पिछले बीस वर्षों में भारत में कृषि भूमि 21.4 लाख हेक्टेयर कम हो गयी है। बड़े पैमाने पर बांधों, कारखानों, विशेष आर्थिक क्षेत्र, शहरी विस्तार व राजमार्गों आदि के लिए खेती की भूमि का प्रयोग हो रहा है। जिसके चलते कृषि भूमि लगातार कम होती चली जा रही है। भारत में 1991 के बाद प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता लगातार गिर रही है, जो 1991 में प्रतिव्यक्ति 468.5 ग्राम के मुकाबले 2008 में 274.6 ग्राम रह गयी। कृषि उपज व रोजमर्रा की खाने की चीजों को वायदा कारोबार के दायरे में लाने से जहाँ तेजी से मंहगाई बढ़ी वहीं इस खेल के मकड़जाल में फँस कर लोग कंगाल हो रहे हैं। जबकि, सट्टा खिलाने वाले लाखों-करोड़ों का लाभ कमा रहे हैं। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता और भी कम हो जाएगी।
इन दो दशकों में कृषि भूमि के अंधाधुंध अधिग्रहण के चलते हजारों किसान भूमिहीन हो गए। जिन खेतों के सहारे उनकी पीढि़यां पलीं वे खेत अब उनके हाथ से निकल गए हैं। भूमि अधिग्रहण से जो पैसे मिले वो भी खतम हो चुके हैं। ऐसे किसानों के सामने मुश्किलें भी लगातार बढ़ी हैं। महंगाई ने इन लोगों को और अधिक तोड़ कर रख दिया है।
लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। इन दिनों समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के हिस्से हैं। मेरठ निवासी गोपाल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

