यूपी में जनता पर सरकारी और गैर सरकारी अपराधियों का कहर

रिजवानजिस प्रदेश में गरीब के पेट से घास निकले, बच्चे रोटी और कपड़े के मुफ्त वितरण में यूं झपट पड़े कि अकाल काल के ग्रास बन जाएं, उस प्रदेश के किस नेता को हम धन्यवाद दें और किस देवी-देवता को हम अपना नैवैद्य अर्पित करें, किस मजार पर जायें हम चादर चढ़ाने? जहां भुखमरी, कंगाली और बदहाली बच्चों से उनका हंसता खेलता बचपन छीन ले और बूढ़ों को फुटपाथ पर मरने के लिए छोड़ दे, हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद किसान भूखे सोएं, गुण्डे-माफिया सरेआम अबला की अस्मत लूटें और कालर चौड़ा कर खुलेआम घूमें।  प्रदेश्‍ावासी ऐसे तमाम समाचारों से आये दिन रुबरु हो रहे हैं कि कुशासन के चलते कहीं इंजीनियर आत्महत्या कर रहा है, तो कहीं मुआवजे की मांग पर किसान को बदले में मौत मिल रही है, कोई आर्थिक तंगहाली के चलते असमय मौत को गले लगा रहा है, तो कहीं पूड़ी के लालच में बच्चों की असामयिक मृत्यु हो रही है।

यही वह प्रदेश है जहां बुंदेलखण्ड के अकाल, सूखी धरती, मानिकपुर के जनजातीय दरिद्र, पूर्वांचल की अथाह गरीबी किसी को संतप्त नहीं करती। इस कुहासे में अथाह बदबूदार धन के मालिक ब्यूरोक्रेट, जनसेवक जनता की कमाई पर बदसूरत ऐश्वर्य के नए-नए अपयश-मान निर्माण करते दिखते हैं। यही वह प्रदेश है जहां के तीर्थ मां गंगा और यमुना का स्मरण मात्र सारे देश को पवित्र करता है। जी हां गंगा जमुनी तहजीब का यह सूबा जिसने देश को अधिकतम प्रधानमंत्री दिए आज बिहार से भी बदतर हालात का गवाह बन रहा है।

बात हो रही है उत्‍तर प्रदेश की, आज इस प्रदेश की स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि कानून का राज कानून द्वारा स्थापित करने में मौजूदा सरकार करीब-करीब फेल हो गई सी लगती है। मुख्यमंत्री मायावती के द्वारा समीक्षा बैठक कर लापरवाह अधिकारियों के विरुद्व सख्त कार्रवाई के निर्देश के बावजूद उनके अपने कारिन्दे जनसेवक, अधिकारी कानून-व्यवस्था का मखौल उड़ा रहे हैं। हर दिन खौफनाक घटनाओं से प्रदेश कांप रहा है। आम आदमी अपराधियों से त्रस्त है, पुलिस तंत्र मस्त और सरकार पस्त नजर आ रही  है।

औरैया में इंजीनियर द्वारा आत्महत्या का प्रकरण हो या कानपुर का दिव्या कांड हो या फिर बांदा की शीलू निषाद का मामला अथवा इलाहाबाद का कचरी काण्ड हो या लखनऊ में लेखपाल द्वारा की गई आत्महत्या, लगातार घटित हो रहे प्रकरणों ने सरकार के उस दावे की पोल खोल कर रख दी है जिसमें अब तक उत्‍तर प्रदेश सरकार द्वारा कानून का राज कानून द्वारा स्थापित किए जाने की बात कही जाती रही है। सरकार ने तो रेप के दोनों मामलों को शुरू में ही सिरे से खारिज कर दिया था, लेकिन जब विपक्ष और मीडिया ने इस मामले को जोर-शोर से उठाया तब सरकार ने सीबीसीआईडी जांच के आदेश दिए। विधायक द्विवेदी को जेल के सीखचों में कैद होना पड़ा।

वैसे सूबे में बलात्कार की घटनाओं कि साथ-साथ अपराधों में तेजी से इजाफा भी हुआ। भरथना की एक महिला अध्यापिका ने प्रबंधक रेप का आरोप लगाया, मामला मीडिया द्वारा उठाने पर प्रबंधक को जेल की हवा खानी पड़ी। जौनपुर में एक महिला प्रधानाचार्या ने यौन उत्पीड़न से आजिज होकर खुद को आग के हवाले कर दिया। गाजियाबाद में एक लड़की को सरेआम कार में खींचकर अपहरण करने के बाद रेप किया गया। राजधानी लखनऊ स्थित चिनहट इलाके  में एक दलित लड़की के साथ रेप करने के बाद हत्या कर दी गई। कानुपर के एक वकील ने अपनी अध्यापिका पत्नी का ट्रांसफर करवाने में असफल रहने के बाद मौत को गले लगा लिया। इस मामले में काबीना मंत्री अनंत कुमार मिश्र का नाम सामने आने पर सरकार ने सिरे से इनकार कर दिया।

आजमगढ़ में एक साधु की मौत से नाराज ग्रामीणों के उग्र प्रदर्शन में कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। इस मामले में भी सरकार ने लीपापोती ही की। पहले स्वाभाविक मौत बताया बाद में कहा साधु ने आत्महत्या की थी। औरैया में एक व्यक्ति को फर्जी की चोरी के इल्जाम में जेल भेजे जाने से आहत ग्रामीणों ने थाने पर हमला बोला जिसमें चौकी प्रभारी की मौत हो गई। सीतापुर में एक पूर्व एमएलसी के दबंग माफिया भाई ने दलितों को इसलिए प्रताड़ित किया कि उन लोगों ने पंचायत चुनाव में साथ नहीं दिया। इस मामले में दो दलितों की हत्या भी कर दी गई। इलाहाबाद में दलित परिवार की लड़कियों को दबंगों द्वारा निशाना बनाए जाने के विरोध का खामियाजा घर फूंकने की घटना से भुगतना पड़ा, लेकिन यूपी सरकार ने इसे नोटिस में ही नहीं लिया।

मेरठ में एक दबंग छात्र नेता ने एक युवती का अपहरण करने के बाद युवती के भाई को गोली मार कर घायल कर डाला, यूपी की खराब प्रशासनिक व्यवस्था से नाराज एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने एनेक्सी से कूद का आत्महत्या कर ली थी। मोहनलालगंज में तैनात लेखपाल ने आत्महत्या के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उसके वरिष्ठ अधिकारी उस पर नाजायज दबाव डाल रहे थे। इस तरह के तमाम ऐसे मामले घटित हुये हैं, जिन्होंने यूपी सरकार की कानून व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है।इन मामलों पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष ने साफ कहा कि यूपी की सरकार कानून-व्यवस्था के मुददे पर पूरी तरह फेल हो गई है। दलितों और महिलाओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। सरकार घटनाओं को रोक पाने में असफल है। हर तरफ लूटखसोट में नेता और अधिकारी जुटे हैं। सरकार का प्रशासन पर कोई अंकुश नहीं रह गया है। इसलिए उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही हैं।

यही नहीं यूपी में बढ़ते अपराधों पर विपक्षी दल सरकार को घेरने के लिए सड़क से लेकर सदन तक मोर्चा खोलने का निर्णय ले चुके हैं, क्योंकि प्रदेश का हालात बद से बदतर हो चुका है। बिहार, जो कि उत्‍तर प्रदेश से बदतर जाना जाता था, अब उत्‍तर प्रदेश ने उसे पछाड़ दिया है। यहां के हालात यह हैं कि यहां के बच्चे, महिलाएं अति सामान्य भोजन और बेहद सामान्य कपड़े का एक टुकड़ा लेने के लिए जान भी जोखिम में डालने को विवश हैं। यहां साड़ी की आस में दर्जनों महिलायें जान गंवा दती हैं और पूड़ी की आश में दर्जनों नौनिहाल भीड़ में दबकर मर जाते हैं। और मृतको के परिजनों को बदले में मिलती है मात्र सांत्वना। जरा सोचिये कि ऐसे प्रदेश का भविष्य क्या होगा?

अक्सर देखने में आता है कि थोक में गरीब ही जान गंवाते हैं और उनकी जान गंवाने की चर्चा तक नही होती और राहुल महाजन की दुल्हनियों के जुगुप्साजनक टीवी शो में पूरे देश में धूम मचाती हैं। गरीब के बच्चे दिल्ली और लखनऊ के जनसेवकों के दिल में राजनीति से परे दर्द पैदा नहीं करते। यहां हर कोई अपने भीतर एक सिकन्दर का रूप लिए बैठा है- कोई मूर्तियों का वितण्डावाद कर गरीबों की छाती पर अट्टाहस कर रहा है, तो कोई नायाब तरीके से गरीबों का वोट बैंक सहला रहा है। इसके पीछे उत्‍तर प्रदेश की नितान्त अपरिपक्व तथा शहरी अमीरों का प्रतिनिधित्व करने वाली वोट बैंक राजनीति का ऐश्वर्य और भोगवादी चरित्र एवं इन सबके साए में फलती-फूलती भ्रष्ट अफसरशाही है।

सर्वविदित है कि आईएएस, आईपीएस के सदस्य संविधान द्वारा रक्षित होते हैं, उन पर राजकीय नीतियां क्रियान्वित करने का दायित्व होता है पर वे हर भ्रष्ट नेता के दरबारीपन में अपना मोक्ष ढूंढते हैं। यदि वे तय कर लें कि किसी नेता के गलत काम में साथ नहीं देंगे तो कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता पर वे फिसलते हैं, क्योंकि वे फिसलना चाहते हैं और नेताओं की तरह ही वे भी ऐशो आराम धन दौलत चाहते हैं। अफसरों की तानाशाही की गवाही लेखपाल बाबूराम द्वारा लिखे मार्मिक सुसाइड नोट से ही जाहिर है, जिसमें उसने साफ -साफ लिखा.. बेटा रिक्शा चलाकर जीवन यापन कर लेना लेकिन लेखपाल न बनना। बाबूराम ने अफसरों के उत्पीड़न से परेशान होकर गणतंत्र दिवस के दिन आत्महत्या कर ली, उसने मोहनलालगंज तहसील के उप जिलाधिकारी और तहसीलदार पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाए तथा आत्महत्या का कारण इन्हीं दोनों अफसरों के कारनामों को बताया। तीन पृष्ठों के अपने सुसाइड नोट में उसने अपने बेटे से कहा है – यदि मेरे मरने का सदमा बर्दाश्त करते हुए तुम जिंदा बच जाते हो तो रिक्शा चलाकर जीवन यापन कर लेना लेकिन लेखपाल की नौकरी नहीं करना।

अफसरों व नेताओं के गठजोड़ का ही नतीजा है कि अब तक प्रदेश के कई इलाके आजादी के इतने सालों बाद भी मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं। एक ओर जहां अभी गांवों में परीक्षा के दिनों में भी छात्र-छात्राओं को बिजली नहीं मिल पाती, वहीं दूसरी ओर संसाधनों से लैस जनसेवक व अफसर अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों के एसी वातावरण में पढ़ाकर समाज विमुख विलासी पीढ़ी की ऐसी जमात तैयार करते रहते हैं, जो गरीबों की गरीबी को अपनी अमीरी बढ़ाने का उपकरण बनाती है। जिनके पास पैसा नहीं वे मोमबत्ती, लालटेन के सहारे आज भी पढ़ाई करते हैं और एक दिन अचानक किसी अमीर नेता के जन्मदिन पर बंटती साड़ियां लेते हुए या किसी बाबा ढोंगी के धार्मिक अनुष्ठान में पूड़ी और प्रसाद के लालच में लाइन में लगाकर जान खो देते हैं। ऐसी स्थिति के चलते यदि इन सामंती प्रवृति के जनसेवकों, नेताओं को गरीबों की बीमा पालिसी व बच्चों के मिड डे मील को डकारने व तरह-तरह के घोटालों को अंजाम देने वालों को जनता, धर्म और राष्ट्रीयता का शत्रु कहकर नवाजा जाये तो बुरा क्या है।

लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

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