सबकुछ ठीक नहीं है नीतीश राज में

बिहार की जनता ने हालांकि नीतीश कुमार को दोबारा सत्ता सौंप दी है, लेकिन नीतीश सरकार के कई विरोधाभास उसे मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली केन्द्र की लंगड़ी सरकार से भी बदतर हालात में ले जा रहे हैं। सवाल यहां पर यह भी है कि क्या जनता ने नीतीश को सचमुच सत्ता की चाबी सौंपी या अपने बड़े भाई श्रीमान लालू प्रसाद जी की तरह नीतीश जी ने भी बैलेट बॉक्स की जगह इस बार ईवीएम मशीन से जिन्नातों को बाहर निकाला। इस बात पर सत्ता के गलियारों में जबरदस्त कानाफूसी चली हुई है। इस मुद्दे पर इलेक्ट्रानिक्स विजिलेंस या सीबीआई स्वतः संज्ञान ले। अब जरा नवम्बर, 2010 से लेकर अब तक हुए मुख्य घटनाक्रमों पर प्रकाश डालें तो हमें सारी बातों के खोल से निकलते जाने का अनुमान हो सकता है।

दूसरी पारी में अभी सत्ता मिली भी नहीं थी कि नीतीश सरकार के सत्तारूढ़ सहयोगी भाजपा के एक कुचर्चित चेहरे राज किशोर चौधरी की नृशंश हत्या ने पूरे राज्य को हिला दिया। किन परिस्थितियों में यह हत्या मकतूल ने की इस पर चर्चा करने के बदले उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने अपनी ओर से फरमान सुना डाला कि हत्यारिन ने पाप किया है। बाद में इस घटना की जांच सीबीआई को सौंपा गया। यदि पाप के सिलसिले को उघाड़ा जाए तो विपिन राय कौन था, उसके मृतक तथा मकतूल से रिश्ते की बात जाहिर होगी और उसके उप मुख्यमंत्री से क्या रिश्ते हैं, यह बात भी निकल कर आगे आएगी। हो सकता है कि उप मुख्यमंत्री के भी मकतूल से कुछ घनिष्ठ रिश्ते हों। इन सभी बातों के जवाब जनता को अभी हो रही सीबीआई की निष्पक्ष जांच में सामने आ जाएगी।

इस प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः वाली स्थिति से घबराए हुए नीतीश के पेशानी के बल कम भी नहीं हुए थे कि प्रत्येक सोमवार मुख्यमंत्री निवास में होने वाले जनता दरबार में सिपाही भर्ती के लिए हस्तक्षेप करने की मांग करने आए हजारों नौजवान पर पुलिस का लाठीचार्ज हो गया। इस वाकये को पहले मुख्यमंत्री ने संभाला लेकिन दोपहर बाद एक बार फिर से लाठीचार्ज हो गया। इसकी आंच अभी शांत नहीं भी हुई थी कि कुछ ही दिन बाद, नवीनगर में एनटीपीसी के लिए ग्रामीणों से जमीन हथियाने की गरज से पुलिसिया जुल्म की कहानी छन कर आने लगी। बिहार सरकार की गैरमजरूआ जमीन नवीनगर में इतनी नहीं है कि उस पर एनटीपीसी अपनी पावर प्लांट खड़ी कर ले। आम जनता की जमीन औने-पौने में खरीदने को उत्सुक बिहार सरकार अपने उद्दंड जिलाधिकारी की बदौलत डरा-धमका कर जमीन हथियाने में लगी है और बिहार के नीतीश चरणरजधारी मीडिया को पता नहीं क्या हो गया है कि पिछले पांच सालों में पचास करोड़ की सरकारी विज्ञापन पर ही इतनी बिक-बिछ चुकी है कि उसे नबीनगर-औरंगाबाद की जनता के सरोकार नहीं दिखाई दे रहे हैं।

नीतीश सरकार ने मीडिया में मार्फत एक खासा भ्रम फैला रखा है कि सरकार जनता से कोई जमीन जबरन नहीं लेगी। लेकिन यहीं पर हम ध्यान दिलाना चाहेंगे कि नीतीश के खाने और दिखाने के दो अलग-अलग दांत हैं। उन्हीं भीतरी दांतों के बदौलत नीतीश भोले-भाले गरीब ग्रामीण से उनकी रोजी-रोटी छीन कर बिजली-बिजली का खेल खेलते रहना चाहते हैं। नीतीश सरकार पिछले छह सालों में बिजली के मुद्दे पर राइ-रत्ती का फर्क नहीं पैदा कर पाई है। बिहार के लोग अभी भी लालटेन युग में ही जी रहे हैं और पटना छोड़कर सभी शहरों और गांवों में 2-6 घंटे बिजली पाने को अभिशप्त हैं। ऐसे में राज्य का विकास डीज़ल जेनरेटर से हो पाएगा क्या। बिहार में उद्योग का नक्शा नीतीश झारखंड में खीचेंगे क्या। नवीनगर और बाढ़ में पावर प्लांट दिलाने को छोड़कर बिजली की व्यवस्था के लिए नीतीश सरकार ने धेले भर का काम नहीं किया है।

कोसी नदी पर कुसहा में टूटे बांध के बाद तबाह हुई लाखों लोगों की जिन्दगी को पटरी पर लौटाने का काम नीतीश सरकार पूरे तरीके से नहीं कर पाई और सारा ठीकरा केन्द्र सरकार पर फोड़ डाला। सड़क मरम्मती के अलावा, राहत के काम में सरकार चुस्ती नहीं दिखा पाई। कोसी पर कुसहा जैसी त्रासदी फिर से न हो, इस मुद्दे पर नीतीश का रवैया पुराना ही रहा है। इसका कारण है कि कोसी नदी पर केन्द्र सरकार से 750 करोड़ से लेकर 1000 करोड़ रुपये की मरम्मती की राशि सलाना मिल जाती है। यह रकम सरकार में बैठे दल के सेहत के लिए टॉनिक का काम करता है। नीतीश नहीं चाहते कि यह रकम बंद हो। नीतीश ने सड़क और पुल को दिखा-दिखा कर खूब सारे वोट डकारे अब भरपाई करने की नौबत आने ही वाली है।

हुआ ये है कि बिहार दो हि्स्सों में बंटा हुआ है गंगा के कारण और बिहार में गंगा पर अभी चार पुल है – बक्सर, पटना, बरौनी, भागलपुर। इनमें से बरौनी पुल पर सड़क यातायात बंद है। किसी भी वक्त पटना पर सबसे बड़ा पुल गांधी सेतु पर यातायात बंद हो सकता है। दीघा पुल रेलवे ने पूरा करके जनता को सौंपा नहीं है कि वैकल्पिक यातायात शुरू हो सके और पटना को बिहार के उत्तरी हिस्से से जोड़ा जा सके। ऐसी स्थिति में यदि गांधी सेतु टूट जाए या इस पर यातायात बंद हो जाए, तो नीतीश के पक्ष में बहने वाली हवा दो पल में विरोध में बहने वाली आंधी बन सकती है और उसमें नीतीश और उनकी सरकार तिनके की भांति उड़ती हुई नजर आ सकती है। सवाल यहां पर ये है कि हर बार केन्द्र पर गांधी सेतु की मरम्मती का पैसा नही देने का आरोप लगाकर नीतीश सरकार कितनी दिन खींचेगी और और क्या हासिल कर पाएगी। यह तो चिंदीचोर वाली मानसिकता हुई। एक तरफ, अपने बदौलत बिहार के विकसित राज्य की श्रेणी में लाने की बात करने वाली नीतीश सरकार हर मरम्मती के लिए केन्द्र सरकार से पैसे मांगती फिरती है।

दो साल पूर्व अखिल भारतीय सड़क कांग्रेस के दौरान बड़बोले नीतीश ने गांधी सेतु को ठीक करने और दीर्घायु बनाने के लिए राय मांगी तो विशेषज्ञों ने दो टूक राय दे दी कि केंटीलीवर पुल का इतिहास बीस से पचीस साल वाला रहा है। यह पुल अपनी उमर को पार गया है। इसका एकमात्र विकल्प है कि इसी पुल के बगल  में एक सामान्य पुल बना दिया जाए। तो सवाल फिर खड़ा है कि दो सालों से नीतीश किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपनी ओर से बिहार की जनता हित में एक नया पुल बनाने की घोषणा क्यों नहीं करते। क्या पुल टूटने पर सैकड़ों लोगों की कुरबानी के बाद ही नीतीश ऐसी घोषणा करेंगे। जिन लोगों को हमारी बात कोरी गप्प लगे वो कृपया बीबीसी.कॉम पर बीबीसी के पटना संवाददाता मणिकांत ठाकुर के पुल के उपर और नीचे जाकर नाव से लिए गए फोटो को देख लें!

थोड़ी बात उद्योग धंधे को बढ़ावा देने के लिए छटपटाते नीतीश सरकार के फारबिसगंज गोली चालन की कर लें। बिहार की प्रिंट मीडिया भी अब बहरी हो गई है। उसे सरकारी बंदूक की आवाज सुनाई नहीं देती है। इसलिए उसने फारबिसगंज गोलीकांड से अपने आपको अलग रखा। नीतीश से राज्यसभा सांसदई की उम्मीद पालने में कोई बुराई नहीं है आदरणीय संपादक उर्फ चिरकुट महोदयगण, लेकिन बड़ी बड़ी नसीहतें देना भी आपलोग छोड़ ही दें तो अच्छा। गांव वालों को बियाडा की जमीन से आने जाने नहीं दिया जाएगा तो बिहार में उद्योग की फसल लहलहा उठेगी या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन फारबिसगंज के मासूम बच्चों और बिहारी जनता के खून से जरूर बिहार के सत्ता-मीडिया-अफसर-दलाल-सेठों की गंदी पूंजीवादी फसल बहुत लहलहा उठी है। इस फसल के कटने पर नीतीश की सत्ता रूपी बखाड़ी में आगरूपी दाने पैदा होंगे, जिसमें जलकर पता नहीं नीतीश सरकार की कौन-कौन सी गंदगी और जाने क्या-क्या राख होने वाला है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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