स्‍वर्ग से नरक बना दार्जीलिंग

गोरखालैंड : अब नहीं गूंजती पर्यटकों की आवाज : शाम होते ही छा जाता है सियापा : गोरखालैंड की मांग से बदली आबोहवा : महीने में बीस दिन रहती हैं बंदी : पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, एक छोटा सा जन्नत..दार्जीलिंग. पहाडों की चोटी पर विराजित दार्जीलिंग का एहसास ही हम सभी को एक ठंडा और सुखद अनुभूति देने के लिए काफी हैं. लेकिन वक़्त बीतने के साथ-साथ दार्जीलिंग की आबोहवा ने भी ऐसा करवट बदला कि सबकुछ खाक हो गया. शायद किसी ने भी नहीं सोचा था कि ये जन्नत कभी जहन्नुम के कगार पर पहुंच जाएगी और छोड़ जाएगी गन्दी बजबजाती राजनीति. आज दार्जीलिंग के जो हालात हैं, वो कश्मीर के हालात से कुछ कम नहीं. फर्क सिर्फ इतना है कि कश्मीर में जहां दूसरे मुल्क के आतंकी शांति भंग करने को लगे हैं, वहीं दार्जीलिंग मे अपने मुल्क के वाशिंदे ही अपनों के घर को तबाह करने में लगे हैं.

इन हालातों को चुपचाप देखने के बाद भी अनजान बन रही हैं- सरकार और मीडिया. मात्र एक पार्टी की, दार्जीलिंग को बंगाल से हटा गोरखालैंड मे डालने की, जिद ने दार्जीलिंग जैसे जन्नत को जहन्नुम मे बदल डाला है. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा नामक पार्टी ने दार्जीलिंग पाने और उस पर शासन करने की ऐसी तुनक पाल ली, जिसकी बेदी पर पिस रहा हैं दार्जीलिंग और भुगत रहे हैं वहां के वाशिंदे.

गोरखा जनमुक्ति के विमल गौरुंग ने दार्जीलिंग को बंगाल से अलग कर गोरखालैंड में स्थापित करने की ऐसी जिद ठानी कि कुछ साल पहले तक जो दार्जीलिंग पर्यटकों से खचाखच भरा रहता था, वह आज सुनसान और बेजान सा दिखता है. स्‍थानीय लोगों की आंखें पर्यटकों के आने की राह देखती हैं. हर रोज गोरखओं द्वारा बुलाए गए दार्जीलिंग बंद के कारण वहां रह कर कमाने-खाने वालों की पूरी जीवनशैली ही ठप पड़ गई. आज वर्तमान में दार्जीलिंग ऐसे मोड़ पर हैं, जहां महीने के बीस दिन गोरखओं द्वारा बुलाई “हड़ताल” होती हैं, जो दार्जीलिंग को गर्त में धकेलने के लिए  काफी हैं.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा आज के वर्तमान हालात में दार्जीलिंग में सरकार के समानांतर एक छोटी सरकार चला रही हैं. जो दार्जीलिंग पर्यटकों के भीड़ के लिए जानी जाती थी, उस जमीन पर आज बिगड़ते हालात को सुधारने के लिए आए सेना और केन्‍द्रीय बलों के पैरो की थप-थप सुनाई पड़ती हैं. गोरखाओं ने दार्जीलिंग पर आधिपत्य करने के लिए वहां के घरों-दुकानों पर पश्चिम बंगाल के जगह “गोरखालैंड” लिखवा दिया हैं. दार्जीलिंग में प्रवेश करते ही आपको गोरखाओं द्वारा अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए लिखी “गोरखालैंड में आपका स्वागत हैं” वाली पट्टियां ढेरो जगहों पर मिलेंगी, जो यह दर्शाने को काफी हैं कि विमल सहित गोरखा कार्यकर्त्ता गन्दी राजनीति के कितने बड़े पैतरेबाज हैं.

इसी साल 21 मई को मदन तमांग जैसी शख्सियत की हत्या की गई और शायद उसे पूरे भारत ने जाना, फिर भी केंद्र और राज्य सरकार ने ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिससे ये लगे कि दार्जीलिंग शांत और विमल जैसे नेताओ की गिरफ्त से छूट पाई हैं. दार्जीलिंग, जो पर्यटकों के गूंज के चलते हर समय गुलजार रहता था, कि परिस्थितियां इस कदर बदल चुकी है कि शाम छह बजे के बाद दार्जीलिंग सुनसान और वीरान होकर अपने हाल पर आंसू बहाती है. अब शायद वो वक़्त आ चुका हैं, जब सोई सरकार और मीडिया को जागना होगा और इस वीरान पड़े दार्जीलिंग में फिर से वही खुशियाँ और पर्यटकों की भयमुक्त कोलाहल वापस लानी होगी, जिसके लिए दार्जीलिंग जाना जाता था.

लेखक आयुष स्‍वतंत्र लेखन करते हैं.

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