मुक्तिबोध का वैश्विक दृष्टिकोण : सन्दर्भ और महत्त्व

हिन्दू कालेज में मुक्तिबोध पर व्याख्यान : मुक्तिबोध की पेचीदा भाषा में हम अपनी दुनिया को समझ सकते हैं। वे इसी पेचीदा भाषा में आधुनिकता को देख रहे हैं, फासीवाद को देख रहे हैं और आगे की दुनिया को दिखा रहे हैं। मुक्तिबोध का संदर्भ स्वातन्त्र्योत्तर है। भूमंडलीकरण हमारी स्वतन्त्रता और संस्कृति पर खतरनाक असर डालेगा यह बात मुक्तिबोध ने भांप ली थी और क्लाड इथरली जैसी कहानियों में इसका संकेत भी मिलता है। उक्त विचार अमेरिका के पेनिसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया अध्ययन विभाग के डॉ. ग्रेगरी यंग गुंडलिन ने हिन्दू कालेज में व्यक्त किए।
हिंदी साहित्य सभा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में ‘मुक्तिबोध का वैश्विक दृष्टिकोण : सन्दर्भ और महत्त्व’ विषय पर व्याख्यान देते हुए डॉ. ग्रेगरी ने कहा कि भले उनकी कुछ रचनाएं अपूर्ण लगती हों लेकिन सम्भवत: यही उन रचनाओं की पूर्णता हो कि उनमें शीत युद्ध और अमेरीकी नीतियों की आलोचना मिलती है। उन्होंने सवाल उठाया कि इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि मुक्तिबोध ने लंबी कवितायेँ क्यों लिखीं? वे मार्क्सवादी जार्गन से बचना क्यों चाहते थे?

उन्होंने कहा कि शायद वे यथार्थवाद में अपने अनुभव लाना चाहते थे। डॉ. ग्रेगरी ने सभा में मौजूद युवा शोधार्थियों और विद्यार्थियों के सवालों के उत्तर भी दिए। इससे पहले विभाग के प्रभारी डॉ रामेश्वर राय ने डॉ. ग्रेगरी का स्वागत किया। महाविद्यालय के पूर्व छात्र और सत्यवती कालेज में सहायः आचार्य डॉ प्रवीण कुमार ने डॉ. ग्रेगरी का परिचय दिया। तृतीय वर्ष के छात्र अनुपम त्रिपाठी ने मुक्तिबोध की कविताओं का पाठ किया। विभाग की तरफ से डॉ विजया सती ने डॉ. ग्रेगरी को हिंदी की पत्रिकाएं भेंट कर अभिनन्दन किया। अंत में कार्यक्रम के संयोजक डॉ पल्लव ने सभी का आभार प्रदर्शित किया।  गोष्ठी का संचालन तृतीय वर्ष के छात्र चंचल सचान ने किया।

-डॉ पल्लव द्वारा जारी

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