अभी अपने कुछ दिनों के दिल्ली प्रवास के दौरान लागातार यहां के पत्रकारों-संपादकों के संपर्क में आने, उनसे संवाद का अवसर मिला. निश्चित ही मेरे अपने सरोकार हैं और अपना एजेंडा भी जिसके कारण सबसे मिलना हो रहा था. लेकिन आश्चर्य लगा सबसे बात कर कि किस तरह बिहार से भी बड़े भू-भाग में अवस्थित होकर भी छोटा कहलाने की विनम्रता वाला प्रदेश ‘छत्तीसगढ़’ इन सबकी प्राथमिकता में निचले पायदान पर भी नहीं आता. अगर वे छत्तीसगढ़ के बारे में जानते हैं तो महज़ इतना कि वहां नक्सली अराजकता के अलावा कुछ नहीं है. छत्तीसगढ़ का द्रूत विकास, उसकी अपनी सांस्कृतिक विशेषताएं, शानदार भौगोलिक परिवेश आदि कुछ भी न इनके रूचि का विषय है और न ही उनसे ‘दिल्ली’ का कोई सरोकार.
लेकिन इससे भी ज्यादा जो आपत्तिजनक बात लगी वे ये कि इन लोगों की नज़र में छत्तीसगढ़ के पत्रकार और यहां की पत्रकारिता सरोकार से विहीन, बिका हुआ, केवल पीआर का काम करता हुआ और पता नहीं क्या-क्या है. हालांकि मीडिया और राडिया में साम्य की परिभाषा दिल्ली ने ही पत्रकारिता को दिया है यह ध्यान दिलाने पर वे सब बगले भी झांकते दिखे. बहरहाल.
अखबारों के थोडे भी गंभीर पाठकगण या समाचारों पर थोड़ी भी पैनी नज़र रखने वाले लोग अगर पिछले कुछ दिनों के दिल्ली के बड़े और राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबारों पर नज़र डाले तो साफ़-साफ़ दिखेगा कि यहां के कुछ बड़े पाठकों वाला अखबार किस तरह कांग्रेस के एजेंडे पर चलने में अपनी भलाई समझ रहा है. अभी विकिलिक्स खुलासे में जब यूपीए-2 के पास कहने को कुछ नहीं है सारा मामला शीशे की तरह साफ़ दिख रहा है. उसके केबिल्स से जब अविश्वास प्रस्ताव के समय विपक्ष द्वारा लगाये गए आरोपों की एक बार और पुष्टि पुष्टि हुई है, इसके अलावा अभी जब एक सरकारी लैब ने ही उस समय किये गए स्टिंग की सीडी को भी असली साबित किया है तब कांग्रेस के मीडिया प्रबंधकों ने बस एक रास्ता निकाला है और वो यह कि ऐसा साबित किया जाय कि वे भले भ्रष्टाचारी हों लेकिन भाजपा और विपक्ष भी पाक-साफ़ नहीं है. आप दिल्ली के बड़े अखबारों को उठा कर देख लीजिए ज्यादातर में आपको इसी लाइन पर काम करते पत्रकार दिखेंगे. बड़ी-बड़ी खबर छापकर यहां यही साबित करने की कोशिश की जा रही है कि विपक्ष की भी अमेरिका से सांठ-गांठ थी. शेषाद्रीचारी के किसी अमेरिकी राजनयिक के साथ व्यक्तिगत बातचीत को इसका आधार बताया जा रहा है.
यहां कांग्रेस के एजेंडे पर चलते हुए सभी इस तथ्य को जान-बूझकर नज़र अंदाज़ कर रहे हैं कि भाजपा ने कभी भी समूचे परमाणु समझौते का विरोध नहीं किया था. वह केवल जिम्मेदारी से संबंधित कुछ बातों को उस समझौते में जोड़ना चाह रही थी, जिससे देश के नागरिकों की सुरक्षा किसी एंडरसन का मुहताज नहीं हो. मोटे तौर पर भाजपा की मुख्य आपत्ति परमाणु दुर्घटना होने की स्थिति में मुआवजे के लिए 500 करोड़ रुपए की अधिकतम सीमा तय किए जाने पर थी, जिसे कुछ हद तक स्वीकार भी किया गया.
उसी अविश्वास प्रस्ताव और सांसदों को खरीदने के खेल पर दिल्ली की मीडिया को याद करते हुए ये भी याद आ रहा है कि किस तरह अपने सरोकारों पर इतराने वाले एक चैनल ने विपक्ष की पीठ में चाकू घोपते हुए पूरे स्टिंग को ही बेच दिया था. शायद पत्रकारिता के इतिहास में विश्वासघात का वह अनूठा उदहारण था, जब विपक्ष का भरोसा जीतकर, उसकी मदद से किये गए स्टिंग ऑपरेशन के सारे टेप को ही सत्ता पक्ष के लोभ या दबाव में दबा दिया गया था.
खैर. दिल्ली के अभिजात्य-पने को अपने सर पर अहंकार की तरह ओढ़े इस मीडिया को किसी भी तरह का अपराधबोध होगा, उनकी पेशानी पर कोई इन खुलासों से बल भी पडे़गा ऐसा उम्मीद करना भी व्यर्थ है. लेकिन आक्रोश तब पैदा है जब सर तक मेनिपुलेशन के कीचड़ को अपने चेहरे पर उड़ेल लेने वाले यही लोग, कम संसाधन में भी पूरे शिद्दत से काम करना वाले प्रादेशिक मीडिया को अंगुली दिखाते हों. तो दिल्ली में ही रचे बसे प्रोफशनल से तो खैर आप इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं, लेकिन तकलीफ तब होती है जब छत्तीसगढ़ के मीडिया स्कूलों से निकले या वहीं के माटी-पानी में पल कर बड़े हुए लोग भी दिल्ली आ जाने के बाद अपने प्रदेश और उसके मीडिया के प्रति ऐसे ही हिकारत व्यक्त करते हैं तो.
याद कीजिये यही की मिट्टी से संबंध रखने वाले अग्निवेश जैसे लोगों ने किस तरह प्रदेश और उसके मीडिया को जलील करते हुए उसे बिकाऊ और न जाने क्या-क्या कहा था. झूठ इतना बड़ा कि वहीं के एक बड़े पत्रकार का बयान भी उन्होंने अपनी बात के साथ तोड़-मरोड़ कर जोड़ भी दिया था. या फ़िर यही के मीडिया स्कूल की पैदाइश एक और पत्रकार को याद कर लीजिए जिनके अनुसार छत्तीसगढ़ का मीडिया ‘आर्ट ऑफ नाट राइटिंग’ क उपयोग करके अपनी कीमत वसूलना चाहता और जानता है. हालांकि छत्तीसगढ़ ने ऐसे बदनाम करने वाले लोगों को पूरे साहस के साथ लांछित, प्रतिबंधित और उनका पर्दाफाश करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है. बहरहाल.
मोटे तौर पर किसी भी शासन का साफल्य इन चीज़ों में निहित होता है कि वह आपने नागरिक के जान और माल की हिफाज़त में कितना सफल होता है. तो हज़ारों करोड़ के भ्रष्टाचार साबित हो जाने और तुष्टिकरण की अपनी नीति के कारण आतंकियों को प्रश्रय देने की कांगेसी नीति बेनकाब हो जाने पर कांग्रेस के मीडिया प्रबंधकों का फोकस केवल इस बात में है कि वह एक तरफ भगवा आतंक का राग छेड़ कर विपक्ष को भी आतंकी साबित दे, साथ ही हर तरह के भ्रष्टाचार में किसी तरह से भी विपक्ष को शामिल कर उसे रक्षात्मक मुद्रा में ला दे. और अगर आप दिल्ली के कुछ बड़े अखबार उठा कर देख लें तो ऐसा लगेगा कि कि उसके हर इस नीति में यहां का मीडिया उसका मददगार साबित हो रहा है. हर तरह की साज़िश कर अफजाल-कसाब को बचा कर रखने वाले, कोर्ट के बार-बार फटकार के बावजूद हसन अली जैसों के विरुद्ध तथ्य इकठ्ठा करने में विफल सरकारी एजेंसियों को आराम से कथित हिंदू आतंक के सारे सबूत मिनटों में उपलब्ध हो जाया करते हैं. और तत्क्षण उसे लपकने को यहां का मीडिया तैयार ही बैठा रहता है.
अभी कुछ दिनों से दिल्ली प्रदेश की सरकार को विपक्ष ने पानी का संकट और खासकर गंदे पानी की आपूर्ति के मुद्दे पर नाक में दम किया हुआ है. अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाते हुए शीला सरकार अब पानी के निजीकरण पर विचार कर रही है. जिसके कारण भी उसे काफी आलोचना झेलना पड़ रहा है. लेकिन अभी एक बड़े अखबार का लीड है ‘दिल्ली में चौदह मीटर तक बढ़ा भू-जल का स्तर.’ तो इस तरह का संयोग खोज-खोज कर सरकार की चमचागिरी करने वाले मीडिया को क्या हक बनता है कि वह दूसरे पर अंगुली उठाये? एक अंग्रेज़ी का कहावत है जब आप किसी की तरफ एक अंगुली उठाते हैं तो तीन अंगुली आपके खुद की तरफ ही होती है. राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया से यही आग्रह कि वह अपने तरफ तनी उन तीन अंगुलियों की ही चिंता करें. हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

