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लालची पत्रकारिता को तमाचा हैं असांजे

साल 2010 कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण रहा। पूरी दुनिया में ऐसी घटनाएं हुई जिन्होनें विश्व के लगभग सभी देशों में हलचल पैदा की। साल 2010 में कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिन्होंने विश्व में नए आयाम स्थापित किए। ऐसी तमाम घटनाओं पर दुनिया भर के समाचार चैनल और पत्रों ने समय-समय पर ख़बरें भी प्रकाशित की। लेकिन जुलाई 2010 में एक अनजान व्यक्ति नें ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसने समस्त विश्व की नींद ही उड़ा दी। 2001 में अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादियों के हमले को मानवता पर दशक का सबसे क्रूर हमला माना गया। जब अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इस हमले का जवाब देने का प्रण किया तब पूरे विश्व को यह विश्वास था कि आतकंवाद के साथ उसी की भाषा में ही बात करना उचित होगा। दिलचस्प बाद ये थी कि 2001 में ही अमरीका ने अफगानिस्तान को आतंक का जड़ मान कर उस पर हमला भी कर दिया।

साल 2010 कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण रहा। पूरी दुनिया में ऐसी घटनाएं हुई जिन्होनें विश्व के लगभग सभी देशों में हलचल पैदा की। साल 2010 में कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिन्होंने विश्व में नए आयाम स्थापित किए। ऐसी तमाम घटनाओं पर दुनिया भर के समाचार चैनल और पत्रों ने समय-समय पर ख़बरें भी प्रकाशित की। लेकिन जुलाई 2010 में एक अनजान व्यक्ति नें ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसने समस्त विश्व की नींद ही उड़ा दी। 2001 में अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादियों के हमले को मानवता पर दशक का सबसे क्रूर हमला माना गया। जब अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इस हमले का जवाब देने का प्रण किया तब पूरे विश्व को यह विश्वास था कि आतकंवाद के साथ उसी की भाषा में ही बात करना उचित होगा। दिलचस्प बाद ये थी कि 2001 में ही अमरीका ने अफगानिस्तान को आतंक का जड़ मान कर उस पर हमला भी कर दिया।

अमरीका ने समस्त विश्व को यह विश्वास भी दिलाया कि यह मानवता के हित में आवश्यक है। लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा था कि अमरीका इस मुद्वे पर भी राजनीति करेगा। इराक पर आतंकवाद समर्थक और रासायनिक हथियार रखने का आरोप लगाकर 2003 में हमला करने के अमरीका के फैसले ने दुनिया के अन्य देशों में बैचेनी पैदा कर दी। जार्ज बुश पर विश्व शांति के नाम पर निजी उद्देश्यों को पूरा करने के आरोप भी लगे. अमरीका और सहयोगी देश इस बात को नकारते रहे। लेकिन इराक से कुछ भी ना मिलना, विश्व के अन्य देशों का आतकंवाद की चपेट में आना और फिर जब जुलाई 2010 में जूलीयन असांजे (विकीलिक्स के संस्थापक) ने आफगान डायरी के नाम से अमरीकी सेना के खुफिया दस्तावेज अपनी वेबसाईट विकीलिक्स पर जारी किए तब एहसास हुआ कि अमरीका की नीयत में आतंकवाद का सफाया नहीं है। तब की अमरीकी सरकार का आतंक विरोधी अभियान खुलासे के बाद एक विशेष ऐजेंडा पूरा करने का अभियान लगने लगा।

2001 से लेकर आज तक ओसामा बिन लादेन अमरीका की गिरफ्त से बाहर ही है और समय-समय पर टेप जारी कर अपने होने का एहसास दिलाता रहता है। अफगानिस्तान और इराक को चप्पा-चप्पा छान लेने के बावजूद लादेन का कोई अता पता नहीं है। दोनों भुक्तभोगी देशों के हालात नरक तुल्य बनाने के बाद अमरीकी प्रशासन को भूल का एहसास हुआ और वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सेना वापसी की वकालत की। क्या यह युद्व वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ था या फिर यह एक सनकी राजा का अपनी ताक़त दिखाने का फैसला था या फिर दुनिया पर राज़ करने का प्रयास? जवाब फिर से विकीलीक्स ने ही दिया। जब विकीलिक्स ने अमरीका के बेहद महत्वपूर्ण और संजीदा प्रशासनिक संचार प्रक्रिया में सेंध लगाई और अति संवेदनशील दस्तावेजों को हासिल कर लिया तब शायद ही किसी ने उन दस्तावेजों का महत्व समझा होगा। लेकिन आसांजे को भी अंदाजा नहीं होगा कि वो बारूद के उस ठेर पर बैठे हैं, जिस पर किसी हल्की सी गरम हवा से भी आग लग सकती है।

जब नवंबर में उन्होंने विश्व के अन्य देशों के बारे में अमरीकी राय सम्बधित दस्तावेज अपनी वेबसाइट पर अपलोड किए तब सबको पता चल गया कि वास्तव में अमरीका की चाहत क्या है। अमरीका ब्रिटेन की तरह पूरी दुनिया पर शासन करना चाहता था और इसके लिए उसने अपने खुफिया तत्रं और राजनायिकों का बखूबी इस्तेमाल किया। दुनिया के अन्य देशों के नेताओं की ताक़त और कमजोरी, सैनिक स्थिति और अन्य खुफिया जानकारियां हासिल कर के अमरीका एक ऐसी रणनीति तैयार कर रहा था, जिससे वो किसी भी राष्ट्राध्यक्ष को अपनी उगंली पर नचा सके। लेकिन असांजे ने अमरीका को नगां कर के उसके अरमानों पर पानी फेर दिया। असांजे ने सच्ची पत्रकारिता का वो मिसाल पेश किया है, जिसको हजा़र सालों तक कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के अकाट्य उदाहरण के तौर पर याद किया जाएगा। यदि असांजे चाहते तो जुलाई के बाद अपने आप को अरबों डालर में बेच कर एक रईस जीवन बिता सकते थे, लेकिन एक सच्चे पत्रकार की तरह उन्होंने अपनी आत्मा को मरने नहीं दिया (बरखा दत्त, प्रणव राय, प्रभु चावला जैसे पत्रकार कम दलालों की आत्माएं भी पढ़े)। आज एक खानाबदोश और निवार्सित जीवन जीने के बावजूद अपने कर्तव्य को पूरा करने की जुगत में लगे असांजे के लिए दुनिया भर में बढ़ रहे सर्मथन से आज मुझे ये एहसास हो गया है कि आज भी ईमानदार लोगों को मायूस होने की जरूरत नहीं है। गांधी एक कल्पना नहीं है और आज जरूरत है तो बस अपनी आत्मा को जिन्दा रखने की। हालात में फिर परिवर्तन होगा और सच्ची पत्रकारिता फिर अपने शिखर पर होगी। अतं में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि

क्यों मरते हो बेवफा सनम के लिए,
मरना है तो मरो वफाए कऱम के लिए
वरना दो गज़ जमीं भी ना होगी नसीब दफन के लिए,
करम बेदी पर जाते कफन की आरजू ना रखना मेरे यारों,
हसीनाएं दुपट्टा तक उतार देंगी तुम्हारे कफन के लिए।

लेखक सतीश कुमार सिहं पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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