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संजय सिंह की दो छोटी कहानियां

[caption id="attachment_2112" align="alignleft"]संजय सिंहसंजय सिंह[/caption]लधु कथा- 1 :

गोरखपुरिया के इश्क पर भारी जापानी बाला का देश प्रेम

किस्मत के धनी और पढ़ने-लिखने के मामले में एक जुझारू किस्म के गोरखपुरिया नौजवान की नौकरी (प्रोजेक्ट पर) जापान जैसे विकसित देश में लग गई। नौकरी के कुछ साल गुजरने के बाद उन्हें प्रेम रोग लग गया और वे अपने कार्यालय के ही किसी जापानी बाला को दिल दे बैठे। प्रेम की यह कहानी परम्परागत ढंग से परवान चढ़ते-चढ़ते अपनी परिणति पर पहुंचने के लिए कुलांचे मारने लगी।

लड़की के मां-बाप ने भी दबाव डाला- ‘बेटे शादी कर लो।’

गोरखपुरिया नौजवान ने सोचा कि इस बार वह सालाना छट्टी पर घर (इंडिया) जाएगा तो लगे हाथ अपने अभिभावकों से ‘बात’ भी कर लेगा। भविष्य की योजनाएं मन में बनने-बिगड़ने लगीं और एक दिन वह तिथि भी आ गई जिस दिन उसकी इंडिया की फ्लाइट थी। बड़े ही रोमांटिक अंदाज में उसने प्रेमिका से कहा- ‘तुम मुझे एयरपोर्ट पर छोड़ने तो आओगी न…. अरे भाई इस बार शादी की बात पक्की करने जा रहा हूं।’ 

संजय सिंह

संजय सिंहलधु कथा- 1 :

गोरखपुरिया के इश्क पर भारी जापानी बाला का देश प्रेम

किस्मत के धनी और पढ़ने-लिखने के मामले में एक जुझारू किस्म के गोरखपुरिया नौजवान की नौकरी (प्रोजेक्ट पर) जापान जैसे विकसित देश में लग गई। नौकरी के कुछ साल गुजरने के बाद उन्हें प्रेम रोग लग गया और वे अपने कार्यालय के ही किसी जापानी बाला को दिल दे बैठे। प्रेम की यह कहानी परम्परागत ढंग से परवान चढ़ते-चढ़ते अपनी परिणति पर पहुंचने के लिए कुलांचे मारने लगी।

लड़की के मां-बाप ने भी दबाव डाला- ‘बेटे शादी कर लो।’

गोरखपुरिया नौजवान ने सोचा कि इस बार वह सालाना छट्टी पर घर (इंडिया) जाएगा तो लगे हाथ अपने अभिभावकों से ‘बात’ भी कर लेगा। भविष्य की योजनाएं मन में बनने-बिगड़ने लगीं और एक दिन वह तिथि भी आ गई जिस दिन उसकी इंडिया की फ्लाइट थी। बड़े ही रोमांटिक अंदाज में उसने प्रेमिका से कहा- ‘तुम मुझे एयरपोर्ट पर छोड़ने तो आओगी न…. अरे भाई इस बार शादी की बात पक्की करने जा रहा हूं।’ 

प्रेमिका ने हैरानी व्यक्त की… ‘अरे मैं एयरपोर्ट कैसे आ सकती हूं। तुम तो जानते ही हो कि जिस समय तुम्हारी फ्लाइट है वह आफिस आवर है और मैं ड्यूटी पर होऊंगी। तुमको पहले ही ‘सी.आफ’ कर दूंगी।’

गोरखपुरिया नौजवान का ईगो आड़े आ गया और वह इस बात पर अड़ गया- ‘तुम्हें एयरपोर्ट पर आना ही होगा।’

प्रेमिका ने समझाने की बहुतेरे कोशिश की। गोरखपुरिया ने अपने प्रेम का वास्ता देकर कहा, ‘क्या तुम मेरे लिए कुछ देर के लिए आफिस नहीं छोड़ सकती….।’

प्रेमिका को अब गुस्सा आ गया…वह बिफर पड़ी और उसने जो फैसला सुनाया, उसे सुनकर गोरखपुरिया सन्न रह गया…. उसके पैर की जमीन खिसक गई। जापानी प्रेमिका का फैसला अब आप भी सुन लीजिए।

उसने कहा था- ‘मैं अपने ‘प्यार’ के लिए अपनी संस्था……अपने देश…..के साथ गद्दारी नहीं कर सकती। अगर कोई इमरजेंसी नहीं है तो मैं अपनी ड्यूटी नहीं छोड़ सकती। मैं उस व्यक्ति से कतई निर्वाह नहीं कर सकती…..जो मुझे मेरे कर्तव्य से विमुख होने की बात करता हो। मेरे लिए मेरे प्यार से ज्यादा मेरा देश है। मैं तुमसे इसी क्षण अपना रिश्ता खत्म करती हूं।’

वह जापानी लड़की थी। अमेरीकी नापाक परमाणु बमों से तबाही के बाद भी राष्ट्र के प्रति समर्पित और कर्मठ लोगों की इच्छा शक्ति के बलबूते तरक्की की बुलन्दियों को छूने वाले राष्ट्र जापान की लड़की….और एक हम हैं। हम गोरखपुरिया हैं। हम पुरबिया हैं। हम भारतीय है। आजादी के पचास-पचपन सालों बाद भी हमारे भीतर राष्ट्र के प्रति समर्पण और कोई कार्य संस्कृति विकसित नहीं हो पायी है। हमारे भीतर वह ‘कीड़ा’ ही नहीं है जो किसी देश की तरक्की के लिए उत्प्रेरक का कार्य करता है। जिस काम की हम पगार खाते हैं उसके बदले कार्य करना तौहीन समझते हैं। हमारा जमीर हमें नहीं ललकारता। हमें शर्म भी नहीं आती और सच तो यह है कि हम परले दर्जे के बेशर्म हो चुके हैं।


लघु कथा-2

विदेशी का शोध उर्फ भारत की ‘उर्वरा शक्ति’

प्रति वर्ष एक आस्ट्रेलिया पैदा कर देने की कूबत रखने वाले इस देश और प्रजनन कार्य में दक्ष लोगों को नजदीक से देखने-सुनने-जानने के लिए लालायित एक विदेशी पत्रकार ने यहां शोध करने की ठानी। कीड़े-मकोड़ों की तरह भारत की बढ़ती मानव आबादी पर शोध कर रहा वह विदेशी शोध छात्र उस समय भाग खड़ा हुआ, जब उसने यहां के पौराणिक ग्रन्थों को पढ़ा। उसने अपनी डायरी में महज चार लाइनें निष्कर्ष की लिखीं और शोध कार्य पर विराम लगा दिया।

उसने भारत के बारे में लिखा- ‘यह वो देश है जहां कर्ण नामक महाबली स्त्री के कान से पैदा हो जाता है। व्यास मुनि नामक ऋषि के देख भर लेने से रूपसी गर्भवती हो जाती है और पांडु को जन्म देती है।…. और यहां तक कि अदभुत वानर हनुमान का पसीना मछली के मुख में पड़ते ही पुत्र पैदा हो जाता है। हथेलियों और अन्य अंग-प्रत्यंगों से भी मानव जन्म लेने के किस्से भरे पड़े हैं।’

उसने आगे लिखा, ‘लगता है इस भारी भरकम देश की सरकार भी अपनी पौराणिक कथाओं से ही इन्सपायर्ड है, जहां बेतहाशा मानव प्रजनन रोकने की कोई कारगर योजना ही नहीं है…. और जो है भी वो वोट की राजनीति की शिकार है। कालांतर में एक लोकप्रिय सरकार ने आबादी रोकने के चक्कर में ही गद्दी खो दी थी। तबसे आने-जाने वाली सरकारों ने सपने में भी इसके बारे में सोचना बंद कर दिया है। गर सोचते भी हैं तो जूड़ी बुखार आ जाती है।’

बहरहाल ये विचार तो उस विदेशी के थे, जो यहां की पौराणिक कथाओं मात्र से भयाक्रान्त हो गया था, और एक बेहतर रिसर्च से हाथ धो बैठा था। अगर वह रिसर्च जारी रखता तो निश्चय ही उसे भारत के आधुनिक समाज में आबादी रोकने के उपायों-प्रयासों पर अद्धतन और अदभुत जानकारियां मिलतीं जो उसके शोध प्रबन्ध को और समृद्ध बनातीं। वह यह जानकर गश खा जाता कि यहां के महिलां-पुरूष की नसबन्दी के बाद भी बच्चे पैदा हो जाते हैं। निश्चय ही उसे यहां के चिकित्सा विज्ञान पर शोध करने का नया टापिक प्राप्त होता।

भारत की इस अदभुत ‘उर्वरा शक्ति’ का असर इस कलयुग में भी परमपरागत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी अदयतन है। इस महाशक्ति के मारे बेचारे एक पत्रकार भी हैं, जिन्होंने नसबन्दी कराने के बाद भी पुत्री को जन्म दे डाला। लोगों ने कहा घर में लक्ष्मी आयी है। पहले से ही तीन लक्ष्मियां घर में डेरा डाल चुकीं थीं, सो उन्हें और लक्ष्मी की दरकार नहीं थी। उन्हें लगा मामला कुछ गड़बड़ है, सो पत्नी की भी नसबन्दी करा डाली।

ईश्वर की असीम अनुकम्मा यह देखिये कि इस बार दो-दो नसबन्दियों को धता बताकर एक बार फिर लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ और लोगों ने कहा कि यह तो महालक्ष्मी है… कई बाधाओं को तोड़कर आयी है। इस उर्वरा शक्ति ने यहां के सरकारी अस्पताल के एक फार्मेसिस्ट को भी नही बख्शा। जिला अस्पताल में कार्यरत इस फार्मेसिस्ट के घर उस समय हायतौबा मच गयी, जब फार्मेसिस्ट पिता के दुधमुंहे पुत्र ने सिरहाने रखी हुई पिस्तौल निकाल ली और खेल-खेल में खर्राटे लेते पिता की कनपटी पर लगा दी। पता चली कि वह नसबन्दी के बाद वाला था। 


लेखक संजय सिंह हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली के नेशनल ब्यूरो में बतौर स्पेशल करेस्पांडेंट कार्यरत हैं। यूपी के जिला गोरखपुर के रहने वाले और यहीं से पत्रकारीय करियर शुरू करने वाले संजय की आत्मा अब भी अपने गांव में बसती है। उनसे संपर्क करने के लिए [email protected] पर मेल कर सकते हैं या फिर 09871375522 पर रिंग कर सकते हैं।

 

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