लोकतंत्र के लिए घातक हैं चुनावी सर्वे

चाहे विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा। चुनाव प्रचार शुरू होता नहीं कि विभिन्न मीडिया समूहों के चुनावी सर्वे आने शुरू हो जाते हैं। सर्वे भी ऐसे कि विभिन्न समूह विभिन्न पार्टियों को आगे दिखाते हैं। सर्वे में एक बात प्रमुखता से आती है कि हर बार भापजा को बढ़त दिखाई जाती है। वह बात दूसरी है कि चुनाव परिणाम आने पर चुनावी सर्वे में आगे चलने वाली भाजपा अचानक पीछे चली जाती है। पूंजीपतियों की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा ने मीडिया का इस्तेमाल करते हुए राजनीतिक फायदा भी उठाया है। अब अन्य पार्टियां भी ऐसा करने का प्रयास करती हैं।

मेरा मानना है कि आज की तारीख में विभिन्न मीडिया समूह चुनावी सर्वे व चुनावी समीक्षा के माध्यमों से विभिन्न पार्टियों का चुनाव प्रचार करते नजर आते हैं। कारपोरेट रंग में रंग चुके मीडिया से आप पारदर्शिता और ईमानदारी की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। जहां मीडिया में चुनाव से पहले ही विभिन्न पार्टियों से विभिन्न तरीकों से पैसे ऐंठने की रणनीति बनने लगती है, वहां ईमानदारी से चुनावी सर्वे होते होंगे, यह मुझे नहीं लगता। बात सच्चे और झूठे सर्वे की नहीं है। बात है लोकतंत्र में जनता के मन को बदलने का प्रयास करने की।

अक्सर राजनीतिक दल मीडिया की कमजोरी का फायदा उठाते हुए अपने पक्ष में चुनावी सर्वे कराते हैं, जिसका असर जनता के दिमाग पर पड़ता है। कई बार जनता इन चुनावी सर्वे के दबाव में भी आ जाती है। ऐसे में चुनाव आयोग को तत्काल प्रभाव से चुनावी सर्वे पर रोक लगानी चाहिए। मैं भी मीडिया में रहा हूं। अक्सर शहरी मतदाताओं से पूछकर चुनावी सर्वे तैयार कर लिए जाते हैं। शहरी मतदाता भाजपा का माना जाता है तो स्वभाविक है कि सर्वे में भाजपा ही आगे रहेगी। ऐसे में गांव-देहात में रहने वाले मतदाताओं पर दबाव बनाने का प्रयास किया जाता है। चुनाव परिणाम से पहले ही मीडिया परिणाम बताने की कोशिश की जाए, वह भी इस भ्रष्ट दौर में। इससे बड़ा जनता के साथ मजाक नहीं हो सकता है। जो मीडिया समूह अपने कर्मचारियों का शोषण और उत्पीड़न करता हों। दलाली और राजनीतिक गठजोड़ की बातें जगजाहिर हो चुकी हों। वे मीडिया समूह जनहित में ईमानदारी से काम कर ही नहीं सकते।

चुनावी सर्वे में तो पैसा लगता है। हमेशा पैसे की ओर ताकने वाले मीडिया में यह पैसा कहां से आता है ? जिन पूंजीपतियों ने मीडिया समूह खोला ही व्यवसाय के लिए और अपनी ढाल के लिए है। वे भला कैसे अपना पैसा मात्र नाम के लिए लगा देंगे ? आज की तारीख में राजनीतिक पार्टियों और कारपोरेट घरानों के साथ मीडिया का जो गठजोड़ है, इसका टूटना देश व समाज के लिए बहुत जरूरी है।  देश में कितनी समस्याएं भरी पड़ी हैं, उनको दिखाने के लिए मीडिया के पास समय नहीं है। कितनी बेरोजगारी है ? निजी संस्थाओं में कितना शोषण और उत्पीड़न है। कितना भ्रष्टाचार है।  खुद मीडिया में कितने बड़े स्तर पर  शोषण और उत्पीड़न का खेल चल रहा है। यह मीडिया मालिकों और इसमें काम कर रहे पत्रकारों को नहीं दिखाई देता है। हां जहां दलाली का मौका मिल जाए वहां गिद्ध की तरह जरूर झपट पड़ेंगे।

यही वजह है कि किसी समय पत्रकारों को सम्मान की दृष्टि से देखने वाले लोग अब हेय दृष्टि से देखने लगे हैं। किसी समय जरूरतमंद के लिए काम करने वाला मीडिया अब पूंजीपतियों के लिए काम कर रहा है। जनता की आवाज उठाने वाले पत्रकार अब पूंजीपतियों और राजनीतिक दलों की गुलामी करते नजर आते हैं। नेताओं से प्रश्न पूछने में भी उनकी गुलामी झलकती है, जिन मीडिया समूह में मालिकान संपादकों को अपने इशारे पर नचाते हों। संपादक मालिकों के तलुए चाटते हों। उन मीडिया समूहों में से आप निष्पक्षता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ? हां कुछ पत्रकार हैं जो बेबाक रूप से पत्रकारिता कर रहे हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में मैं रवीश कुमार और प्रसून वाजपेई का नाम प्रमुखता से लेना चाहूंगा। सोशल मीडिया में भड़ास 4 मीडिया चलाने वाले भाई जसवंत सिंह ने मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार और पीड़ित मीडियाकर्मियों की आवाज को उठाया है, जो सराहनीय है। इनके अलावा भी ऐसे कई पत्रकार हैं जो विभिन्न माध्यमों से जनहित के मुद्दे उठा रहे हैं, अन्याय के खिलाफ बिगुल बजा रहे हैं। पत्रकारिता की इज्जत बचा पा रहे हैं पर ऐसे पत्रकारों की संख्या न के बराबर है। ये पत्रकार जरूरत सलाम करने के लायक हैं।

लेखक चरण सिंह राजपूत पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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