सुब्रत राय जी, आपकी कथनी-करनी में अंतर है!

: अपने ऑफिस में लगे भारतमाता के चित्र हटवा दीजिए :‘पेपर साबुन का झाग होता है, जिसको ब्‍यूरो जब चाहे तब छू कर फोड़ सकता है।’ ये शब्द हैं राष्ट्रीय सहारा के स्टेट कोआर्डिनेटर राकेश के। यह जबाव राकेश ने तब दिया गया जब मैंने उनसे यह पूछा कि सर, जिले में तो एक आदमी पहले से काम कर रहा है, मुझे कैसे काम करने को कह रहे हैं। इसी के बाद मुझे यह जवाब मिला। मुझे यह जानकर अत्यन्त दुख होता है और आश्चर्य भी होता है कि जहां अजीज बर्नी, जो देश ही नहीं विदेशों में भी अपने निष्पक्ष लेखों के माध्यम से अपने हक और हुकूक की लडाई लड़ने की प्रेरणा देते हैं, जैसे देवता के बीच में ऐसे भी लोग मौजूद हैं। जो सहारा का नाम ही नहीं पूरी पत्रकारिता को भी बदनाम कर रहे हैं। सुब्रत राय ‘सहारा’ अपने ‘सहारा कल्चर’ के लिए पूरे देश में मशहूर हैं, और यह भी कहा जाता है कि वह राष्ट्रीयता का बोध लेकर ही अपना सभी कार्य सम्पन्न करते हैं, अपने इसी आधार को मान कर वे आगे चलने की भी स्वतः प्रेरणा देते रहेंगे।

बीते दिनों में मऊ में ‘सहारा न्यूज ब्‍यूरो’ का उद्घाटन हुआ। जिसमें पुराने राष्ट्रीय सहारा के जिला संवाददाता को बदल कर दूसरे को रख दिया गया तथा पुराने सहारा टीवी के स्ट्रिंगर की जगह मुझे रखने का आश्वासन दिया गया। मैं बार-बार कभी बनारस तो कभी लखनऊ बुलाया गया, पुराने स्ट्रिंगर से नये यानी कि हमको संघर्ष करने के लिए कहा गया और यह भी बताया गया कि आप काम करते रहिए। उत्तर प्रदेश के प्रभारी राजेन्द्र दूबे, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने एक मामूली छोटे से रिपोर्टर के रूप में अपना करियर शुरू किया था और अपनी योग्यता के बल पर इतने ऊंचे पद पर पहुंचे। उन्होंने भी मुझे कई बार आश्वासन दिया कि आप काम करते रहिए और बनारस के राजेश गुप्ता से सम्पर्क साधते रहिए।

बनारस के राजेश गुप्ता ने मेरी एक भी नहीं सुनी, और यही नहीं बराबर डांटते-फटकारते भी रहे। इससे हमको यह लगा कि ऊपर से लेकर नीचे तक ये सारे लोग बस एक ही थैली के चट्टे-बट्टे थे। सूपर्णखा की तरह से मैं कभी शुबह-ए-बनारस तो कभी शाम-ए-अवध देखता रह गया और बिल्कुल थक कर चूर हो गया। चूंकि जिले में ‘सहारा न्यूज ब्‍यूरो’ के उद्घाटन के अवसर पर सारे सीनियरों के बीच हमारा खूब प्रचार-प्रसार कर दिया गया था कि अब नये सहारा के रिपोर्टर आ गये हैं और मुझसे यह भी बताया गया कि पुराना भी काम करता रहेगा। अन्ततः अपनी नाक कटवाने के लिए मैं राजी हो गया और किसी तरह से अपनी नाक कटा कर फुर्सत पायी।

मैंने सोचा कि एक मित्र तो बनाने में काफी समय लगता है और सहारा कल्चर मुझे किसी को शत्रु बनाने के लिए ललकार रहा है, यह कहां की भलमनसाहत है। मुझे इन लोगों ने यह प्रश्न पूछने को मजबूर कर दिया कि क्या सहारा का यही कल्चर है? क्या मीडिया का यही सन्देश है? यह दोगलेपन की नीति सहारा की कौन सी नीति के अन्तर्गत आती है? यह सभी कृत्य अगर कोई दूसरा करता तो सर्वथा उसे गलत बताया जाता, किन्तु समाज को अपनी उत्कृष्टता का बोध कराने वाले ही जब ऐसा कर्म करने लगें और उसमें भी जब मेंढ़ ही खेत चरने लगे तो उस देश का सहारा तो सिर्फ ऊपर वाले ही हो सकते हैं।

मैं हिन्दुस्तान पेपर में जिले का प्रचार का काम देखता था, आज वर्तमान राष्ट्रीय सहारा जिला संवाददाता के आश्वासन पर वह काम छोड़ दिया।  अब सहारा की वजह से बिल्कुल रोड़ पर आ गया हूं, दूर-दूर तक कोई भी अपना सहारा नजर नहीं आता। सुब्रत राय जी आप का सहारा तो आप को मुबारक हो परन्तु मुझे तो रास नहीं आया। आपकी कथनी और करनी में काफी अन्तर प्रतीत होता है। मेरी एक नेक सलाह यह है कि अपने सभी कार्यालयों में लगे भारतमाता के चित्र को हटवा दीजिए, क्योंकि ‘वन्दे मातरम्’ का वह पवित्र शब्द आपके आफिस में सर्वथा शोभा नहीं देता।

लेखक सम्‍पूर्णानंद दुबे पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. वे पिछले कई वर्षों से मऊ जिले में सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. सम्‍पूर्णानंद से संम्‍पर्क उनके मोबाइल नम्‍बर 9414795000 या फिर उनके ई-मेल sampurnananddubey4@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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