माया फांसी की हकदार हैं तो सजा से और भी नहीं बच सकते!

बीपी गौतमबसपा सरकार के निर्देश पर पुलिस व प्रशासन द्वारा भट्टा पारसौल में किसानों पर ढाये गये कहर से हर कोई दु:खी है। प्रदेश की जनता के साथ देश के अन्य राज्यों के लोग भी घटना पर दु:ख व्यक्त करते देखे जा रहे हैं। घटना के बाद से भाजपा, कांग्रेस, सपा, रालोद के साथ सामाजिक कार्यकर्ता वहां लगातार पहुंच रहे हैं और पीडि़त किसानों से बात करते हुए दु:ख बांटते नजर आ रहे हैं। नेताओं को देख कर लग रहा है कि उनके बीच भट्टा पारसौल जाने की प्रतियोगिता चल रही है, तभी सबके सब अचानक उधर ही दौड़ते दिखाई दे रहे हैं, जब कि अधिग्रहण का विरोध करने वाले किसान पहले से ही आंदोलन कर रहे थे, इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि इन सब नेताओं के हृदय पहले से द्रवित क्यूं नहीं हुए।

गोली कांड होने के बाद ही वह किसानों को न्याय दिलाने के लिए उतावले क्यूं हो उठे। उससे पहले क्या वह भांग का गोला खाकर कैलाश पर्वत पर तपस्या में लीन थे। अगर नहीं, तो कोई यह बतायेगा कि उन्होंने इस मुद्दे पर विधान मंडल या संसद में सवाल क्यूं नहीं उठाया। विधान मंडल या संसद ठप क्यूं नहीं की। सड़क पर आकर संघर्ष क्यूं नहीं किया या किसानों का साहस बढ़ाने के लिए पहले से ही घटना स्थल पर क्यूं नहीं आये?

ऐसे सवालों का जवाब किसी राजनीतिक दल या छोटे-बड़े नेता के पास नहीं है, क्यों कि तब उनके लिए यह कोई मुद्दा नहीं था। मायावती की दमनकारी नीतियां कार्यदायी संस्था के प्रेम में दबाये बैठे थे, क्यों कि बड़े ग्रुप सभी के चहेते होते हैं। घटना के बाद पहुंच रहे नेता बसपा सरकार और मुख्यमंत्री मायावती की धज्जियां उड़ाते हैं, लेकिन अरबों के वारे-न्यारे करने वाली कार्यदायी संस्था का जिक्र कोई नहीं कर रहा है, क्यों कि जो भी उसका नाम लेगा, वह उसी का दाना-पानी बंद कर देगा। इतने डरे-सहमे नेता किसानों का क्या भला कर सकते हैं या उनके लिए क्या लड़ाई लड़ेंगे। मायावती के दमन की दास्तां से किसी को कुछ लेना नहीं है और न ही किसानों के दु:ख-दर्द से किसी का दिल फटने वाला है और न ही किसी को यह चिंता है कि किसानों को न्याय मिलेगा अथवा नहीं। बस, सबकी नजर में यह जघन्य वारदात का एक सुपर हिट राजनीतिक मुद्दा है, जिसे सभी अपने अंदाज में भुनाने का प्रयास करते दिख रहे हैं।

भट्टा पारसौल जाने या न जाने से कुछ नहीं होने वाला। अगर राजनेताओं को पीडि़त किसानों की वास्तव में चिंता है, तो लखनऊ में विधान भवन के सामने आकर बैठे और उन्हें उचित मुआवजा के साथ रोजगार का उचित साधन न मिलने तक उठ कर न जायें, साथ ही जघन्य वारदात में मारे गये मृतकों के परिजनों, घायलों व बवाल के दौरान बर्बाद हुए परिवारों को न्याय दिलाने से पहले हिले तक नहीं। अगर इतना नहीं कर सकते हैं, तो वह सब भी मायावती से कम दोषी कैसे हो सकते हैं? तानाशाही अंदाज से काम करने वाली मायावती अगर फांसी जैसी सजा की हकदार हैं, तो इनके हिस्से में भी आजीवन कारवास से कम की सजा नहीं आना चाहिए, क्यों कि यह सब भी किसानों की पीड़ा को नजर अंदाज करने के कारण बराबर के दोषी हैं।

लेखक बीपी गौतम मान्‍यता प्राप्‍त स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. जनपक्षधर एवं शुचितापरक पत्रकारिता के हिमायती हैं तथा सभी विषयों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं.

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