यूपी में अपराधियों से नहीं पुलिस से खतरा

रीता : चड्डी-बनियान गिरोह से भी ज्‍यादा खतरनाक हो चले हैं खाकी वर्दीधारी : पत्रकार यशवंत सिंह के परिवार के साथ जो हुआ, उसे पढ़ने के बाद एक बारगी पुराने लम्हे आंखों के सामने आ गए। हमें याद है कि कुछ वर्ष पहले तक पूर्वांचल में चड्ढी-बनियाइन गिरोह का काफी आतंक हुआ करता था। वह स्थान अब खाकीवर्दीधारी गिरोह लेता जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि चड्ढी-बनियाइन गिरोह घर के सारे सदस्यों का कत्ल कर लूट की घटना को खुद अंजाम देता था, वहीं खाकीवर्दीधारी गिरोह ये सारे काम ठेके पर अपराधियों अथवा बेरोजगार युवकों से कराता है। जब कभी घर में घुस कर महिलाओं, बच्चों और पुरुषों का निर्मम तरीके से कत्ल कर लूट की घटनाएं सामने आती थी, इसे चड्ढी-बनियाइन गिरोह से जोड़ कर देखा जाने लगता था, लेकिन जब से हत्या, चोरी, लूट जैसी घटनाओं में खाकीवर्दी धारियों ने अपनी टांग अड़ा दी, चड्ढी-बनियाइन गिरोह के लोग तेल बेचने चले गए।

दूसरी तरफ न केवल हत्या, लूट, चोरी, डकैती जैसी घटनाओं में बेतहाशा इजाफा हुआ बल्कि मानवता भी दम तोड़ती जा रही है। छोटी-मोटी घटनाओं में लिप्त युवा देखते-देखते हेरोइन, शराब, गांजा जैसे मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ जा रहे हैं। आपसी मारपीट के आरोपियों को गुंडा-बदमाश बनाया जाने लगा है। हत्या, फिरौती, रंगदारी कुटीर उद्योग का रूप लेती जा रही है। मां, बहन, बेटियों को अब अपराधियों से कम पुलिस वालों से ज्यादा खतरा महसूस होने लगा है। कब पुलिस घर पर धावा बोल दे और शक के आधार पर किसे उठा ले जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। समाज में स्थान रखने वाले प्रोफेसर, डाक्टर, इंजीनियर, समाजसवियों को थाने पर बुला कर बेइजत किया जा रहा है।

इधर, समाज को दिशा देने वाले और अन्याय-अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले कलम के  सिपाहियों के हाथ से कलम छीनकर जब से कंप्यूटर का कीबोर्ड थमा दिया गया है, वे भी एक बंधुआ मजदूर सरीखी जिंदगी जी रहे हैं। कहां आवाज उठानी है, कहां दबानी है, इसका फैसला करने का अधिकार अब उनके पास नहीं रहा। इसे कॉरपोरेट घराना तय करता है। ऐसे में यशवंत सिंह जैसे मीडियाकर्मी की मां पुलिसिया उत्पीड़न की शिकार नहीं होंगी तो क्या होगा। हमें अच्छी तरह से याद है कि एक वह भी समय हुआ करता था जब किसी एक अदने से पत्रकार के साथ कोई बदसलूकी हुआ करती थी तो इसकी आवाज दूर तलक जाती थी। शासन और प्रशासन भी जानता था कि किसी पत्रकार को छेड़ने का मतलब बर्रे के खोता में हाथ डालने जैसा है। किसी के मां-बाप तक हाथ बढ़ाने में पुलिस ही नहीं अपराधी भी संकोच करते थे। यह कोई बहुत पुराने जमाने की बात नहीं बमुश्किल 5-7 साल पहले की ही बात है, लेकिन अब न वो पत्रकारिता रही और ना ही पत्रकार।

समाज का ताना-बाना भी टूटता बिखरता जा रहा है। हर तरफ खौफ, असुरक्षा और अनिश्चय का वातावरण पसरता जा रहा है। हमें यकीन है कि यशवंत सिंह के परिवार के साथ जो हुआ उसकी जानकारी मिलने के बाद कोई पत्रकार ऐसा नहीं होगा जिसका खून न खौला हो, क्योंकि इसमें दो राय नहीं कि आज यशवंत सिंह की माता के साथ हुआ है, कल मेरे और परसों किसी तीसरे के माता-पिता के साथ होगा। वैसे यशवंत सिंह के परिवार के साथ पुलिस ने जिस निरंकुशता का परिचय दिया वह घर फूटे, गंवार लूटे जैसी युक्ति की ओर ही इंगित करती है। बेहतर यही होगा कि यशवंत जी के मसले पर पत्रकार समाज एकजुट हो। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब नेता, पुलिस और अपराधियों की तिकड़ी का खामियाजा सबसे ज्यादा मीडिया बिरादरी को ही भुगतना होगा।

लेखिका रीता जायसवाल वाराणसी की निवासी हैं तथा स्‍वतंत्र लेखन करती हैं.

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