विरोध के ये सुर, नीयत पर सवाल!

500-1000 रुपये के नोटों पर बंदी के बाद जिस तरह से कुछ स्वयंघोषित तर्कशास्त्रियों ने हाहाकार मचाया है उससे काफी हैरान हूं और उतना ही ज्यादा अंर्तमन से दुखी भी हूं। खैर कुछ मुट्ठी भर लोगों के उद्देशीय और निजी विरोध से ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि देश, सरकार के इस फैसले से साथ खड़ा है।  बिना तथ्यों को जाने, बिना समझें कुछ स्वार्थी लोग सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। ये ठीक उसी तरह है जैसे कहा जाता है ना अधूरा ज्ञान ज्यादा खतरनाक होता है, नोट बंदी पर अधूरे ज्ञान वाले मुझे कुकुरमुत्ते की फसल की तरह दिखाई दे रहे हैं। ये लोग सरकार का कोसने में लगे हुए हैं, कैसे भी करके कहीं से भी लूप होल्स खोज रहे हैं कि आखिर कैसे सरकार के इस फैसले को गलत साबित करें। जितना प्रयास वह लूप होल्स खोजने में कर रहे हैं, उससे कम प्रयास उन्हें बैंकों की लाइन में लगकर अपनी रोजमर्रा के खर्च के लिए पैसे निकालने के लिए लगेंगे। लेकिन नहीं हम यदि ऐसा कर लेंगे को मौजूदा सरकार को कोसने की कसमें जो खाई हैं वह टूट जाएंगी।

विरोध करने वाले शायद ये भूल रहे हैं कि यदि एक उंगली यदि वह दूसरे पर उठा रहे हैं तो बाकी की चार उंगलियां उनकी तरफ हैं। चलो भाई मान लेते हैं की लोकतंत्र में विरोध करने का भी सबकों अधिकार है। किंतु यह ध्यान रखना चाहिए यह विरोध स्वार्थ से ओत-पोत और उद्देश्यपूर्ण ना होकर तर्कसंगत होना चाहिए। यहां तक इस लेख को पढ़ने के बाद स्वयंघोषित तर्कशास्त्रियों को लग रहा होगा इसको लिखने वाला कोई बीजेपी या मोदी का समर्थक होगा। तो मैं ऐसे मतिमंदों को बता दूं कि मेरा समर्थन यहां किसी नरेंद्र मोदी या किसी बीजेपी को नहीं है। अपितु मेरा समर्थन हर उस अच्छे कदम पर है जो देशहित में उठाए गए हैं और उठाए जाएंगे। और हां यदि अच्छे कामों के पक्ष में खड़े रहना, आपको किसी राजनीतिक पार्टी या किसी व्यक्ति विशेष का समर्थन करना लग सकता है तो इसके लिए आपकी बौद्धिक क्षमता जिम्मेदार है। और फिर अच्छा काम के करने वालों का समर्थन करें भी तो इसमें क्या बुराई है। खैर ये तो मेरी बात हो गई, विषय पर लौटते हैं।

दोस्तों मौजूदा समय में देश की स्थिति ठीक उस आधे पानी से भरे ग्लास की है, जो आधे खाली ग्लास को देखने के चक्कर में ग्लास में आधा पानी है उसको भी नजरअंदाज कर रहे हैं। यहां सवाल फिर से सकारात्मकता और नकारात्मकता का आ जाता है। आप चाहें तो सकारात्मक हो जाएं, या चाहें तो नकारात्मक। देश के ज्यादातर लोग आज सरकार के इस फैसले के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं, सरकार के साथ दिखाई दे रहे हैं। पेठ में दर्द किसी के हो रहा है तो कुछ मुट्ठीभर विवेकहीनों और देश के पुरोधा बने राजनेताओं को। खैर राजनेता सरकार के लिए फैसले का विरोध कर रहे हैं तो ज्यादा हैरानी नहीं है। क्योंकि भले चाहे फैसला सही हो या गलत उन्हें तो अपना विपक्ष धर्म निभाना है। इस धर्म को निभाने में भले ही देश की फजीहत हो जाए लेकिन ये तो विरोध ही करेंगे। मैं तो इन विपक्षियों को गंधारी की उपमा देना ज्यादा बेहतर समझ रहा हूं। जी हां गंधारी, जो देख तो सकती थी लेकिन फिर भी आँखों पर पट्टी बांध रखी थी। ऐसा ही कुछ हाल दोस्तों, मेरे देश में कथित जनता के नुमाइंदों का है। जो देख तो सकते हैं, सही लगता जानते हैं, अच्छा बुरा समझते हैं, लेकिन फिर भी आँखों पर पट्टी बांधकर विरोध के सुर अलाप रहे हैं।

देश के उन लोगों की प्रतिक्रिया पर थोड़ा दुख जरूर हो रहा है जो बिना पूरा सच जाने, कुछ बुद्धिहीन नेताओं की बातों में आकर सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। मैं  फिर दोहराना चाहता हूं आपको विरोध का पूरा अधिकार है, किंतु ये विरोध भेड़ चाल वाला ना हो। शांत बैठकर अपनी अंर्तआत्मा की आवाज़ आप सुने, सही गलत के बारे में सोचें उसके बाद फैसला लें तो ज्यादा बेहतर होगा। इन विरोधियों का कहना है कि लोगों को घंटों लाइनों में खड़ा होना पड़ा रहा है, तो इसमें हर्ज क्या है। क्या इससे पहले देश कभी लाइनों में खड़ा नहीं हुआ है। जियो सिम की लाइनें, सिनेमाघरों में लाइनें, रेलवे स्टेशनों पर लाइनें, मोबाइल फोन के लिए लाइनें, यहां तक की मैंने तो मुंबई में हर रविवार तो लोगों को फाफड़ा और जलेबी के लिए भी घंटों लाइनों में खड़े देखा है।  साहब ये देश शुरू से ही लाइनों वाला देश रहा है, बिना लाइन के यहां तो लोग बाथरूम भी नहीं जाने देते। अच्छा चलो आपकी तरह से ही समझाता हूं। अब ही हाल ही चीमें दीवाली बीती, दीवााली के दौरान हमारे नागपुर में सब हल्दीराम की मिठाइयां लेने के लिए घंटों लाइनों में खड़े रहते हैं, मिठाइयों के लिए सुबह सात बजे से ही लाइनें लगनी शुरू हो जाती हैं। दीवाली के दौरान ऐसा ही कुछ देश के हर शहर में होता है। क्या आप मुझे बताएंगे हम ये मिठााई के लिए ये लाइनें क्यूं लगाते हैं, शायद इसलिए ना ताकि हमें मिलावट वाली मिठाइयां ना खरीदनी पड़ें, शुद्ध मिठाइयां मिलें। जब हम इतने समझदार हैं तो आज देशहित में लाइनों में खड़े होने का विरोध क्यों कर रहे हैं।

जो लोग स्वयं के पैसे बदलवाने के लिए, लाइन में लगने पर सरकार को कोस रहे हैं। तो ज़रा इस देश का इतिहास खंगाल लो, शायद आपकी याददाशत कमजोर हो गई होगी। यह देश राशन और मिट्टी के तेल के लिए घंटों और पूरा दिन लाइन में खड़ा रहता था। बावजूद इसके कई बार राशन लिए बिना ही बैरंग लौटना पड़ता था। उस दौर में भले मैं बहुत छोटा था लेकिन सालों तक इसका मैं गवाह और भुक्तभोगी रहा हूं। उन लाइनों और आज की लाइनों में बहुत फर्क है, बस जरुरत है तो थोड़ा सब्र करने की। दोस्तों किसी बीमारी के लिए जब हम ऑपरेशन करवाते हैं तो भयंकर दर्द से गुजरना पड़ता है, लेकिन बावजूद इसके हम ऑपरेशन करवा लेते हैं। क्यूं करवाते हैं, इसलिए ना ताकि हम पूरी तरह ठीक हो सकें। बुखार होता है तो इंजेक्शन लगवाते हैं कड़वी दवाइयां खाते हैं कि नहीं। उन कड़वी दवाइयों से हमारी तबीयत ठीक हो जाती है। तो दोस्तों देश की बीमार अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए कुछ कड़वे कदम उठाए गए हैं तो आपका ये विरोध शोभा नहीं देता। कालाधन चाहे विदेश में हो या देश में दोनों गलत हैं हमारी कोशिश हमेशा इसके विरोध की होनी चाहिए। ना कि ये कहने की पहले विदेशों से काला धन लाते फिर देश का निकालते। दोस्तों पहले हम सफााई घर में करते हैं, घर साफ होने के बाद आस-पास के परिसर की सफाई के लिए बाहर निकलते हैं।

विनोद यादव (विद्रोही)
वरिष्ठ पत्रकार

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