राव साहब का झुकाव हिन्‍दुत्‍व की तरफ था !

इस में लेख प्रवीण शर्मा ने वरिष्‍ठ पत्रकार रामशरण जोशी के किताब, ‘ अजुर्न सिंह : सहयात्री इतिहास का’ में लिखी गई उन बातों को लोगों के सामने लाने का प्रयास किया है, जो अमूमन आम लोगों की जानकारी में नहीं होती है. इस लेख का पहला भाग ‘नरसिंह राव को थी राजीव की हत्‍या की जानकारी!’ के रूप में प्रकाशित हो चुकी है. इसका दूसरा और अंतिम भाग प्रकाशित किया जा रहा है-  एडिटर

: नरसिंह राव ने आरएसएस की ट्रेनिंग भी ली थी : मानव संसाध्न विकास मंत्री के रूप में अर्जुन सिंह अपने प्रधनमंत्री नरसिंहराव से सीधे टकरा रहे थे : अर्जुन सिंह को हटवाने के लिए उद्योगपतियों ने करोड़ों रुपये इकट्ठा किए : बिड़ला जी को इंतजार करवाया : वर्ष 1987. अर्जुनसिंह राजीव-मंत्रिमंडल में संचार मंत्री हुआ करते थे. तुगलक रोड पर उनका सरकारी निवास हुआ करता था. एक शाम मैं पूर्व निर्धरित समय पर उनसे मिलने निवास पर पहुंचा हुआ था. दस-पंद्रह मिनट का समय बातचीत के लिए मुझे दिया गया था. बातचीत लंबी खिंच गई. इसी बीच उनके निजी सचिव बेबी ने कमरे में आकर सिंह को सूचित किया कि बिड़ला साहब (के.के. बिड़ला) उनसे मिलने के लिए आ पहुंचे हैं. सिंह ने बेबी को निर्देश दिया कि उन्हें अतिथि कक्ष में सम्मानपूर्वक बैठाएं और जलपान कराएं.

मैंने मन में सोचा कि मुझे अब उठ जाना चाहिए. संभव है अर्जुन सिंह संकोचवश मुझे जाने के लिए नहीं कह रहे हैं. अतः मैंने स्वयं ही उनसे जाने की अनुमति मांगी. वे बोले ‘आप बैठे रहिए. चर्चा पूरी कर लीजिए. आपको खबर भेजनी है.’ मैं मध्यप्रदेश से संबंधित चंद घटनाओं के बारे में उनके विचार जानने के लिए गया हुआ था. चर्चा फिर चल पड़ी. दस मिनट फिर बीत गए. बेबी ने पुनः अंदर आकर बिड़ला जी के बारे में बतलाया. सिंह ने अपने पी.ए. से कहा, ‘ठीक है, मैं बुलाता हूं.’ बेबी कमरे से बाहर चले जाते हैं. मैं फिर से दुविधाग्रस्त हो जाता हूं और जाने के लिए कहता हूं. अर्जुन कहते हैं, ‘अरे जोशी जी, आप अपना काम पूरा करिए. मुझे मालूम है सेठजी क्यों आए हैं और क्या चाहते हैं? उन्हें बैठने दीजिए.’ मैं समझ नहीं पाता हूं कि माजरा क्या है. बातचीत पांच मिनट और जारी रहती है. इसके बाद वे स्वयं ही कहते हैं, ‘अब आप चलें. मैं बिड़ला जी को देख लेता हूं.’ उन्होंने रहस्यमयी मुस्कान के साथ मुझे विदा किया.

मैं जैसे ही बाहर निकला बिड़ला जी के दो व्यक्ति मेरी ओर दौड़े. इससे पहले कि मैं अपनी कार में बैठता उन्होंने अतिशय विनम्रता से पूछा, ‘सर, आपका नाम क्या है?’ मैंने अपना नाम बतला दिया. दूसरा प्रश्न, ‘आप क्या करते हैं?’ इस प्रश्न के उत्तर में मैंने उन्हें अपना विजिटिंग कार्ड दे दिया. ‘तो आप पत्रकार हैं?’ ‘जी हां’ -मेरा उत्तर था. ‘क्या आप कभी मिल सकते हैं?’ उनमें से एक ने पूछा. मैंने कहा, ‘क्यों नहीं. एक पत्रकार का काम लोगों से मिलना और समाचार प्राप्त करना होता है. आप फोन कर दीजिए, मिलने का समय तय कर लेंगे.’ वे कार्ड लेकर वापस लौट गए और मैं अपने दफ्तर की ओर चल दिया. इस घटना से इतना अवश्य सिद्ध होता है कि अर्जुन सिंह हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के मालिक और उद्योगपति के.के.बिड़ला जैसे पूंजीपति से कतई आतंकित नहीं थे. उन्होंने बिड़ला जी के आगमन को सहज भाव से लिया और बिलकुल भी विचलित नहीं हुए. उनके स्थान पर यदि कोई दूसरा राजनीतिज्ञ होता तो वह तुरंत ही मुझ जैसे मामूली क्षेत्रीय पत्रकार को चलता कर देता और सेठजी की अगवानी के लिए कमरे से बाहर जाता.

वर्ष 1993-94. यह घटना अर्जुन सिंह के 1-रेसकोर्स रोड स्थित सरकारी निवास की है. सर्दियों के दिन थे. समय लगभग शाम चार-पांच बजे का रहा होगा. देश में सिंह-राव संग्राम की धूम मची हुई थी. मानव संसाध्न विकास मंत्री के रूप में अर्जुन सिंह अपने प्रधनमंत्री नरसिंहराव से सीधे टकरा रहे थे. राजनीतिक, प्रशासनिक, मीडिया और उद्योगपतियों के बीच इस संग्राम के संभावित पटाक्षेप को लेकर चर्चाओं-अपफवाहों का बाजार अपने उफान पर था. ऐसे दौर में मेरा सिंह से मिलना सप्ताह में एक-दो बार हो जाया करता था. बगैर पूर्व निर्धरित समय के मैं उनके निवास या कार्यालय में पहुंचकर उनसे मिलने का ‘चांस’ लिया करता था. कभी-कभी लंबी प्रतीक्षा भी करनी पड़ती थी.

जब धीरूभाई अंबानी पहुंचे राव से समझौता कराने

ऐसे ही दौर में मैं अर्जुन सिंह से मिलने उनके निवास पर पहुंचा हुआ था. चूंकि मेरा समय पहले से निर्धरित नहीं था, अतः मुझे उनके पी.ए. ने प्रतीक्षा करने के लिए कहा. मैंने पी.ए. से यह अनुरोध जरूर किया कि वे अर्जुन सिंह को फोन पर मेरे आने की सूचना दे दें या भीतर मेरे नाम की पर्ची भेज दें. नाम की पर्ची अंदर भेज दी गई. मैं निश्चिंत होकर पत्रिकाएं उलटने-पलटने लगा. दस-पंद्रह मिनट बीते होंगे कि मैं देखता हूं कि ऑफिस चैम्बर का दरवाजा खुलता है. एक सांवले रंग का वृद्ध व्यक्ति धीरे-धीरे बाहर निकलता है. वह व्यक्ति सूट-बूट में होता है. मेरे पास बैठा एक अन्य व्यक्ति तुरंत ही उस वृद्ध व्यक्ति की ओर दौड़ता है. वह उसे सहारा देता है.

वह वृद्ध व्यक्ति आहिस्ता-आहिस्ता पोर्च में लगी अपनी लंबी लग्जरी कार की ओर बढ़ता है. उसे चलने में दिक्कत हो रही थी. मैं व्यक्ति को पहचानने की कोशिश करता हूं. इसी बीच पी.ए. आकर मुझसे कहता है, ‘साहब ने आपको भीतर बुलाया है.’ मैं पी.ए. से पूछता हूं, ‘ये साहब कौन थे?’ पी.ए. मेरी ओर हैरत से देखता है और कहता है, ‘कमाल है जोशी जी! आपने इन्हें पहचाना नहीं?’ ‘दिमाग से उतर गया.’ मैं शर्माते हुए कहता हूं. ‘अरे साहब, आप धीरूभाई अंबानी थे!’ मेरे मुंह से निकल जाता है, ‘तो अर्जुन सिंह जी उन्हें कार तक छोड़ने नहीं गए?’ पी.ए. ने तपाक से जवाब दिया, ‘आप हमारे सर को तो जानते ही हैं.

वे सेठों को छोड़ने-लेने नहीं जाते हैं.’ मैं भीतर पहुंचा. मैंने छूटते ही अर्जुन सिंह जी से सीनियर अंबानी के बारे में उत्सुकता जाहिर की. मैंने यह भी कह डाला कि ‘आप उन्हें कार तक छोड़ने नहीं गए.’ वे मुस्कुराए और बोले, ‘छोड़िए जोशी जी, अंबानी जी समर्थ हैं. उनका अपना काम था और राव साहब से मिलने चलने के लिए कह रहे थे.’ मैंने पूछा, ‘आपने क्या कहा?’ ‘पहले मैं समझ नहीं पाया कि धीरूभाई ऐसा क्यों कह रहे हैं. फिर मैंने उनसे सिर्फ इतना ही कहा- हम सभी अपना-अपना काम कर रहे हैं.’

अर्जुन सिंह को हटवाने के लिए करोड़ों रु. जमा किए

जब अर्जुनसिंह की तीसरी पारी शुरू हुई थी, उन दिनों मैं दक्षिण दिल्ली की जंगपुरा कॉलोनी में रहा करता था. मेरी एक पड़ोसी पत्रकार हुआ करती थीं- ऐली कुट्टी. वह मूलतः केरल की थी और दिल्ली में वर्षों से रह रही थी. मूपनार, भागवत झा ‘आजाद’ जैसे कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ उसके करीबी संबंध थे. मझौले उद्योगपतियों के बीच भी उसका उठना-बैठना रहा करता था. अर्जुन सिंह के म.प्र. के मुख्यमंत्री के रूप में त्यागपत्र देने के कई दिन बाद एक शाम कुट्टी ने मुझे आई.आई.सी. (इंडिया इंटरनेशनल सेंटर) में चाय पर आमंत्रित किया था.

चाय पर इस मलयाली पत्रकार ने मेरा परिचय तमिलनाडु के एक बीड़ी उद्योगपति से करवाया था. वह उद्योगपति कोई चालीस-पैतालीस का रहा होगा. जब कुट्टी ने उक्त उद्योगपति को यह बतलाया कि मेरा अर्जुन सिंह के साथ अच्छा संबंध है तब उसने बड़े दर्प के साथ बतलाया कि अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटवाने के लिए किस प्रकार की मोर्चाबंदी की गई थी. यदि उद्योगपति के शब्दों को यथावत लिया जाए तो उत्तर भारत और दक्षिण भारत के कुछ तेंदूपत्ता व्यापारी और बीड़ी उद्योगपति एकजुट हुए. उन्होंने कुछ करोड़ रुपए जमा किए.

कांग्रेस के कतिपय बड़े नेताओं से मिले. प्रदेश के प्रतिपक्ष के कुछेक वरिष्ठ नेताओं से भी संपर्क किया गया. न्यायिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों के साथ भी बातचीत की गई. इसके पश्चात ही अर्जुन सिंह की हटने की पृष्ठभूमि रची जा सकी. उद्योगपति की बात पर मुझे सहसा विश्वास नहीं हो पा रहा था. कुट्टी ने बतलाया कि उसका उद्योगपति मित्र राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस के साथ है, लेकिन सिंह की तेंदूपत्ता नीति के कारण उसके और अन्य उद्योगपति मित्रों को काफी नुकसान हुआ था, इसलिए मध्यप्रदेश की राजनीति से सिंह को बाहर करने की पटकथा लिखी गई. उसके शब्दों में कितनी प्रतिशत सत्यता थी यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन उसके स्वरों में दर्प-मिश्रित विजयभाव अवश्य कौंध रहे थे!

यस, मि. प्राइम मिनिस्टर!

प्लेटफार्म पर लखनऊ मेल रवाना होने के लिए तैयार खड़ी है. अर्जुन सिंह प्रथम श्रेणी के कूपे में बैठ चुके हैं. मैं उनके पास खड़ा हूं. वे मुझसे कह रहे हैं कि वे प्रधानमंत्री की इच्छा के विपरीत लखनऊ जा रहे हैं. जहां वे फैजाबाद व अयोध्या जाएंगे. वे स्वयं घटनास्थल पहुंचकर स्थिति का जायजा लेना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें ‘अनहोनी’ का अंदेशा है. उन्हें लग रहा है कि कारसेवक जरूर कुछ चमत्कार दिखाएंगे. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती जैसे नेता 6 दिसंबर को वहां होंगे तो कुछ अनहोनी न घटे, यह अकल्पनीय लगता है. मैं भी सिंह के विचारों से सहमत हूं.

इसी बीच एक पुलिस अधिकारी आता है और उन्हें सैल्यूट मारकर अनुरोध करता है- ‘सर, पी.एम. साहब आपसे बात करना चाहते हैं. ‘तब बताइए कैसे की जाए?’ ‘आप मेरे साथ स्टेशन मास्टर के कमरे में चलिए, जहां वे फोन पर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं.’ मैं कहता हूं, ‘यह कैसे संभव है? गाड़ी थोड़ी देर में चली जाएगी’ सिंह भी ऐसा ही संकेत पुलिस अधिकारी को देते हैं. उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे. अधिकारी उनसे तीन-चार बार अनुरोध करता है, लेकिन वे उसे उपकृत नहीं करते हैं. हार कर वह चला जाता है. हम दोनों को लगता है कि प्रधानमंत्री राव की योजना है कि इस लखनऊ-यात्रा को विफल कर दिया जाए.

कुछ मिनट पश्चात वही अधिकारी अपने दो सहयोगियों के साथ पुनः उपस्थित होता है. मुझे आशंका होती है कि कहीं अर्जुन सिंह को जबरन रोका तो नहीं जाएगा? लेकिन दूसरे क्षण मैं सोचता हूं कि प्रधानमंत्री ऐसी भयंकर गलती नहीं करेंगे. यदि वे अपने वरिष्ठ काबीना मंत्री को बलपूर्वक ट्रेन से उतरवाकर वापस घर भेज देते हैं तो देश में जबर्दस्त प्रतिकूल प्रतिक्रिया होगी. राव साहब की छवि प्रभावित होगी. मैं देख रहा हूं कि वही अधिकारी संकोच के साथ पुनः अनुरोध कर रहा है- ‘सर, प्लेटफार्म पर लगे पब्लिक टेलीफोन बूथ पर पी.एम. साहब से बातचीत की व्यवस्था कर दी गई है.

जब तक आपकी बातचीत नहीं होती तब तक ट्रेन नहीं जाएगी.’ ‘ओ.के.’ अर्जुन सिंह कुछ मुस्कुराते हैं और कूपे से उतरकर आहिस्ता-आहिस्ता बूथ की ओर बढ़ते हैं. बूथ करीब सौ मीटर के फासले पर स्थित है. इसी बीच दूसरे डिब्बों में सवार मीडियाकर्मी उन्‍हें देख लेते हैं. दैनिक ‘पॉयनियर’ का फोटोग्राफर उनके पीछे दौड़ता है. बूथ खोलकर अर्जुन सिंह प्रधानमंत्री राव से बात करना शुरू कर देते हैं. दोनों के बीच क्या बात हो रही है, हम में से कोई भी नहीं सुन पा रहा है. सिर्फ शुरू का ही वाक्य हम मीडियाकर्मी पकड़ पाए. ‘हैलो! यस, मि. प्राइम मिनिस्टर!’

तीन-चार मिनट बातचीत होती है. अर्जुन सिंह अपने कूपे में लौट आते हैं. मीडियाकर्मियों के सवालों का जवाब देने से इनकार कर देते हैं. वे केवल इतना ही कहते हैं- ‘आप लोग लखनऊ चल ही रहे हैं. वहीं बात करेंगे.’ जब सब मीडियाकर्मी चले जाते हैं तो ए.एस. मुझे सिपर्फ इतना ही बतलाते हैं- ‘राव साहब, दिल्ली में ही रूकने के लिए कह रहे थे. उन्हें लग रहा है कि मेरे जाने से कहीं लखनऊ-अयोध्या में अशांति न फैल जाए. मैंने उन्हें विश्वासपूर्वक कहा है कि ऐसा कुछ नहीं होगा.’

राव ने अयोध्या घटना रोकने के लिए खास कोशिश नहीं की ‘आखिर 6 दिसंबर को आपने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? क्या आपको हिन्दू बैकलैश की आशंका थी?’ वे मेरे सवालों से बिलकुल भी विचलित नहीं हुए. उन्होंने पहले जैसे ही शांत भाव से कहा, ‘मैं कांग्रेस पार्टी और सरकार की कीमत पर कुछ नहीं करना चाहता था. मैं नहीं चाहता था कि मेरे किसी कदम से संगठन और सरकार को अपूर्णनीय आघात पहुंचे. संभावित हिन्दू बैकलैश से मैं कतई चिंतित नहीं था.’ ‘यदि आप इस्तीफा देते तो क्या आपके साथ दूसरे मंत्री भी सरकार छोड़ते?’

‘यह मैं नहीं कह सकता और न ही मैंने इसके जानने की कोशिश की. हो भी सकता है कि कुछ छोड़ते, लेकिन जब मुझे उस रास्ते पर जाना ही नहीं था, तो मैं क्यों इसका पता लगाता?’ ‘क्या प्रधानमंत्री राव 6 दिसंबर की घटना से दुखित थे?’ ‘मैंने उनसे अयोध्या की घटना के बारे में पूछा जरूर था. He was shocked. उनका व्यवहार कभी-कभी Panic जैसा था.’ ‘क्या राव साहब ने इस घटना को रोकने की कभी कोशिश नहीं की थी?’ ‘घटना हो गई. राव साहब ने कोई खास कोशिश नहीं की. उनका झुकाव हिन्दुत्व के प्रति बहुत साफ था. He did see some merit in Hindutv philosophy. He was in RSS and attended its training.

राव साहब लगातार Pro-Hindutav agenda पर चल रहे (बाबरी मस्जिद के सवाल पर) थे.’ ‘क्या उन्हें मस्जिद को ढहाए जाने की पूर्व जानकारी थी?’ ‘यह मैं नहीं जानता. लेकिन इसके आसार सभी को दिखाई दे रहे थे. प्रधानमंत्री को ऐसा नहीं लग रहा हो, यह कैसे संभव है?’ ‘आप 5 दिसंबर को लखनऊ में थे. तत्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ आपकी चर्चा भी हुई थी. आप वहां से अयोध्या भी जाना चाहते थे. लेकिन लखनऊ से ही आप दिल्ली लौट आए. ऐसा क्यों हुआ?’ ‘कल्याण सिंह जी से अयोध्या की संभावित घटनाओं को लेकर जरूर बात हुई थी. उन्होंने मुझे आश्वासन दिया था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को कुछ नहीं होगा. सब कुछ शांतिपूर्वक निपट जाएगा. मैं यही ‘इम्प्रेशन’ लेकर दिल्ली लौट आया और प्रधानमंत्री को अवगत करा दिया.’ ‘क्या यह विश्वासघात सिद्ध नहीं हुआ?’ ‘बिलकुल!’

मुझे लगा- कहीं नेहरू जी पेपर वेट न दे मारें

अर्जुन सिंह के किरदार की हमेशा से विशेषता यह रही है कि उन्होंने चुनौतियों से कभी पलायन नहीं किया बल्कि आगे बढ़कर उनका स्वागत किया. कल्पना की जा सकती है कि जब नेहरू जी जैसे शक्तिशाली नेता का परोक्ष प्रत्याशी डॉ. कैलाश नाथ काटजू चुनाव हार जाए या हरा दिया जाए तो उसका कैसा प्रभाव पंडित जी पर पड़ेगा? पंडित जी अपने गुस्से के लिए हमेशा चर्चित रहे हैं. अतः म.प्र. के किसी भी बड़े नेता में नेहरूजी के संभावित गुस्से का सामना करने का साहस बिलकुल नहीं था. प्रदेश के नेता चाहते थे कि कोई व्यक्ति नई दिल्ली जाकर नेहरूजी को संपूर्ण घटनाचक्र से अवगत कराए.

आखिरकार वरिष्ठ नेताओं ने अर्जुन पर यह जिम्मेदारी डाली और कहा कि ‘तुम जाओ युवा हो- पंडितजी का कम-से-कम गुस्सा तो झेल लेना. क्योंकि कोई भी बात हो सकती थी.’ सिंह के अनुसार ‘यह सुनकर मैं बड़े असमंजस में पड़ गया. लेकिन जब एक बार गुट का फैसला हो जाता है तो आदमी को उसे करना ही पड़ता है. मैं दिल्ली गया. मुझे प्रधानमंत्री से टाइम मिल गया. जब में साउथ ब्लॉक स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचा तो मुझे मालूम हुआ कि नेहरूजी अपने कक्ष में टहल रहे हैं.

उनके पी.ए. ने मुझसे कहा- ‘ Pandit ji is not in good mood. So be careful.’ मैंने उनसे कहा- ‘भई अब जो होगा सो होगा, अब क्या करें?’ पी.ए. से मुक्त होकर जैसे ही मैं कमरे के अंदर दाखिल हुआ तो मैंने देखा कि नेहरूजी तेजी से इधर-उधर टहल रहे हैं. उनके हाथों में पेपर-वेट था. वे उसे उछाल-उछालकर पकड़ रहे थे. एक सेकंड तो मुझे लगा कि मैं बिल्‍कुल ही गलत समय पर आ गया हूं. कहीं ये पेपरवेट का ही तो इस्तेमाल नहीं कर देंगे! लेकिन अब क्या हो सकता है, मैं कमरे में घुस गया था और वापस बाहर आने का सवाल नहीं उठता था. नेहरू जी ने तमतमाते हुए मुझसे पूछा- ‘कहिए क्या कहानी लेकर आए हैं?’ मैंने संभावित स्थिति को भांपकर पांच-सात पंक्तियों का एक पत्र तैयार कर रखा था. मैंने चुपचाप वही उनको दे दिया.

उन्होंने बहुत करीब से उसे पढ़ा. इसके बाद वे बोले- ‘फिर तो मिश्र जी ही बचे?’ मैंने कहा- ‘यह तो आपकी मर्जी पर है.’ बहरहाल मैंने यह जरूर महसूस किया कि इस पूरे घटनाक्रम में काटजू साहब को थोड़ा ‘लेट-डाउन’ किया गया है. मैंने यह बात नेहरू जी से जरूर कह दी. इसके बाद he become normal. मैंने सोचा कि यदि केवल मिश्र जी की ही पैरवी नेहरू जी के सामने करूंगा तो वे मुझे निकाल ही देंगे. लेकिन यह सच है कि नेहरू जी ने सबकुछ समझ लिया कि काटजू साहब के साथ क्या हुआ. उन्होंने यह अवश्य कहा- ‘कहीं बहुत बड़ी बेइंसाफी हुई है. आप लोगों ने एक अच्छे सीधे-सादे आदमी की इज्जत बिगाड़ दी है.’

मैं विनम्रतापूर्वक सिर्फ यही कह सका- ‘आप जो भी कहें, सब स्वीकार है. जो भी हुआ, वह तो हकीकत है. लेकिन स्टेट को तो चलाना है, और खासतौर से राजमाता (ग्वालियर) एंड कंपनी के इर्द-गिर्द जो प्रतिक्रियावादी शक्तियां चारों तरफ जमा हो गई हैं उनको रोकना भी है. इसके लिए मजबूत नेतृत्व चाहिए.’ इसके बाद नेहरूजी ने टहलना बंद कर दिया और एक जगह खड़े हो गए. इसके बाद मैंने महसूस किया कि शायद अब मेरी कुछ बात चलेगी. कुछ क्षण रुकने के बाद नेहरूजी बोले- ‘ठीक है, उनसे (मिश्रजी) कहो हमसे आकर मिलें. अब हो गया न तुम्हारा ‘परपज पूरा’?’ मैं चुपचाप उनके कमरे से बाहर चला आया.’

इंदिराजी ने कहा-मैं बेहतर जानती हूं अर्जुनसिंह को

25 जून, 1977 की रात्रि को इमरजेंसी की घोषणा की गई थी. उस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी थे. वे मालवावासी थे. इंदिराजी के विश्वासपात्रों में उनकी गिनती हुआ करती थी. वे इंदिरा-मंत्रिमंडल में कैबिनेट स्तर के मंत्री भी रहे थे. प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में उन्हें दिल्ली के अत्यंत करीब समझा जाता था. अतः इमर्जेंसी लागू होने के बाद जब उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई तो प्रधनमंत्री के इस कदम पर चर्चा होना स्वाभाविक था. बकौल अर्जुन सिंह, इंदिराजी ने सेठी जी को कुछ निर्देश पहले ही दे दिए थे कि इमरजेंसी के प्रति क्या दृष्टि अपनाई जानी चाहिए.

कैबिनेट की बैठक में इस कदम पर चर्चा की गई. जाहिर है, सभी ने इसका समर्थन किया. लेकिन अर्जुन सिंह खामोश रहे. सेठी जी ने सिंह के रवैये को भांप लिया कि वे इमरजेंसी से सहमत नहीं हैं. मुख्यमंत्री सिंह को लेकर बाहर गए और उनसे इमरजेंसी के संबंध में अलग से चर्चा की. अर्जुन ने मुख्यमंत्री को स्पष्ट शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की- ‘सेठी जी, शायद यह कदम आगे चलकर बहुत कठिनाई पैदा करेगा. संभव है अभी यह सही दिखाई दे, लेकिन कल कुछ दिक्कतें हो सकती हैं.’ यह सुनकर सेठीजी का कहना था- ‘भई, जब लीडर का फैसला है तब हम क्या कर सकते हैं और क्या सोचें?’

मैंने उनसे कहा- ‘अगर ऐसी बात है तो मैं भी सहमत हूं, मत सोचिए’ लेकिन मेरे ‘रिजर्वेशन’ को इंदिराजी ने जरूर महसूस किया. उन्होंने मुझसे इमरजेंसी को सपोर्ट करने की बात कभी नहीं कही. हालांकि लोगों ने उनसे मेरे खिलाफ शिकायत भी की थी, क्योंकि राजनीति में तो लोग हर स्थिति का फायदा उठाते ही हैं. लोग उनसे कहते रहे- ‘मैं इमरजेंसी के पक्ष में कुछ नहीं बोलता हूं. अर्जुन सिंह आपके प्रति बिलकुल लायक नहीं है.’ लेकिन इंदिराजी ने एक-दो लोगों से मेरे बारे में सिर्फ इतना ही कहा- ‘I know him better’ इसके बाद यह मामला खत्म हो गया.’

प्रदेश की राजनीति का एक अध्याय समाप्त हुआ

पी.सी. सेठी को दिल्ली बुला लिया गया. उनके स्थान पर श्यामचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने. अपनी पत्नी के कारण मैं संजय गांधी के करीब आया अर्जुन और श्यामाचरण शुक्ल के बीच पहले से ही मधुर राजनीतिक संबंध नहीं थे. परिणामस्वरूप सिंह को शुक्ल-मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया. सिंह ने भी इसके लिए कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई. यह भी सच है कि मुख्यमंत्री शुक्ल अपनी इस जिद पर अड़े रहे कि वे सिंह को मंत्री नहीं बनाएंगे. जहां प्रदेश की राजनीति में परिवर्तन हुआ, वहीं केंद्र की राजनीति में भी एक नया आयाम जुड़ा.

संजय गांधी सरकार और संगठन में प्रधानमंत्री के बाद सबसे शक्तिशाली सत्ता-स्तंभ बन गए. ए.एस. ने भी नए बनते समीकरणों को ध्यान में रखकर अपनी राजनीतिक यात्रा को जारी रखा. सिंह को संजय गांधी के बढ़ते प्रभाव को समझने में देरी नहीं लगी. उन्होंने इस उभरते राजनीतिक स्टार के साथ भी अपने संबंध स्थापित कर लिए. हालांकि सिंह-परिवार का इंदिरा परिवार में आना-जाना लगा ही रहता था और बड़े पुत्र राजीव व छोटे पुत्र संजय गांधी के लिए अर्जुन अपरिचित नहीं थे. चूंकि संजय गांधी नई भूमिका में सामने आ रहे थे, इसलिए सिंह को उनके साथ वर्तमान व भविष्य को ध्यान में रखकर संबंध जोड़ने की जरूरत महसूस हुई.

संजय और उनकी पत्नी मेनका गांधी के साथ संबंधें को घनिष्ठ बनाने में सिंह की पत्नी श्रीमती सरोज सिंह की भूमिका भी कम नहीं रही. श्रीमती सिंह का अमेठी राजघराने के प्रतिनिधि संजय सिंह के साथ पारिवारिक संबंध था. अतः संजय सिंह ने भी अर्जुन परिवार को संजय गांधी के समीप लाने में अपना परोक्ष योगदान दिया होगा. लेकिन सिंह स्वयं स्वीकार करते हैं, ‘यह हकीकत है कि संजय गांधी के विश्वास की पृष्ठभूमि में मेरी पत्नी की भी भूमिका थी. यह मैं नहीं जानता कि यह कैसे हुआ? लेकिन संजय गांधी मेरी पत्नी पर विश्वास किया करते थे.

यद्यपि पत्नी का कोई राजनीतिक रोल तो था नहीं. लेकिन दोनों के बीच विश्वास था. अब यह चाहे अमेठी की वजह से हो या जैसे भी हो, दोनों के बीच बातचीत जरूर होती रहती थी.’ जहां तक इंदिरा जी का प्रश्न है, सिंह उनसे दिल्ली जाकर जब-तब मिलते रहे. इंदिराजी भी उनसे बीच-बीच में प्रदेश की स्थिति और सामान्य घटनाक्रम के संबंध में पूछ लिया करती थीं. सिंह भी अपने नेता को ईमानदारी के साथ ‘ब्रीफ’ कर दिया करते थे. यह सिलसिला इमरजेंसी उठने तक जारी रहा.

देखना मैडम, कांग्रेस अपनी ही राख से फिर खड़ी होगी

आखिर इमरजेंसी कब तक लागू रहती? इसे एक रोज तो समाप्त होना ही था. आखिर वह दिन आ गया जब इंदिराजी ने इमरजेंसी समाप्त करने और देश में नए आम चुनाव कराने का निर्णय ले ही लिया. सिंह बतलाते हैं कि जब 1977 में चुनाव कराने का अत्यंत नाजुक समय आया, तब अनेक लोगों ने इंदिराजी से कहा कि कांग्रेस भारी बहुमत से जीतेगी. ‘इंदिरा जी ने मुझसे भी इस संबंध में पूछा. मैंने उनसे सिर्फ यही कहा- ‘इंदिरा जी, हमारी जानकारी इतनी बड़ी तो नहीं है कि मैं बड़े लोगों की राय (बहुमत प्राप्त करने की) को नकार दूं.

देश में जो जनता का ‘नेचुरल रिएक्शन’ दिखाई दे रहा है, वो यह है कि हम लोग इसमें (चुनाव) We will not do well. Take the risk. You are known for taking the risk और मैं क्या कहता? और जब रिजल्ट वगैरह सब आ गए तो उन्होंने एक दिन मुझे दिल्ली बुलाया और कहा- ‘If you were that doubtful why did you not warn me’ मेरा उन्हें उत्तर था- ‘मैडम, इतिहास और नियति का ऐसा मिश्रण कुछ ही लोगों के जीवन में होता है. आज हम राजनीतिक रूप से बहुत बुरी अवस्था में हैं. लेकिन मेरी ऐसी आशा है कि इस स्थिति से आप देश और कांग्रेस को निकाल लेंगी और वह होगा कांग्रेस का राख के ढेर से निकलकर खड़ा होना.’

संजय गांधी ने अर्जुनसिंह को मुख्यमंत्री बनवाया

दिसंबर, 1979 में लोकसभा के चुनाव हुए. जनवरी, 1980 में इंदिरा गांधी की भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी हुई. इसके पश्चात मई, 1980 में मध्यप्रदेश विधनसभा के चुनाव हुए. कांग्रेस भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और अर्जुनसिंह ने 9 जून, 1980 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन यह सब कुछ आसानी से संपन्न नहीं हुआ. सिंह को शक्ति-परीक्षण के दौर से गुजरना पड़ा. विद्याचरण शुक्ल और उनके समर्थक (शिवभानु सिंह सोलंकी, कृष्णपाल सिंह आदि) चाहते थे कि प्रदेश की बागडोर आदिवासी नेता शिवभानु सिंह सोलंकी को सौंपी जाए. पहले सर्वसम्मति से कांग्रेस विधयक दल के नेता के चुनाव की कोशिशें की गईं.

आलाकमान के प्रतिनिधि व पर्यवेक्षक के रूप में प्रणब मुखर्जी को भोपाल भेजा गया. एक ओर अर्जुन और उनके समर्थक थे तो दूसरी ओर विद्याचरण शुक्ल, शिवभानु सिंह सोलंकी तथा अन्य समर्थक थे. लेकिन सच्चाई यह है कि प्रदेश नेतृत्व के हकदार का फैसला लगभग दिल्ली में हो चुका था. संजय गांधी चाहते थे कि अर्जुनसिंह के हाथों में प्रदेश सरकार की कमान सौंपी जाए. चयन से पहले दिल्ली में कई प्रकार की कवायदें भी हुईं. श्रीमती सिंह ने भी अपनी भूमिका निभाई. चूंकि संजय गांधी के साथ उनकी ‘ट्यूनिंग’ अच्छी थी, इसलिए उन्होंने खुलकर यह आशंका भी जाहिर की कि वी.सी. (विद्याचरण शुक्ल) उनके पति को कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बनने देंगे. जब भी नेता पद का चुनाव होगा वी.सी. अपना उम्मीदवार जरूर खड़ा करेंगे.

संजय गांधी ने श्रीमती सिंह को हर दृष्टि से आश्वस्त किया और कहा कि सब प्रकार की व्यवस्था के बाद ही नेता का चुनाव होगा. संजय गांधी ने प्रणब मुखर्जी को सिंह को चुनवाने की जिम्मेदारी सौंपी. उनसे यह भी कहा कि आपको भोपाल जाना है और सिंह को निर्वाचित करवाने के बाद ही दिल्ली लौटकर आना है. संजय गांधी ने श्रीमती सिंह को पूरे संकेत दे दिए थे. चूंकि दोनों पक्षों में से कोई भी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए सिंह और सोलंकी के बीच टकराव को टाला नहीं जा सका. वी.सी. की लॉबी ने भोपाल में प्रचारित किया कि नवनिर्वाचित विधयकों का उनके प्रत्याशी को पूर्ण समर्थन प्राप्त है और सोलंकी ही विधयक दल के नेता चुने जाएंगे. नेता के निर्वाचन को लेकर भोपाल में जमकर नाटक चला.

इस नाटक के नेपथ्य की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए देशबंधु के प्रधन संपादक मायाराम सुरजन लिखते हैं- ‘इस चुनाव में एक और महत्वपूर्ण व्यक्ति अपनी भूमिका निभा रहा था. वे थे स्वर्गीय संजय गांधी. विद्याचरण शुक्ल तथा अर्जुन सिंह दोनों ही संजय गांधी के करीब थे. दोनों को ही अपने-अपने पक्ष के समर्थन का पूरा विश्वास था. विद्याचरण गुट से शिवभानु सिंह सोलंकी को उम्मीदवार घोषित किया गया. सोलंकी काफी वरिष्ठ विधायक तो थे ही, अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधि होने के कारण उन्हें केन्द्र का समर्थन मिलने की आशा भी रही होगी… सभी कांग्रेसी विधायकों से राय ली गई. उन्होंने अपने-अपने उम्मीदवारों का नाम कागज की चिट पर लिखकर हाईकमान के प्रतिनिधियों को सौंप दिया. यह राय जानने के बाद दोनों ने अर्जुन सिंह के पक्ष में बहुमत होने की घोषणा कर दी.

इसके पश्चात कांग्रेस विधायक दल की विधिवत बैठक हुई. शिवभानु सिंह सोलंकी ने अर्जुन सिंह का नाम प्रस्तावित किया. नियमानुसार उनके नाम का समर्थन भी किया गया. इस तरह अर्जुन सिंह दल-नेता एवं मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए. जानकार सूत्रों का कथन है कि वास्तव में सोलंकी को अर्जुन सिंह से अधिक मत प्राप्त हुए थे. किंतु सिंह के गतिशील व्यक्तित्व तथा इंदिराजी के प्रति एकाग्र निष्ठा के कारण उन्हें ही दल का नेता घोषित किया गया. संभवतः श्रीमती गांधी के निर्देश से ही यह किया गया. सोलंकी अधिक मत पाने के बावजूद मुख्यमंत्री का दायित्व ठीक से संभाल पाएंगे या नहीं, यह शंका बनी रहने के कारण अर्जुन सिंह के पक्ष में ही इंदिरा जी का मन बना होगा. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विद्याचरण शुक्ल की तुलना में  अर्जुन सिंह इंदिराजी के अधिक निकट आ गए थे.

सोनिया साथ देती तो अर्जुन प्रधानमंत्री होते

राजीव गांधी-नेतृत्व के पटाक्षेप और सत्ता के दृश्य परिवर्तन ने नए समीकरणों को जन्म दिया. कइयों ने फिर पाला बदला. कई छोटे-बड़े नेताओं ने नेहरू-इंदिरा-परिवार के साथ अपने संबंधों को शिथिल कर प्रधनमंत्री नरसिंहराव के साथ अपनी गोटियां फिट कीं. लेकिन सिंह ने अपनी निष्ठा की उष्मा को ठंडा नहीं होने दिया. उन्होंने मुझसे एक बार कहा भी था- ‘मैं संबंधों को बहुत दूर तक निभाता हूं. उस समय तक निभाता हूं जब तक सामने वाले में ईमानदारी रहती है. मैं अपने विश्वासघातियों के प्रति सिर्फ उदासीन होता हूं. उनसे प्रतिशोध नहीं लेता. यह मेरी कार्यशैली है.’ सिंह पर भी नेहरू गांधी-परिवार से संबंध-विच्छेद करने के लिए भारी दबाव पड़ा.

यहां तक कि प्रधनमंत्री राव ने स्वयं भी सिंह से कहा- ‘अब आप इस परिवार का मोह छोड़िए. आपमें राजनीतिक प्रतिभा व तीव्रता है. अब देश को नई राजनीति की जरूरत हैं. आगे बढ़िए.’ लेकिन सिंह ने ऐसा नहीं किया. यदि वे चाहते तो प्रधानमंत्री राव के विश्वासपात्र बन जाते और नेहरू-इंदिरा-परिवार के साथ वर्षों पुराने संबंध के अध्याय की इति वहीं कर देते. यदि वे ऐसा करते तो राजनीतिक दृष्टि से कुछ भी गलत नहीं होता, क्योंकि औसत राजनीति आज तात्कालिक उपलब्धि में जीती है, भविष्य में  नहीं. जून, 1991 में जब प्रधानमंत्री के चयन की कवायदें चल रही थीं, तब भी अर्जुन सिंह का नाम प्रबल दावेदारों में था.

उस समय मुख्य रूप से तीन नाम उभर रहे थे- नरसिंह राव, अर्जुन सिंह और प्रणब मुखर्जी. कुछ क्षेत्रों में केरल के वरिष्ठतम कांग्रेसी नेता करुणाकरण का नाम भी चर्चा में था. यदि सोनिया गांधी सिंह के पक्ष में सक्रिय हो जातीं तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता था. लेकिन सोनिया जी राजीव गांधी की मृत्यु से बुरी तरह टूटी हुई थीं. उन्होंने स्वयं के भीतर खुद को समेट रखा था. वे 10-जनपथ से न तो बाहर निकला करती थीं और न किसी को मिलने का समय दिया करती थीं. ऐसे विषम और कारूणिक वातावरण में सिंह ने अपने संबंध की दुहाई नहीं दी.

यद्यपि यह भी सच है कि सिंह का प्रधानमंत्री बनना आसान नहीं था, क्योंकि उनकी विरोधी लॉबियां (राष्ट्रीय व समुद्रपारीय) बेहद सक्रिय थीं. नरसिंह राव को भी विभिन्न प्रकार की लॉबियों से अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा था. वैसे एक बार करुणाकरण जी ने केरल भवन में कुछ पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में  इतना जरूर कहा था कि फिलहाल राव जी का प्रधानमंत्री बनना ठीक रहेगा, लेकिन अगले प्रधानमंत्री अर्जुन सिंह ही होंगे. सिंह का नाम इस शक्तिशाली पद के लिए इतना अधिक गूंज चुका था कि 20-कैनिन लेन स्थित सिंह के आवास पर सुरक्षा-व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी. सुरक्षा एजेंसियां उन्हें देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रही थीं. लेकिन अर्जुन सिंह खामोशी के साथ और कांग्रेस के परंपरागत अनुशासित सिपाही के रूप में सब कुछ देख रहे थे. उन्होंने इस पद की प्राप्ति के लिए किसी दुस्साहसिकता का प्रदर्शन नहीं किया.

लेखक प्रवीण शर्मा मध्‍य प्रदेश से प्रकाशित मैग्‍जीन ‘हैलो हिन्‍दुस्‍तान’ के संपादक हैं.  उन्‍होंने इस लेख में वरिष्‍ठ पत्रकार रामशरण जोशी द्वारा लिखी गई, ‘ अर्जुन सिंह : सहयात्री इतिहास का’ से कई ऐसे प्रसंगों को सामने लाने का प्रयास किया है, जिससे लोग अब तक अनजान थे.

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