वोटों के बाज़ारवाद में निहित है ओसामा के ‘जी’ हो जाने के अर्थ

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह आजकल आतंकवादियों का महिमा मंडन करते हैं और साधु-संतों का मान मर्दन। वह साधु संतों को राजनीति से दूर रहने की चेतावनी देने के साथ ही वह ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी कह कर सम्मानित करते हैं। उन्होंने ओसामा बिन लादेन के अंतिम संस्कार पूर्ण मज़हबी रीति से करने को जरूरी बताया है। इस बयान से उन्होंने लादेन को इस्लामिक आइकन के तौर पेश किया है। वह लादेन को इस्लाम का आइकन बनाकर श्री नरेंद्र मोदी को हिन्दुत्व का आइकन साबित कर रहे हैं और इस पर्दे के पीछे एक भयानक लोकतांत्रिक महाघोटाले को अंजाम दिया जा रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण किन्तु कटु सत्य है कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम के आइकन के रूप में महमूद गज़नवी, मोहम्मद ग़ोरी, चंगेज़ ख़ान और बाबर को पेश करके इस्लाम को रक्तपात प्रिय धर्म के रूप में प्रचारित किया गया।

पाकिस्तान ने इस विचार को खूब अपनाया और वहां पाकिस्तानी हथियारों का नामकरण तक इन्हीं आक्रांताओं के नाम पर हुआ है। लेकिन कितने लोग सोचते हैं कि भारत में इस्लाम ने आध्यात्मिक उन्नति भी खूब की है। दारुल उलूम, नदवा, देवबंद, बरेली और केरल में कई इस्लामिक संस्थानों में इस्लामिक परंपरा के आध्यात्मिक उत्थान के लिये शोध एवं अध्ययन होते रहे हैं। अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती गरीबनवाज़, फतेहपुर सीकरी के शेख सलीम चिश्ती, दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया, शिरडी के साईं बाबा जैसे अनेक महान सूफी संतों से लेकर आज के युग के अली मियां जैसे अनेक विद्वान ही भारत में इस्लाम के आइकन के रूप में सफल हो सकते हैं। वे ही गंगा जमुनी तहज़ीब के प्रतीक है। सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिये भी इन संतों की महिमा को प्रचारित करना समाज में धार्मिक टकराव को समाप्त करने में कारगर साबित हो सकता है।

इसी तरह भारत में हिन्दुत्व के प्रतीक के रूप में आदि शंकराचार्य ही श्रेष्ठतम आध्यात्मिक व्यक्तित्व होंगे। राजनीतिक सामाजिक दृष्टि से आचार्य विष्णुगुप्त ‘चाणक्य’, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, राजा कृष्णदेव राय, सम्राट अशोक तथा स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसी विभूतियां ही हिन्दुत्व के आइकन हो सकती हैं। श्री नरेन्द्र मोदी, नाथूराम गोडसे, अशोक सिंहल जैसे लोग तो कतई नहीं। आज के समय में ऐसे अनेक विवाद मुक्त संत हैं, चार पीठों के शंकराचार्य हैं जिन्हें हिन्दू धर्म के ध्वजवाहक माना जा सकता है।

ओसामा के अंतिम संस्कार को लेकर सऊदी अरब से लेकर पाकिस्तान तक में कोई बहस या बयानबाज़ी नहीं हुई। भारत के इस्लामिक विद्वानों ने भी ओसामा के खात्मे पर संतोष जाहिर किया है और उसे दुनिया भर में इस्लाम की बदनामी का कारक बताया है। लेकिन श्री दिग्विजय सिंह ओसामा जी के संबोधन से देश को टकराव के एक नए द्वार पर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के लिये पहचाने जाने वाले समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और आज़म ख़ान चुप हैं। कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी भी अपनी चुप्पी के साथ श्री सिंह को मूक समर्थन दे रहीं हैं जो ज़ाहिर करता है कि श्री सिंह अकेले नहीं हैं। श्री सिंह को इस बात का उत्तर देना चाहिये कि 1984 के सिख दंगों में मारे गये लोगों, पंजाब में भिण्डरावाले, कश्मीर में लश्कर, जैश और हिज्बुल के आतंकवादियों के अंतिम संस्कार में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने कौन से धार्मिक संस्कारों का ख्याल रखा। वह या कांग्रेस यह कह कर नहीं बच सकते कि ये श्री सिंह के निजी विचार हैं। वह कांग्रेस के अग्रिम पांत के नेता हैं। महासचिव हैं। पार्टी के कर्णधार राहुल गांधी के राजनीतिक सलाहकार हैं। मेरा मत है कि श्री सिंह के विचार देश में कांग्रेस के वैचारिक खोखलेपन या किसी घिनौनी साजिश की निशानी हैं।

चूंकि श्री सिंह ‘‘मैनेजमेंट पॉलिटिक्स (या पॉलिटिकल मैनेजमेंट) के गुरू’’ ( ? ) माने जाते हैं इसलिये संभव है कि उन्हें ऐसा करके अगले वर्ष उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों के उस अशिक्षित एवं गैर जागरूक युवा वर्ग को कांग्रेस से जोड़ने में मदद मिलने की उम्मीद हो, जो स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से सहानुभूति रखता है तथा अपनी कंगाली के लिये सरकार को कोसता है और ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श मानता है। लेकिन एक ऐसी पार्टी के लिये इस कदम के जोखिम बहुत बड़े हैं जो 125 वर्ष पुरानी है और देश को आजादी दिलाने के साथ ही 50 साल सरकार चलायी है तथा जिसे सभी धर्मों और जातियों का समर्थन और प्रतिनिधित्व हासिल है।

हो सकता है कि इस प्रकार की बयानबाजी से कांग्रेस को उसके टारगेट वर्ग के कुछ वोट मिल भी जायें लेकिन इसके नुकसान अकल्पनीय हैं। पारंपरिक वोटरों के एक बड़े वर्ग का मोह भंग तो होगा ही बल्कि इस टारगेट वर्ग को राजनीतिक प्रश्रय मिलते ही इसका तेजी से विस्तार होगा और आश्चर्य नहीं कि देश में पाकिस्तान की तरह ओसामा समर्थक रैलियों का आयोजन भी होने लगे। अगर ऐसा हुआ तो देश में साम्प्रदायिकता का ऐसा विद्रूप चेहरा सामने आ सकता है, जो देश के टूटने का खतरा पैदा कर दे। इसके अलावा बौद्धिक राजनीति रसातल में जायेगी, कारपोरेट राजनीति और वोटों का बाजारवाद बढे़गा, आम आदमी को उसके सरोकारों से अलग करके वोट-वस्तु के रूप में तब्दील करने में मदद मिलेगी तथा विदेशी ताकतों के एजेण्डे को लागू करना आसान होगा। आम आदमी महँगाई की चक्की में पिस जायेगा, किसान आत्महत्या पर मजबूर होगा। मध्यवर्ग दो जून की रोटी के फेर में दौड़ भाग में लगा रहेगा। विरोध करने की ताकत छिन जायेगी। दूसरे शब्दों में कहें तो देश को आजादी दिलाने वाली पार्टी के आज के नेता भारत को फिर से गुलामी की राह पर धकेलने पर आमादा हैं।

दिग्विजय सिंह के ओसामा बिन लादेन पर बयान का रहस्य वोटों के बाजारवाद में निहित है। यह सार्वभौमिक तथ्य है कि बाजारवाद के दुश्मन हैं, प्रतिमान, मान्यतायें, परंपरावाद और आदर्शवाद। परंपरायें, मान्यतायें और आदर्श टूटे बिना बाज़ार नहीं बन सकता है। इसे कण्डोम के प्रचार अभियान से समझा जा सकता है जिसने युवा पीढ़ी में विवाह पूर्व और विवाहेत्तर यौन संबंधों को अपराध बोध से मुक्त कर स्वछंद सम्भोग की धारणा को बढ़ावा दिया क्योंकि संयमी जीवन एवं एक जीवनसाथी के प्रति निष्ठा की सभ्य समाज की मान्यताओं और आदर्शों के दायरे में कण्डोम का बाजार कितना बढ़ सकता था। ठीक इसी प्रकार वोटों के बाजारवाद को स्थान दिलाने के लिये राजनीतिक परंपरावाद और आदर्शवाद ध्वस्त करना ज़रूरी है जो श्री सिंह बखूबी कर रहे हैं। उनका यह काम पिछले काफी समय से विभिन्न राजनीतिक बयानों में साफ झलकता है। चाहे विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मसले पर आंदोलन करने वालों और लोकपाल विधेयक मसौदा समिति के सिविल सोसाइटी सदस्यों को लांछित करने का मामला हो या आतंकवादी सरगना लादेन के ओसामा जी के संबोधन का, हर जगह प्रतिमानों और विश्वास को नष्ट करने के प्रयास दिखाई देते हैं।

यदि इन तथ्यों को समझ लिया जाये तो कांग्रेस आलाकमान की चुप्पी का रहस्य भी खुल जाता है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर डा. मनमोहन सिंह, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल और नरेन्द्र मोदी भी वोटों के बाजारवाद के अगुवा तथा सोनिया गांधी और लालकृष्ण आडवाणी संरक्षक दिखायी देंगे। सब एक दिशा में एक ही ‘परम उद्देश्य’ के लिये कार्यरत लगेंगे। कामनवेल्थ, 2जी, आदर्श सोसाइटी आदि घोटाले इसी लोकतांत्रिक महाघोटाले के उत्पाद हैं। यानी वोटों के बाज़ारवाद के बढ़ने के साथ नेताओं में जनाक्रोश की परवाह कम होती जाती है और उन्हें जनता की दौलत लूटने में निर्भयता प्राप्त होती है। स्पष्ट है कि वोटों के बाज़ारवाद के बढ़ने के साथ ही घोटाले और लूट बढ़ती जायेगी।हिंसा इसी वोटों के बाजारवाद का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। नरेन्द्र मोदी ने इस टूल का सबसे कारगर इस्तेमाल किया गुजरात में और वह एक दशक से वहां मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज है। दिग्विजय सिंह इसे समझते हैं और अब वह श्री मोदी की छोटी लकीर के बगल में बड़ी लाइन खींच रहे हैं। वह आतंकवादी हिंसा के आइकन ओसामा बिन लादेन को महिमा मंडित कर एक साथ लादेन और मोदी को मुस्लिम और हिन्दू समाज के आइकन के रूप में प्रति स्थापित करने में लगे हैं।

शायद वह सोचते हैं कि उन्हें इससे उन्हें दो फायदे होंगे। पहला भारतीय राजनीति को कांग्रेस और भाजपा में द्विध्रुवीय करने में मदद मिलेगी और छोटे दलों को समाप्त करके बाजारवादी समझौते के लिये सुलभ भाजपा को दूसरे ध्रुव पर स्थापित करके सत्ता में लूट और बंदरबांट का स्थायी तंत्र विकसित हो पायेगा। यदि इस पूरे षड़यंत्र में भाजपा भी शामिल हो तो अचरज नहीं होना चाहिये। राजनीतिक दलों में वोटों के नफे-नुकसान के आकलन प्रति-आकलन की आदत तो चुनाव दर चुनाव बढ़ती जा रही है। लेकिन देश, समाज और मनुष्यता को जो नुकसान हो गया है और हो रहा है, उस पर विचार मंथन की प्रक्रिया राजनीतिक दलों में कहीं अधिक तेजी से लुप्त होती जा रही है। कम्पनियों में तब्दील होते जा रहे राजनीतिक दलों के लिये वोटर मानव संसाधन, वोट श्रम, चुनाव परिणाम उत्पाद और सत्ता मुनाफा बनती जा रही है।

लेखक सचिन बुधौलिया पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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