यूरोप में आयुवेर्दिक दवाओं व अन्य वनौषधियों पर पाबंदी लगाये जाने की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए सुपरिचित किसान नेता प्रकाश पोहरे ने कहा है कि भारत ही आयुर्वेद का जनक है. यही आयुवेर्दिक दवाओं का मुख्य उत्पादक एवं निर्यातक देश है. पोहरे का कहना है कि अगर हमारी देशज दवाओं को यूरोपीय महासंघ दुष्परिणाम देने वाली करार देकर उन पर पाबंदी लगाता है, तो हम लोगों को भी यूरोपीय दवाओं का बहिष्कार करना चाहिए और भारत सरकार को वहां की एलोपैथी दवाओं पर तत्काल पाबंदी लगाना चाहिए. उल्लेखनीय है कि आयुवेर्दिक एवं वनौषधियों के सेवन से नागरिकों के स्वास्थ्य पर विपरीत परिणाम होते हैं, ऐसी चिंता जताते हुए यूरोपीय महासंघ ने इन दवाओं पर पाबंदी लगाकर इसे 1 मई 2011 से लागू करने का निर्णय लिया है.
प्रकाश पोहरे का कहना है कि यूरोपीय महासंघ का संबंधित आदेश अन्यायकारक और गलत है. इस प्रतिनिधि से हुई बातचीत में पोहरे ने बताया कि भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा ताई पाटिल जब पहली बार ब्राजील, मैक्सिको और चिली दौरे पर गई थीं, तब उन्होंने भारत की आयुर्वेदिक दवाइयों को सेहत के लिए सर्वोत्तम बताकर इनके प्रचार-प्रसार का काम किया था. भारत में प्राचीन काल से आयुर्वेद का अपना अनन्य महत्व है और कई सदियों से आयुर्वेदिक दवाएं मानव जीवन को सफल, सबल और सुदृढ़ बना रही हैं. इसके आज तक कहीं कोई विपरीत परिणाम (साइड इफेक्ट) देखने को नहीं मिले हैं.
इसे विपरीत, पोहरे के अनुसार एलोपैथी दवाएं मानव शरीर के लिए काफी हानिकारक हैं. अंग्रेजी दवाओं के कई साइड इफेक्ट्स भी देखने-सुनने को मिलते रहते हैं. जैसे डायबिटीज की गोलियां लगातार खाने वालों को ब्लडप्रेशर (रक्तचाप) बढ़ने का खतरा बना रहता है. पोहरे ने आरोप लगाया कि आयुर्वेदिक दवाओं पर पाबंदी लगाने की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की यह एक साज़िश है, ताकि उनकी एलोपैथी दवाएं धड़ल्ले से बिकती रहें. एलोपैथी दवाओं की संरचना ही ऐसी बनती है कि नियमित सेवन से मानव शरीर पर उसे विपरीत परिणाम (साइड इफेक्ट) होते हैं.
प्रकाश पोहरे का कहना है कि हमारे देश की आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन से कोई दुष्परिणाम अब तक सामने नहीं आए हैं. इसे बावजूद यूरोपीय देशों में 1 मई 2011 से हमारी आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री एवं सेवन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, तो यूरोपीय दवाओं का भी भारतीय लोगों को बहिष्कार करना चाहिए. भारत के स्वास्थ्य और वाणिज्य मंत्रालय ने भी इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि इससे हमारे आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं का काफी नुकसान होगा.
पोहरे का कहना है कि हमारे देश की नीतियां ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पोषित करने वाली हैं, इसलिए सबसे पहले इन नीतियों की ही समीक्षा करने की जरूरत है. इन्हीं नीतियों के कारण भारत सरकार हमारे किसानों का अहित करती रही है और शत्रु राष्ट्रों से कृषि-उत्पाद आयात करती रही है. जैसे कि हाल ही में पाकिस्तान से प्याज और चीन से लहसुन मंगाया गया था. किसानों और आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं का अहित करने वाली इन सरकारी नीतियों का निषेध करते हुए किसान नेता प्रकाश पोहरे ने यह भी कहा है कि यूरोपीय देशों में आयुर्वेदिक दवाओं पर पाबंदी लगाने से यह हमारी महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभाताई पाटिल का अपमान होगा, भारत सरकार का अपमान होगा. इसे रोकना होगा. अंत में पोहरे ने सुझाव दिया है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एलोपैथी दवाओं को बेअसर करने, भारत की आन-बान-शान कायम रखने और आयुर्वेदिक दवाओं के प्रचलन को जारी रखने के लिए सेंद्रीय खेती, नैसर्गिक खेती को पुनप्रर्स्थापित करने की जरूरत है. पुरानी परंपरा से खेती विकसित करने की जरूरत है, तभी भारत सहित विश्व के लोगों का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा.
लेखक सुदर्शन चक्रधर नागपुर में पत्रकार हैं.

