरीका ने अपनी बदनाम जासूसी संस्था सीआईए के सहयोग से ईरान के खिलाफ साजिश रचवाकर वहां 1953 में सत्ता पलटवा दी थी. इस सत्ता पलट के बाद ईरान में अमरीका ने अपने गुलाम पहेल्वी वंश को सत्ता पर काबिज़ करा दिया था.

मिस्र से अमरीका और पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तें उस वकत नाराज़ हुईं, जब 1952 में फौजी अफसरों ने राजशाही को उखाड़ फेंका था. मिस्र में राजशाही को उखाड़ फेंकने के बाद वहां नासर व फ़ौज के नेतृत्व में एक अरब गणराज्य की स्थापना हुई थी. ये नाराजगी उस समय और बढ़ गई जब मिस्र ने 1956 में स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इससे नाराज़ होकर अंग्लो-फ्रेंच सेनाओं ने मिस्र पर हमला कर दिया था. मगर 1970 के दशक में जब अनवर सादात ने मिस्र का शासन पाया तो राजनीति ने ज़बरदस्त करवट ली. अमरीका ने मध्य-पूर्व में मिस्र की अहमियत को समझते हुए 1978 में अपने तत्वावधान में इस्राइल से मिस्र की कैम्प डेविड संधि कराई. मिस्र को इस संधि के बदले 35 अरब डालर की सैनिक सहायता मिली. यही नहीं उसको वार्षिक लगभग 2 अरब डालर की सैनिक सहायता अलग से मिलनी शुरू हो गई. मिस्र मध्य-पूर्व एशिया में अमरीकी-इस्राइली नियंत्रण की धुरी बन गया. इस संधि के बाद से ही मिस्र फिलिस्तीनी आन्दोलन को कुचलने के लिए इस्राइल के साथ मिलकर कदमताल कर रहा है. मिस्र ने अपनी सीमा से मिलने वाली गाज़ा की सीमा पर पहरा कड़ा कर दिया है. मिस्र की इस कार्रवाई की वजह से ही गाज़ा पर इस्राइल की थोपी हुई नाकेबंदी सफल हो पा रही है. अमरीका के कथित आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में भी मिस्र की मुख्य भूमिका थी. अमरीका दुनिया भर से मासूमों को अगवा करके मिस्र स्थित अपने ख़ुफ़िया यातना शिविरों में ही लाता था.

अमरीका के खिलाफ युद्ध की शुरुआत 70 के दशक के अंत में ईरान के मरहूम नेता आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ही हो चुकी थी. इसी विद्रोह की वजह से अमरीकी गुलाम ईरानी शासक रजा शाह पहेल्वी इरान से भगा था. मगर लोकशाही की इस जेहाद की कीमत  ईरान और अरब दुनिया के अवाम को बड़ी भारी चुकानी पड़ी. अमरीका ने इराकी तानाशाह सद्दाम को ईरान के विरुद्ध युद्ध के लिए भड़का दिया, जिसमें लाखों मासूमों की जानें गईं. अमरीका ने सद्दाम को नैतिक-अनैतिक हर प्रकार का सहयोग दिया. इन कारणों से अमरीका और पश्चिम के विरूद्ध अरब जगत के आक्रोश में इज़ाफा हुआ, मगर मात्र आलोचना की हद तक खाड़ी युद्ध वा उसके उपरान्त मध्य-पूर्व में अमरीका के खुल्लम-खुल्ला दखलन्दाजी ने आग में घी का काम किया.

खाड़ी युद्ध ने मध्य-पूर्व को आर्थिक तौर पर बर्बाद कर दिया था. अमरीका ने तेल के साथ-साथ मध्य-पूर्व को खतम करने के लिए अपने असफल पूंजीवादी निजाम का प्रयोग यहाँ किया. यहाँ की तेल से प्राप्त पूंजी को किसी उत्पादक कार्य में लगाने के बजाए सट्टे पर आधरित अमरीकी पूंजीवाद निजाम पर लगाया गया. पूंजीवाद निजाम पर संकट आने के बाद अवाम के सब्र का बाँध टूट गया. आर्थिक संकट का असर इसलिए और भी विशेष रहा क्योंकि मिस्र में 30 और जॉर्डन में 5 लाख लोगों की रोजी-रोटी सीधे-सीधे  वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी है. अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक ने मिस्र और जॉर्डन को अपने आर्थिक सुधार मॉडलों के रूप में पेश किया था. मगर इन तमाम उपायों से आर्थिक सुधार के बजाए गरीबी बढ़ी. दौलत कुछ हाथों में सीमित होकर रह गई. मध्य-पूर्व में गरीबी अपने चरम पर पहुँच गई. आज मिस्र में 44 प्रतिशत अवाम मात्र 2 डालर प्रतिदिन में गुज़र बसर कर रहा है. मिस्र का नवउदारवाद समर्थक शासन भ्रष्ट और बेईमानों का साथ दे रहा है.

अमरीका ने शीत युद्ध के बाद जिस “नयी विश्व व्यवस्था” को खड़ा करने का प्रयास किया था वो विफल हो गया. साफ है अमरीका की शक्ति कम हो गयी है. वह स्वयं आर्थिक संकट का शिकार है. जबकि जिन अरब देशों में लोकशाही की अवाज बुलंद हो रही है, वहाँ के अमरीकी गुलाम शासक उम्रदराज हो चले हैं. उनकी सत्ता पर पकड़ अब पहले जैसी नहीं रही. देखना ये है कि अरब जगत में अमरीका विरोधी इस तेवर का इस्राइल के वजूद पर क्या प्रभाव पड़ेगा. वो बाकी रहेगा या नहीं. क्योंकि सच यह है की भले ही मध्य-पूर्व के कुछ शासक अमरीकी डर में इस्राइल को मूक समर्थन देते रहे हों, मगर वहाँ की जनता फिलिस्‍तीन के अवाम की समर्थक है.

लेखक फैजान मुसन्‍ना लखनऊ में आलमी अखबार के संवाददाता हैं.

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