माया सरकार की दोमुंही नीति और गुलाम प्रशासन

डा. आशीष वशिष्‍ठ भट्टा पारसौल की घटना ने माया सरकार की दोमुंही नीति को सारे देश के सामने उजागर कर दिया है। मार्च महीने में जाट आरक्षण की मांग कर रहे आंदोलनकारियों को खुली छूट देने वाली माया सरकार जब भट्टा पारसौल के आंदोलनकारी किसानों पर गोली चलवाती है तो यूपी सरकार की दोमुंही और जनविरोधी नीति का कुरूप चेहरा पूरे देश के सामने बेपर्दा हो जाता है। वैसे भी माया राज में सरकार और नौकरशाह कानून, मानवाधिकार और जनपक्ष से जुड़े मुद्दों को जूते की नोंक पर ही रखते हैं। और बहन मायावती का हर कदम और बयान विशुद्व रूप से वोट बैंक और राजनीतिक गुणा-भाग से प्रेरित और संचालित होता है। भट्टा पारसौल के किसान जमीन के बदले मिलने वाले सरकारी मुआवजे को बढ़ाने की मांग के लिए आंदोलनरत थे। किसानों की जायज मांगों और आंदोलन का प्रशासन लंबे समय से अनसुना और अनदेखा कर रहा था।

आखिरकर अपनी मांगें पूरी न होती देख किसानों ने प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए रोडवेज के तीन कर्मचारियों को बंधक बना लिया। जिला प्रशासन को जैसे ही रोडवेज के कर्मचारियों के बंधक बनाए जाने की खबर लगी, वैसे ही एक झटके में सारा प्रशासानिक अमला जाग उठा। प्रशासन ने किसान नेताओं से वार्ता और समझौते की जरूरी और प्राथमिक कार्रवाई से पहले किसानों पर लाठियां और गोलियां चलाकर दादागिरी और निकम्मेपन का जो उदाहरण पेश किया वो किसी भी लोकत्रांत्रिक देश के लिए शर्मनाक घटना है। प्रशासन के रवैये से क्षुब्ध किसानों ने भी जवाबी कार्रवाई की, जिसमें दोनों पक्षों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा। असल में देखा जाए तो जो भी हुआ उसकी निंदा होनी चाहिए। क्योंकि कानून को हाथ में लेने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है। किसानों ने अपनी बात को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए कर्मचारियों को बंधक बनाने का जो रास्ता चुना वो भी सरासर गलत और गैर-कानूनी था और जो नंगा नाच और तांडव पुलिस-प्रशासन ने किया वो भी घोर निंदनीय है। लेकिन इन हालातों में एक अहम सवाल यह उठता है कि आखिरकर समय रहते पुलिस-प्रशासन ने किसानों की बातों को समझने और सुलझाने के प्रयास क्यों नहीं किए।

अगर स्थानीय प्रशासन समस्या हल कर पाने में असमर्थ था तो उसे उच्च अधिकारियों से दिशा-निर्देश प्राप्त करने चाहिए थे। आखिरकर ऐसे हालात किसने बनाए और किसने किसानों को अपहरणकर्ता बनने के लिए मजबूर किया। प्रशासन को समय रहते नागरिकों की समस्या की ओर उचित ध्यान देना चाहिए। भट्टा पारसौल की घटना विशुद्व रूप से प्रशासानिक अक्षमता, अकर्मण्यता, गैर-जिम्मेदाराना रवैया और निकम्मेपन की ही उपज है। क्यों कि जनता से अधिक प्रशासन से जिम्मेदारी, संयम, अनुशासन, गंभीरता और समझदारी दिखाने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन माया सरकार में लगभग सारा सरकारी अमला कानून को रबड़ की गेंद की भांति उछालने में आनंद अनुभव करता है। जनता की समस्याओं और दुःखों से किसी को कोई लेना देना नहीं है। राजनीतिक नफे-नुकसान को ध्यान में रखकर और अपने राजनीतिक आकाओं का इशारा पाकर ही यूपी में सरकारी मशीनरी काम करती है। ऐसे में जनहित और लोक कल्याण से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक हानि-लाभ के आंकलन के बाद ही कार्रवाई किए जाने की परंपरा बन चुकी है।

भट्टा पारसौल से पूर्व आगरा, मथुरा, इलाहाबाद और लखनऊ में भी किसानों और प्रशासन के मध्य कई घटनाएं घट चुकी हैं। प्रदेश में जहां-जहां भी विकास के नाम पर जमीन अधिग्रहण हो रहा है वहां किसान और प्रशासन आमने-सामने खड़े हो रहे हैं। असल समस्या भूमि अधिग्रहण कानून से लेकर प्रशासानिक अनुभवहीनता की है। कारपोरेट, ठेकेदार, गुण्डों और माफियाओं के हाथों बिकी सरकार को पैसा कमाने की इतनी जल्दी है कि विकास के नाम पर धड़ाधड़ खेती वाली जमीनों का अधिग्रहण सरकारी एजेंसियां कर रही है। माया सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकार को जिस मुद्दे पर व्यक्तिगत तौर पर नफा नजर आता है, उस मसले पर सरकार गंभीर दिखाई देती है, अन्य मसलों पर सरकार और सरकारी मशीनरी सुस्त और विरक्त ही रहती है। जाट आरक्षण ने पूरे रेल यातायात, यात्रियों और आम आदमी के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया था। यूपी से होकर निकलने वाली दर्जनों ट्रेनों को रद्द करना पड़ा। होली के त्योहार के कारण पूर्वांचल और देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले लाखों लोगो की घर जाने की ख्वाहिश इस बार अधूरी रह गई, क्योंकि आंदोलनकारी जाट रेलवे के ट्रैकों पर कब्जा जमाए थे।

होली के त्योहार की जो रौनक यूपी, बिहार और आस-पास के प्रदेशों में होती है वो किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में माया सरकार की उदासीनता और प्रदर्शनकारियों को मनमानी करने की छूट देना ये दर्शाता है कि माया सरकार को आम आदमी की चिंता नहीं है। जाट आंदोलकारियों को माया सरकार का खुला संदेश्‍ा था कि जो मन में आए वो करो, क्योंकि जाट आरक्षण की आंच कांग्रेस और रालोद का राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकती थी, बसपा और माया सरकार से उसे कोई नुकसान नहीं होना था। माया सरकार और उसके जाबांज अफसरों को आम आदमी के दुःख-पीड़ा, होली का त्योहार, मरने-जीने और रेलवे को हुए करोड़ों के नुकसान से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि जब समस्याओं और मांगों को राजनीतिक चश्‍मे से देखा जाएगा तो जनहित से जुड़े मुद्दे, मसले और समस्याएं कैसे हल होंगी। हाई कोर्ट के सख्त रवैये के बाद जाट आंदोलनकारियों को रेल ट्रैक से हटाने की सुस्त और मरियल कार्रवाई माया सरकार ने की तो थी, लेकिन तब तक लाखों-करोड़ों के राजस्व का नुकसान और लाखों लोगों का होली का त्योहार खराब हो चुका था।

कदम-कदम पर माया सरकार की दोमुंही नीतियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। मेरठ में यांत्रिक कारखानों के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठे जैन मुनि श्री मैत्रि सागर को जिस तरह सरकारी मशीनरी ने अनशन से जर्बदस्ती उठाया और बारह घंटे नजरबंद बनाए रखा वो सरकार की कथनी और करनी में अंतर को स्पष्ट उजागर करती है। जैन मुनि की मांग सिर्फ इतनी थी कि सरकार यांत्रिक बूचड़खानों पर रोक लगाए, लेकिन लोकहित और जन समस्या से जुड़े मुद्दे का स्थायी या ठोस हल निकालने की बजाए प्रशासन अनशन तुड़वाने के कुत्सित प्रयासों में लगा रहा। अगर कोई संत या देश का आम आदमी चिल्ला-चिल्लाकर अपनी समस्या या मांग प्रशासन के सामने रखता है तो सरकारी अमला उसकी बात को गंभीरता से सुनने की बजाए फौरी कार्रवाई करने में अधिक दिलचस्पी दिखाता है। मेरठ में बूचड़खानों की काली और अवैध कमाई के पीछे सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं का खुला हाथ और संरक्षण है। इसलिए सरकारी अमला जायज मांग को भी सिरे से खारिज करने में परहेज नहीं करता है। देखा जाए तो जनससमयाओं और मांगों के पीछे कहीं न कहीं राजनीतिक दखलअंदाजी से लेकर प्रशासन की अदूरदर्शिता, निकम्मापन और लेट लतीफी स्पष्ट झलकती है। मायावती सरकार में तार्किक क्षमता का अभाव है। माया अपने विरोधियों को तार्किक या ठोस जवाब देने की जगह कानूनी डंडे और ताकत का सहारा लेने में अधिक यकीन रखती है। तभी तो सरकारी मशीनरी विरोधी दलों के नेताओं को जूते से मसलने और अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर डंडे और गोलियां चलाने से भी परहेज नहीं करती है।

जब बात माया सरकार के हितों और वोट बैंक की आती है, वहां सरकार त्वरित कार्रवाई करने से चूकती नहीं है। लखनऊ के सीएमओ हत्याकांड से लेकर शीलू बलात्कार कांड तक माया सरकार की त्वरित कार्रवाई किसी से छिपी नहीं है। सीएमओ हत्याकांड में तो मांयावती ने अपने दो-दो चहेते मंत्रियों की बलि लेने में कोई संकोच नहीं किया। क्योंकि माया हर चीज और हालात से समझौता कर सकती हैं, लेकिन उन्हें ये कतई बर्दाश्‍त नहीं है कि कोई उनके वोट बैंक में सेंध लगाए या उनकी कुर्सी खिसकाने का प्रयास करे। कुर्सी बचाने के लिए मायावती किसी भी हद तक जा सकती हैं और कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने में परहेज नहीं करती हैं। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि माया का हर कदम राजनीति और विरोधियों को धूल चटाने की मंशा से ही उठता है। प्रदेश में आए दिन होने वाले विरोधी दलों और संगठनों के मुखर विरोध को बंद करने के लिए ही माया सरकार ने प्रदेश में धरना, प्रदर्शन और आंदोलन के लिए कानून बना डाला है। अब प्रदेश में होने वाले किसी भी धरने, प्रदर्शन और आंदोलन के लिए प्रशासन से अनुमति लेना जरूरी है। अनुमति की प्रक्रिया को जान बूझकर पेचीदा और जटिल बनाया गया है ताकि कोई न कोई बहाना बनाकर विरोध के स्वर को दबाया और कुचला जा सके।

भट्टा पारसौल और जाट आरक्षण के मुद्दों पर माया सरकार द्वारा की गई कार्रवाई सरकार की नीति और नीयत का खुला बयान करती है कि सरकार की हर कवायद वोट बैंक को बचाए रखने या फिर अपने विरोधियों को धूल चटाने से प्रेरित होती है। 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद से ही माया ने प्रदेश के आम आदमी से दूरी बना रखी है। माया के शासन में जनता से मिलने का कोई कार्यक्रम या एजेंडा नहीं है। पूर्व सरकारों में जनता दर्शन के माध्यम से मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता से रूबरू होते थे और उनकी समस्याओं को सुनते और सुलझाते थे। पिछले चार साल के कार्यकाल में मायावती ने दो-चार रैलियों के अलावा जनता से मिलने की कोई कवायद नहीं की। मार्च माह में प्रदेश के जनपदों के दौरों पर निकली माया को जगह-जगह जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। सर्वजन की बात करने वाली सरकार ने सर्व जन को घरों में बंधक बनाकर सीएम के दौरों को पूरा करवाया था।

अगर जनता को कोई दुःख-दर्द या तकलीफ है तो वो अपने नेता के पास ही तो जाएगी। लेकिन माया सरकार में एक अदने से बाबू से मिलने में आपको नाकों चने चबाने पड़ जाएंगे ऐसे में सीएम तक अपनी बात पहुंचा पाना तो आसमान छूने के बराबर है। सरकार अपने चार सालों के कार्यकाल की चाहे जो भी उपलब्धियां गिनाएं लेकिन एक बात स्वीकार करनी होगी कि इन चार सालों में प्रदेश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हुई है। विकास के नाम पर स्मारक, पार्क और मूर्तियां ही लगी हैं। प्रदेश में उधोग-धंधे चौपट हो चुके हैं। कानून व्यवस्था बेदम साबित हो रही है और मायावती केवल अपने विरोधियों को धूल चटाने के लिए कानून और रणनीतियां बनाने में मशगूल है। वक्त रहते माया को प्रदेश के आम आदमी, किसान और मजदूर की आवाज को सुनना होगा और उनकी समस्याओं को हल करने की व्यवस्था करनी होगी, क्योंकि लोकतंत्र में लोक ही असली राजा होता है। जब जनता पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का 34 साल पुराना किला ढह सकती है तो जनता बसपा का किला भी ढहाने उतनी ही सक्षम है।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार तथा लखनऊ के निवासी हैं.

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