पिछले दिनों एक अंगेज बहादुर आए थे, अपना मुल्क (ब्रिटेन) छोड़कर, हमारे देश। डैनी बोले नाम है, उनका। फिल्में बनाते
हैं, अंगेजी की। तरक्की पसंद दुनिया के गोरी चमड़ी वाले लोगों के साथ नए जमाने की फिल्में बनाते-बनाते बोर हो गए तो चले आए इस देश में हवा-पानी बदलने। यहां आकर उन्होंने खूब कोशिश की कि इस देश में कुछ ऐसा मिल जाए जिसे नए दौर की तरक्की पसंद चीजों के साथ जोड़ा जा सके और उस पर फिल्म बनाई जा सके।
अफसोस! उन्हें कुछ नहीं मिला, सिवाय एक टीवी कार्यक्रम, ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के। कार्यक्रम भी ऐसा कि जिसका आइडिया हू-ब-हू हमारे फिल्मकारों ने उन्हीं अंगेज बहादुर के देश से चुराया था। खूब हिट हुआ था, यह कार्यक्रम। कुछ दो-चार लोग तो करोड़पति तक बन गए। बस यहीं से हमारे इन अंगेज बहादुर को नई कहानी का मसाला मिल गया।
उन्होंने भारत की झोपड़पटि्टयों में रहने वाले एक कुत्ते (लड़के) के इस टीवी कार्यक्रम के जरिए करोड़पति बनने की अदभुत कहानी रच डाली। अंगेज बहादुर हैं, अंगेजियत का चश्मा चढ़ा रखा है इसलिए एक जीता-जागता हाड़-मांस का लड़का भी कुत्ता ही नजर आया और भारत जैसे समृद्ध, विशाल और विविध आयामी देश में दिखाने के लिए सिर्फ झोपड़ पटि्टयां। कुछ और दिखता भी कैसे? इन अंगेज बहादुरों के सामने हम भारतीयों की हैसियत ही क्या है, जो कुछ और नजर आ जाता?
खैर! फिल्म बन गई। हिट हो गई, दुनिया में डंका बज गया। गोल्डन ग्लोब जैसा प्रतिष्ठित सम्मान भी चार अलग-अलग श्रेणियों में मिल गया। अब ऑस्कर जैसे महाप्रतिष्ठित सम्मान के लिए पूरी दस श्रेणियों में नामांकित की गई है, यह फिल्म। अब यह बात अलग है कि ये दोनों ही महान सम्मान अंगेज बहादुरों के, अंगेज बहादुरों के लिए और अंगेज बहादुरों द्वारा ही दिए जाते हैं। इस फिल्म को एक अंगेजी बाबू ने बनाया था, वह भी पूरी अंगेजियत के साथ, भारतीयों को उनकी हैसियत बताते हुए। सो, इतने महान सम्मान की हकदार तो इस फिल्म को बनना ही था और वह बनी भी।
हम भी खुश हैं। इतने बड़े-बड़े सम्मान हमारे देश में बनी किसी फिल्म को जो मिल रहे हैं। अब क्या फर्क पड़ता है जो इस फिल्म के जरिए भारतीय कुत्तों के रूप में हमारी गुलामी के दिनों वाली पहचान को एक नई परिभाषा मिली हो? इन अंग्रेज बहादुर ने फिल्म के शीर्षक के मार्फत बीते सालों के हमारे जख्मों को फिर कुरेद दिया हो? क्या फर्क पड़ता है अगर पराधीनता के समय में अंगेजों से हमारे स्वाभिमान की लड़ाई दिखाने वाली एक फिल्म (लगान-2002) को इन्हीं अंग्रेजों ने इन्हीं महानतम सम्मानों के लायक न समझा हो। समझते भी कैसे? उस फिल्म में अंग्रेज बहादुरों को झोपड़पटि्टयों में रहने वाले इन्हीं गरीब भारतीय कुत्तों के हाथों फिल्मी क्रिकेट मैच में पराजय का सामना जो करना पड़ा था और लगान खोना पड़ा था।
हम खुश हैं कि हमारे देश गुलाबी शहर के साहित्य के प्रतिष्ठित मंच पर एक भारतीय कुत्ता अंग्रेज बहादुर हो गया। ब्रिटेन से लौटा जो था, अंग्रेजियत पढ़कर और सीखकर भी। सुना है, किस्सागोई भी अंगेजी में ही करता है। कविताएं और उपन्यास लिखता है लेकिन वह भी सिर्फ अंगेजों के लिए। बांसुरी बजाते हुए शायद तान भी अंग्रेजी सुरों की ही छेड़ता होगा। अब उसे शर्म आती है, खुद को भारतीय कहलाने में इसलिए रवायतें (परम्पराएं) भी अंगेजियत वाली अपना ली हैं।
अंगेजियत इसकी रगों में इस कदर दौड़ने लगी है कि छोटे-छोटे बच्चों और बड़े-बुजुर्गों के सामने उन्हीं से सवाल-जवाब करते हुए जाम छलकाने में संकोच नहीं करता। भला संकोच करे भी क्यों? भारतीय कुत्ते के विशेषण से निजात पाने की छटपटाहट जो है, इसमें। ऐसे ही और भी कई लोगों में इसी तरह की छटपटाहट नजर आती है। इसीलिए वे इसकी करतूतों को वाजिब ठहराते हैं। ये लोग झोपड़ पट्टी का कुत्ता कहलाकर मिले महाप्रतिष्ठित सम्मान पर भी खूब खुशियां मनाते हैं। हर सम्भव एंगल को कवर करने की कोशिश करते हैं। फिल्म की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं, अखबारों में लेख लिखते हैं और बताते हैं कि पहली बार किसी भारतीय कुत्ते ने इतनी ऊंचाई नापी है। ये वे लोग मान-अपमान की परवाह किए बगैर बस अंग्रेजियत में घुलमिल जाना चाहते हैं, एकाकार हो जाना चाहते हैं।
लेकिन! लेकिन, चन्द लोग ऐसे भी हैं, जिनको इन तरक्की पसन्द लोगों की यह छटपटाहट, ये खुशी जरा भी नहीं सुहाती। इन लोगों को झोपड़ पट्टी का कुत्ता जैसे विशेषणों पर ऐतराज होता है। ये लोग अपने जमीर के जिन्दा होने का दावा करते हैं। ये कहते हैं कि ऐसे विशेषणों से उनके आत्मसम्मान, स्वाभिमान जैसी किसी चीज को चोट पहुंची है। इन्हीं लोगों ने गुजरात हाईकोर्ट में शुक्रवार को एक जनहित याचिका दायर कर भारतीयों को झोपड़ी का कुत्ता बताने वाली अंगेज बहादुर की महान फिल्म का शीर्षक और पटकथा बदलने की मांग की है। दरअसल, इन लोगों के अन्दर दूसरे किस्म की छटपटाहट है, जो नस्लभेद का शिकार होने पर अक्सर पैदा हो जाती है। इसे दूर करने के लिए ये विशालकाय नक्कारखाने में तूतियां बजाते हैं, इस बार भी बजा रहे हैं। लेकिन हमें इन तूतियों की आवाजों और चन्द गैरतमन्द लोगों की छटपटाहट पर ध्यान नहीं देना है। हमें इस वक्त सिर्फ खुश होना चाहिए कि हम दुनिया के सबसे बड़े सम्मान से सम्मानित झोपड़ पट्टी के कुत्ते हैं।
लेखक नीलेश कुमार राजस्थान पत्रिका, जयपुर में स्पेशल सेल में सीनियर सब एडीटर हैं। इनसे संपर्क 09928638244 के जरिए या फिर [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

