यूपी में अगली सरकार : क्‍या होगा समीकरण, किसकी होगी दरकार

डा. नूतन ठाकुरउत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव होने में अभी लगभग एक वर्ष शेष है, पर अभी से अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं कि शासन की बागडोर किसके हाथों में जायेगी. बसपा दुबारा सत्ता में आयेगी या फिर सपा. कांग्रेस और भाजपा की सरकार बनाने में क्या और कितनी भूमिका होगी. रालोद, पीस पार्टी, निर्दलीय और अन्य छोटी पार्टियां किस हद तक अपनी उपस्थिति से शासन-सत्ता के समीकरणों को प्रभावित कर सकते है. इस सम्बन्ध में सभी के अपने-अपने मत और तर्क हैं. पर एक बात जिस पर लगभग सभी सहमत होते दिखते हैं वह यह कि सरकार चाहे जिसकी भी बने बिना कांग्रेस या भाजपा के समर्थन के बननी लगभग असंभव ही है.

वैसे अगर देखा जाये तो अब तक की स्थिति के अनुसार मायावती सरकार को ले कर आम जनता की बीच न तो कोई समर्थन का भाव है और न ही कोई विरोध का भाव. विपक्ष भी वर्तमान सरकार के खिलाफ भूमि अधिग्रहण, कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को सही ढंग से उठाने और उसे अपने पक्ष में करने में नाकामयाब ही हुआ है. कुल मिला कर यदि यह कहा जाये कि अपना मत किस पार्टी को दें इसे तय करने से पहले जनता भी अपने-अपने ढंग से यह विश्लेषण करने में लगी है कि बड़ी राजनितिक पार्टियों के चुनाव पूर्व गठबंधन से किस प्रकार के जातीय समीकरण बनते हैं. और यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भी सरकार बनाने-बिगड़ने के इस खेल में जातियों की अपनी अहम भूमिका होती है, तथा पार्टियों द्वारा टिकट वितरण का फैसला करते समय खास तौर से उम्मीदवारों की जाति को दृष्टि में रखा जाता है.

यदि उत्तर प्रदेश में जातिगत आंकड़ों को देखा जाए तो यहाँ विभिन्न जातियों की जो स्थिति बनती है, उस में कथित ऊँची जातियों की संख्या करीब अठ्ठारह प्रतिशत है, जिस में करीब आठ प्रतिशत ब्राह्मण, सात प्रतिशत क्षत्रिय, एक प्रतिशत वैश्य, एक प्रतिशत कायस्थ तथा एक प्रतिशत में अन्य जातियां हैं. इसी तरह पिछड़ी जातियों की संख्या उनतालीस प्रतिशत है, जिस में यादव सर्वाधिक बारह प्रतिशत, कुर्मी, सैन्थवार तथा उससे मिलती-जुलती जातियां करीब आठ प्रतिशत, जाट करीब पांच प्रतिशत, मल्लाह- निषाद करीब चार प्रतिशत, विश्वकर्मा करीब दो प्रतिशत, कुम्हार करीब दो प्रतिशत, नाई करीब डेढ़ प्रतिशत तथा अन्य जातियां करीब चार प्रतिशत हैं. पूरे प्रदेश में मुसलमानों की संख्या लगभग अठ्ठारह प्रतिशत है, जो आपस में शिया-सुन्नी तथा अन्य भागों में भले बंटे हों पर आम तौर पर वोट डालते समय एकमत हो जाते हैं. अनुसूचित जातियों की संख्या करीब पच्चीस प्रतिशत है, जिस में सर्वाधिक संख्या करीब पन्द्रह प्रतिशत जाटव की है, जिन्हें प्रदेश के अलग-अलग जिलों में अलग-अलग नामों से बुलाते हैं. पासी दूसरे नंबर पर हैं जो करीब छह प्रतिशत होंगे. अन्य अनुसूचित जातियां कुल चार प्रतिशत के करीब हैं.

आम तौर से यह माना जाता है कि यादव सपा और जाटव बसपा से बहुतायत संख्या में जुडे़ हुए हैं. इसी तरह जाट रालोद से लगभग बंधे से दिखते हैं. अन्य जातियों के हिसाब बदलते रहते हैं. अभी जो हालात चल रहे हैं उन में ब्राहमण उस तरह से बसपा के साथ नहीं दिख रहे जैसे पिछले चुनावों में थे. बल्कि उनमें से ज्यादातर लोग एक बार फिर भाजपा की ओर मुड़े़ हुए दिखते हैं. इसी तरह से क्षत्रिय भी भाजपा या कांग्रेस की तरफ ही मुंह किये नजर आ रहे हैं. इसका एक कारण तो अमर सिंह हैं, जिनके सपा से निष्कासन के बाद क्षत्रियों में सपा के प्रति वह लगाव नहीं रह गया है जो उनकी उपस्थिति में पैदा हुआ था. यद्यपि अमर सिंह कभी क्षत्रियों के सर्वमान्य नेता नहीं रहे हैं, पर इतना तो अवश्य है कि उनके निकाले जाने के तरीके से क्षत्रिय वर्ग में सपा के प्रति नाराजगी के भाव हैं. अन्य पिछड़ी जातियों के वोट लगभग बराबर मात्रा में सपा और बसपा में बंटने की उम्मीद दिखती है, सिवाय कुर्मी, सैथवार जैसी जातियों के जो संभव है कि एक बार फिर भाजपा की ओर मुड़ जाए.

इन जातिगत समीकरणों के अलावा विकास और भ्रष्टाचार जैसे राजनैतिक मुद्दे भी प्रभावशाली हो सकते है. यदि इंजीनियर मनोज गुप्ता की हत्या, आईएएस अफसर की आत्महत्या तथा मुख्यमंत्री के कानून-व्यवस्था की समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश करती निरीह महिलाओं पर आला अधिकारियों द्वारा की गई लाठी-डंडों की बारिश जैसी घटनाओं को यदि विपक्ष सही ढंग से भुना पाने में कामयाब हो पाता है तो निश्चित ही बसपा के लिए सत्ता प्राप्ति की राह कठिन हो जायेगी. वैसे भी सरकार का कोई भी काम ऐसा उल्लेखनीय नहीं दिख रहा जो जनता को अपनी ओर खींच सका हो. उलटे अम्बेडकर उद्यान के नाम पर अरबों रुपए खर्च करने के फैसले से एक बड़े तबके में नाराजगी का भाव ही अधिक हैं. मायावती का कुशल प्रशासक होने का तिलस्म भी अब काफी हद तक टूटता जा रहा है.

पर इस सब के बावजूद असली बात यही आती है कि मायावती सरकार की इन विफलताओं का लाभ किसने उठाया? इसका उत्तर मिलता है- किसी ने नहीं. समाजवादी पार्टी इस दौरान कुछ भी ऐसा नहीं कर पायी जिससे उसके प्रति जनता का रुझान बढे़. उलटे अमर सिंह के जाने और आज़म खान के जाने और आने की घटनाओं ने क्रमश क्षत्रिय और मुसलमानों में सपा के प्रति लगाव को कम ही किया है. इसके अलावा आम जनता अब तक मुलायम सरकार के पिछले कार्यकाल को भुला नहीं पाई है. कानून व्यवस्था की दृष्टि से जनता अब भी मुलायम सरकार की तुलना में मायावती सरकार को ही बेहतर पाती है.

जहाँ तक भाजपा का प्रश्न है वह भले ही कुछ उठती हुईं दिख रही है पर इसका सबसे प्रमुख कारण तो यह है कि लोग सपा-बसपा से बदलाव चाहने लगे हैं और उन्हें कहीं ना कहीं यह लग रहा है कि इन क्षेत्रीय पार्टियों की तुलना में राष्ट्रीय पार्टियां प्रदेश के लिए बेहतर होंगी. उनमे भी चूँकि भाजपा के पास जमीनी कार्यकर्ता अधिक हैं अतः उससे लोगों को अधिक उम्मीद दिख रही है. लेकिन जिस जगह भाजपा मात खा जा रही है वह है भाजपा के वरिष्ठ नेताओ का आपसी अहम और अंर्तकलह. मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर भी भाजपा में एक निश्चित और सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव सा दिख पड़ता है, जिसका खामियाजा निश्चित रूप से भाजपा को भुगतना पड़ सकता है.

कांग्रेस की स्थिति भी भाजपा से कुछ अलग नहीं है. अकेले सोनिया और राहुल गाँधी के बल पर कांग्रेसी चाहे कितना भी जोर लगा लें सत्ता तक नहीं पहुँच सकते. इसके लिए कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी आपसी प्रतिद्वंदिता छोड़ कर जनता के बीच जाना होगा. यदि कांग्रेसी सही ढंग से विपक्ष की खामियों को जनता के समक्ष रख पाए और एक साफ़-सुथरी छवि वाले सर्वमान्य नेता को मुख्‍यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर पाए तो शायद सम्मानजनक स्थान पा सके. कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि सरकार चाहे बसपा की बने या सपा की, उसे बनाने में जिस पार्टी की अहम भूमिका होगी वह है कांग्रेस या भाजपा. इन पार्टियों का सहयोग लिए बिना बसपा या सपा के लिए सत्ता की डगर मुश्किल ही जान पड़ती है.

लेखिका डा. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित पीपल’स फोरम की संपादक हैं.

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