मायाराज और लोकतंत्र के हत्‍यारे

: निरंकुश शासन में नौकरशाह बने भगवान : मरी द्रौपदी हो गई जिंदा : यहाँ मैं उल्लेख करने जा रहा हूं एक ऐसी घटना के विषय में जो उत्तर प्रदेश शासन के आदरणीय नौकरशाहों की काबिले तारीफ़ कार्य शैली की एक बानगी मात्र है. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव संपन्न हुए तथा ढोल-नगाड़ों के साथ इनके सफलता पूर्वक सम्‍पन्‍न होने का ढिंढोरा पीटा गया. राज्य निर्वाचन आयोग के तमाम आला अधिकारी समाचार पत्रों में और चैनल्स पर अपनी पीठ ठोंकते नज़र आये, लेकिन एक मात्र घटना ही इनके दावों का कच्चा-चिट्ठा खोलने को काफी है. जिस निष्पक्षता और ईमानदारी का स्वांग इनके द्वारा रचा गया वह वास्तव में प्रशंसनीय है. घटना कुछ इस प्रकार है कि जनपद कन्नौज के ग्रामसभा तिलकसराय, विकास खंड तालग्राम के निवासी लाल बहादुर की पत्नी द्रौपदी का पांच वर्ष पूर्व निधन हो गया था, जो कक्षा 12 उत्तीर्ण थी, जिनका विधि-विधान से दाह-संस्कार करने के पश्चात लाल बहादुर ने दूसरे गाँव की तलाकशुदा महिला सोना देवी पत्नी रामप्रकाश के साथ विवाह कर लिया. लाल बहादुर ने सबसे पहले नई पत्नी से मृत पत्नी के प्रमाण पत्र इत्यादि लगाकर पंचायत मित्र हेतु आवेदन करवाया, जिसे ग्रामीणों की आपत्ति पर प्रारंभिक स्तर पर जांच के उपरान्त निरस्त कर दिया गया.

इसके कुछ समय पश्चात इसी लाल बहादुर द्वारा शिक्षा मित्र हेतु पुनः मृतक द्रौपदी के अभिलेखों के आधार पर आवेदन करवाया गया, जिसे लाल बहादुर द्वारा धन प्रबंध के बल पर  चयनित भी करा लिया गया, किन्तु द्वितीय स्थान पर रही अभ्यर्थी श्‍वेता देवी द्वारा जिला अधिकारी से शिकायत की गयी, जिसकी जांच उपजिलाधिकारी द्वारा की गई तथा जांच में यह तथ्य प्रकाश में आया कि द्रौपदी का निधन हो चुका है तथा लगाये गए सभी आरोप सिद्ध है. उक्त आख्या के आधार पर जिलाधिकारी कन्नौज द्वारा सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी को सोना देवी के विरुद्ध धारा 420 तथा अन्य सुसंगत धाराओं में मुकदमा पंजीकृत कराने के आदेश दिए गए. जिनके अनुपालन में उप बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा धारा 420 तथा अन्य धाराओं में मुकदमा पंजीकृत कराया गया, जिसकी व्यापक जांच के उपरान्त पुलिस द्वारा चार्ज शीट माननीय न्यायालय में दाखिल की गई. जिसमे गवाह के तौर पर तहसीलदार, क़ानूनगो तथा लेखपाल के बयान दर्ज किये गए. उपरोक्त चार्जशीट पर तत्काल माननीय न्यायालय द्वारा संज्ञान ग्रहण किया गया जिस पर अति शीघ्र सजा के आदेश सुनाये जाने हैं.

इस बीच लाल बहादुर के अन्तःमन में लोकतंत्र की सेवा की भावना उमड़ पड़ी. उसने पंचायत चुनाव में प्रधान पद हेतु पुनः कुछ लोभी अधिकारियों के साथ प्रबंधन कर अपनी काली कमाई उनके कर कमलों में सौंप अपना निर्वाचन पत्र स्वीकृत करवा लिया. प्रधान पद के अन्य प्रत्याशियो द्वारा गला फाड़-फाड़ कर और कलम तोड़-तोड़ कर जिलाधिकारी से लेकर राज्य निर्वाचन आयुक्त तक गुहार लगाई गई तथा जागरण, सहारा तथा आज अन्य द्वारा इस अनूठी खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, इसके उपरान्त भी कोई सुनवाई न होते देख ग्रामीणों द्वारा मेरे एक परिचित अधिवक्ता ब्रज किशोर मिश्र जी से संपर्क किया गया तथा उनके द्वारा ये प्रकरण मुझे बताया गया. चूँकि इससे भद्दा मजाक लोकतंत्र से कुछ हो नहीं सकता कि मृतका चुनाव लड़े. अतः आदत से मजबूर लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ द्वारा इस मुद्दे को ठीक उसी दिन, जिस दिन फैक्स प्राप्त हुआ,  निर्वाचन आयोग के समक्ष उठाया गया.

एक बारगी लगा कि आयोग कुछ कठोर कदम उठाने वाला है, किन्तु अगले दिन ज्ञात हुआ कि रात्रि में ही अपर जिला अधिकारी द्वारा सूचना दी गयी कि चूँकि निर्वाचन पत्र में लगाये गए अभिलेख प्रथम दृष्टया फर्जी प्रतीत नहीं होते, अतः उक्त द्रौपदी देवी ही प्रतीत होती है तथा इसको चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाये. ग्रामीणों के प्रत्यावेदन में द्रौपदी का मृत्‍यु प्रमाण-पत्र, दर्ज मुक़दमें की प्रति, चार्जशीट  की छाया प्रति, तलाकशुदा पति का हलफनामा, तलाकनामा की छायाप्रति, चित्र सहित तमाम साक्ष्य उपलब्ध कराये गए थे. अतः अपर महोदय की आख्या आयोग को संदेहास्पद लगी, जिस पर आयोग ने पुनः जिला अधिकारी से स्वयं जांच कर अभिमत 27-10-10 तक भेजने को कहा गया. जिसे जिला अधिकारी द्वारा 28-10-10 की रात्रि तक नहीं भेजा गया.

इस सम्बन्ध में निर्वाचन आयुक्त राजेंद्र भौनवाल से जब यह पूछा गया कि क्या जिला अधिकारी गोविन्द राजू इतने सशक्त और निर्वाचन आयोग इतना लाचार है कि वे आयोग के आदेश के पश्चात भी रिपोर्ट न भेज कर अंगूठा दिखा रहे हैं, तो श्री भौनवाल इतने विचलित हो गए कि  उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया तथा मीडिया से कृपया जाने के लिए धन्यवाद कह कर इतिश्री कर ली.

अब लाख टके का सवाल यह है कि शुरुआती तेज़ी दिखाने वाले एक ईमानदार आईएएस (जैसा कि मै जानता हूँ ) पर आखिर किस व्यक्ति का दबाब पड़ा कि वो जिला अधिकारी की हठधर्मिता पर कुछ भी बोलने से इनकार करने लगा और खुद को मामले से दूर करता नज़र आने लगा? क्या प्रबंधन मशीनरी इतनी मज़बूत हो गयी कि वो लोकतंत्र पर हावी हो जाए? क्या लोकतंत्र के मंदिर में जिन्दा या मुर्दा का कोई भेद नहीं है? क्या लोकतंत्र में गरीब को जीने और लोकतंत्र में सहभागिता का कोई अधिकार नहीं है? यदि यह मृतका चुनाव जीती तो प्रमाण पत्र देने के लिए चुनाव आयोग स्वर्ग में कोई विशेष विमान भेजेगा? मुद्रा का महत्व सब जानते है किन्तु क्या यह इतनी भी शक्तिशाली हो सकती है कि वह मृतक को जिन्दा कर दे? यदि ऐसा है तो ईश्वर में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति क्या मूर्ख  है?

लेखक क्रांति किशोर मिश्र साधना न्‍यूज से जुड़े हुए हैं.

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