सलवा-जुडूम, एसपीओ और नक्सलवाद

pankajसुप्रीम कोर्ट के एसपीओ और सलवा-जुडूम संबंधी आदेशों से फिलहाल छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सल विरोधी अभियानों को गंभीर झटका लगा है. अभी दिए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने जहां सलवा-जुडूम को बंद करने को कहा वहीं नक्सलियों की नाक में दम कर रख देने वाले बहादुर कोया जवानों समेत सभी करीब पांच हज़ार विशेष पुलिस अधिकारियों को हथियारविहीन करने के साथ-साथ केन्द्र को भी यह आदेश दिया है कि वह किसी भी तरह की आर्थिक मदद एसपीओ के मामले में नहीं करे. तो कोर्ट के फैसले पर बिना किसी तरह की टिप्पणी किये ज़रूरी यह समझना है कि आखिरकार इन दोनों मामलों से परेशानी किसे थी?

जहां तक सलवा-जुडूम का सवाल है तो अब वह आंदोलन समाप्तप्राय है, या यूं कहें कि खत्म ही हो गया है. हालांकि उस आंदोलन को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अद्भुत आंदोलन कहा जाय, मील का पत्थर कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. यही वह आंदोलन था जिसके कारण पहली बार देशभक्तों और आस्तीन के सांपों के मध्य अंतर स्पष्ट हुआ था. यही वह आंदोलन था जिसके माध्यम से बस्तर के वीर जवानों ने नक्सली लुटेरों से दो-दो हाथ कर, पहले अपने शांतिपूर्ण अभियानों के द्वारा ही उन्हें अपनी हैसियत बता दी थी. जहां तक सरकार का सवाल है तो इस मामले में उसकी भूमिका महज़ इतनी ही थी कि वह सलवा जुडूम के शान्ति योद्धाओं को सुरक्षित जगह पर ला कर उनके भरण-पोषण और सुरक्षा की व्यवस्था कर दी थी. चूंकि शिविरों में चले आने के कारण नक्सलियों और नागरिकों का फर्क पहली बार स्पष्ट होने लगा था, चूंकि मुट्ठी भर नक्सली जिन मजलूमों को अपनी ढाल बना खुद बच निकलते थे,  वह ढाल कमज़ोर पड़ता जा रहा था. अतः बौखलाहट लाजिमी था. चूंकि इस मामले में उनकी ताकत और रणनीति विफल हो गयी थी तो अंततः अपने समर्थक देशद्रोही बुद्धिजीवियों को आगे कर समूचे दुनिया में इस आंदोलन को बदनाम कर अंततः इसे खत्म कर ही दम लिया था. ज़ाहिर है भारत इस विडंबना से कभी नहीं पार पाया कि वह जब भी वह हारा है बस अपने ही जयचंदों से.खैर.

इसी तरह जहां तक सवाल एसपीओ की नियुक्ति का है तो इसे भी समझने की ज़रूरत है. अव्वल तो यह कि आखिरकार जो नक्सली भारत के शक्तिशाली अर्धसैनिक बलों, राज्य के लुलिस बलों से नहीं डरते उन्हें इन भोले-भाले आदिवासियों से कैसे इतना आतंकित होना पड़ गया? जबाब भी इन्हीं सवालों में निहित है. इन एसपीओ समूहों में सबसे चर्चित कोया कमांडो तो ऐसे जवानों का समूह है,  जिसके नाम से ही नक्सलियों की घिग्घी बंध जाती थी. जिस जंगलवार की ट्रेनिंग के लिए देश को वर्षों तक अपने जवानों को प्रशिक्षित करना पडे़गा वह इन्हें प्रकृति ने सहज ही उपलब्ध करा दिया है. वहां के माटी पुत्र होने के कारण बस्तर की भूल-भुलैया के कण-कण से वाकिफ होने के कारण, अपने और पराये लोगों में फर्क समझने के कारण, स्थानीय भाषा की समझ के कारण, खुफिया जानकारी अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से जुटा लेने के कारण और सबसे बढ़कर वीर लड़ाकू कौम होने के कारण इन्होंने नक्सलियों की चूलें हिला कर रख दी है. इन्हें किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाना कभी नक्सलियों के लिए इतना आसान नहीं रहा. यहां तक कि जब पिछले साल छह अप्रैल को ताड़मेंतला में 76 जवान शहीद हुए थे तो उसमें भी एसपीओ केवल एक थे. शेष 75 सीआरपीएफ के जवान ही शहीद हुए थे.

तो सवाल यह पैदा होता है कि अपने ऐसे वीरों को मातृभूमि की रक्षा में क्यूंकर न लगाए कोई सरकार? जब देश के सुदूर उत्तर-पूर्व तक से, बिहार-यूपी, हरियाणा, पंजाब तक से जवान यहां आ कर और अंतिम सलामी लेकर, तिरंगे में लिपट कर, ताबूत में बंद होकर वापस जा रहे हों तो आखिर इसी माटी के रणबाकुरों को उनके खुद के आज़ादी की रक्षा में जुट जाने से भला क्यूंकर रोका जाय? देखा जाय तो छत्तीसगढ़ में ही केवल एसपीओ की नियुक्ति नहीं की गयी है. यहां तो बमुश्किल 4500 जवान नियुक्त किये गए हैं जबकि पूरे देश में 70,000 से अधिक ऐसे जवान कार्य कर रहे हैं. यहां तक की विदेशी आतंक से पीड़ित जम्मू-कश्मीर तक में ऐसे एसपीओ काफी कुशलता से काम कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में भी पिछले पांच सालों में इन जवानों ने 250 से ज्यादा दुश्मनों को मार गिराने में सफलता प्राप्त की है.

इन तमाम बातों के अलावा एक मामला इनके रोज़गार से भी जुड़ा है. आप कल्पना नहीं कर सकते कि दशकों से उपेक्षित और शोषित इन आदिवासियों में इस नियुक्ति के बाद आत्मविश्वास का कैसा संचार हुआ है. जो 3000 रूपये मानदेय उन्हें दिया जाता है उसकी कीमत दिल्ली के वातानुकूलित कक्ष में बैठे बुद्धिजीवी कभी नहीं समझ सकते. उसी तीन हज़ार में से मात्र 35 रूपये में महीने भर का चावल खरीद उन्होंने आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का स्वाद चखा है. खैर. सूबाई सरकार के लिए संघर्ष की राहें अभी मीलों लंबी है. एक समस्या इस मामले पर केन्द्र का ढुलमुल रवैया भी है. सुप्रीम कोर्ट से पूरी तरह सम्मान व्यक्त करते हुए भी सरकार के लिए यह ज़रूर आवश्यक है कि वह अपने बढे़ हुए पांव पीछे नहीं हटाये. यह फैसले की घड़ी है, इतिहास बनाने का अवसर है. निश्चित ही कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने का विकल्प तो है ही लेकिन उससे भी बड़ा विकल्प यह है कि पिछले छह साल से आजमाए एवं हर परीक्षा में पूरी तरह खरा उतरे अपने इन बहादुर जवानों को नियमों में ढील देकर, कानूनों में संशोधन कर भी नियमित पुलिस बल का दर्ज़ा दे कर इन्हें अपनी मातृभूमि और देश में लोकतंत्र की रक्षा हेतु काम पर लगाया जाय.

यह बार-बार याद दिलाने की ज़रूरत है कि यह मामला केवल देश के एक उपेक्षित इलाके लेकिन केरल से भी बड़े बस्तर का ही नहीं है. मामला आंतरिक सुरक्षा और लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उत्पन्न कर देने वाले लाल आतंकियों का है. अभी हाल ही में पाकिस्तान से आये एक पत्रकार ने बस्तर का दौरा कर वहां का अध्ययन करने के बाद यह लिखा कि आज की तारीख में नक्सली, ‘अल-कायदा’ से भी ज्यादे खतरनाक और ताकतवर हो गए हैं. तो ज़ाहिर है लड़ाई आसान नहीं है. लेकिन इन्हीं कठिन लड़ाइयों के मौके पर तो राष्ट्र नायकों की पहचान भी होती है. ज़रूरत बस शौर्य और धैर्य को बनाए रखने का है. अपने माटी पुत्रों पर भरोसा कायम रखने का है. देश में काफी मजबूती से जड़ ज़माये लोकतंत्र की ताकत पहचानने का है और है राष्ट्र हित को सबसे ऊपर रख अपने प्राणों तक की बाज़ी लगा देने के ज़ज्बे को कायम रखने का. तय मानिए यह लड़ाई उसी रास्ते से खत्म होना है जिस रास्ते से ओसामा, लिट्टे या फिर खालिस्तानी आतंक का खात्मा संभव हुआ था.

लेखक पंकज झा छत्‍तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

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