होली को बदरंग होने से बचाएं

लोकेन्‍द्र भारत एक उत्सवप्रिय देश है। यहां उत्सव मनाने के लिए दिन कम पड़ जाते हैं, अब तो और भी मुसीबत है। बाजारवाद के प्रभाव से कुछ विदेशी त्योहार भी इस देश में घुस आए हैं। खैर, अपन ने तो इनका विरोध करने का शौक नहीं पाला है, अपन राम तो पहले अपनी ही चिंता कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा। अक्सर लोगों के श्रीमुख से सुनता हूं कि अरे यार अब त्योहारों में वो मजा नहीं रहा। लगता ही नहीं दीपावली है, होली है। बहुत दु:ख होता है यह सुनकर। अब तो कुछेक मीडिया संस्थान और सामाजिक संगठन भी भारतीय त्योहारों का मजा खराब करने पर तुल गए हैं। पता नहीं इन्हें क्या मजा आता है।

नवदुर्गा और गणेशजी नहीं बिठाओ, क्योंकि इन्हें विसर्जित करने पर नदी-तालाब गंदे हो जाते हैं। दीपावली न मनाओ, क्योंकि कई तरह का प्रदूषण फैलता है। तेल और घी खाने की जगह, जला दिया जाता है। अब फागुन आ गया है, होली नजदीक है। मन फागुनी रंग में सराबोर होता, लोग रंग और पिचकारी तैयार करते कि इससे पहले कुछेक मीडिया घरानों और संगठनों ने मोर्चा संभाल लिया है, लोगों को बरगलाना शुरू कर दिया। सिर्फ टीका लगाकर होली खेलना है, जल बचाना है। पर्यावरण को संवारना है। जैसे होली खेलने वाले तो प्रकृति के दुश्मन हैं। जबकि लोग सब नफा-नुकसान जानते हैं। उनके पुरखे वर्षों से होलिका जला रहे हैं और होली खेल रहे हैं। उन्हें पता है कि होली में बुराई जलाना है और होली खेल कर आपसी बैर भुलाना है।

वैसे भी हमारे बुजुर्गों ने त्योहारों की व्यवस्था बहुत ही सोच-समझकर और वैज्ञानिक तरीके से की है। जाड़े में घर में बहुत कुछ फालतू सामान जमा हो जाता है। सूखी और खराब लकड़ी जो अलाव के लिए एकत्र की थी वह भी घर में पड़ी होती है। इन सबकी साफ-सफाई की दृष्टि से फागुन में होलीहोलिका दहन की व्यवस्था की गई है। होलिका दहन से सात-आठ दिन पहले डाड़ी लगाई जाती है। उस दिन से गांववासी या नगरवासी उस स्थान पर अपने घर का कचरा डालना शुरू करते हैं, बाद में उसी कचरे की होलिका जलाई जाती है। हमारे पुरखों ने हमसे ये कभी नहीं कहा कि होली जलाने के लिए हरे-भरे पेड़ काटो।

लाल-पीले गाल किए बिना भी भला होली का कोई मजा है। जरा सोचो तिलक लगाकर भी भला होली खेली जा सकती है, तिलक तो हम रोज ही लगाते हैं। फाग और होली का असली मजा तो रंग से सराबोर होने के बाद ही है। जब तक पिचकारी की धार आके न छू जाए होली का आनंद ही नहीं। वैसे भी हमारे मध्यप्रदेश और सीमा से लगे ब्रज व वृन्दावन की ख्याति तो होली से ही है। ब्रज में जब तक कान्हा की पिचकारी न चले गोपियों को चैन कहां, वहीं वृन्दावन में राधा की बाल्टी भर रंग से तर होने को सांवरिया वर्ष भर इंतजार करता है। ब्रज और वृन्दावन में होली खेलने के लिए देशभर से ही नहीं सुदूर मुल्कों से भी लोग आते हैं। उन्हें खींचकर लाता है हवा में उड़ता गुलाल और इधर-उधर से पिचकारियों से निकली रंगीन धार। सूखी होली उन्हें क्या लुभाएगी।

इधर, मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर की होली भी लाजवाब होती है। इंदौर की होली भी ब्रज और बरसाने से उन्नीस नहीं पड़ती। राजवाड़ा में खूब हुजूम उमड़ता है। इंदौर की होली की खास बात है गुलाल की तोप। गुलाल की तोप जब चलती है तो नीला अंबर इंद्रधनुषी हो जाता है। बड़े-बड़े पानी के टैंकरों में रंग भरा रहता है। जिसे पाइप से होली के मस्तानों की टोली पर छोड़ा जाता है। इस होली के आनंद की अनुभूति इस आलेख को पढ़कर नहीं की जा सकती, इसके लिए तो मैदान में आना ही पड़ेगा। दोस्तों त्योहार को बदरंग होने से बचाना है तो फिर किसी के बरगलाने में न आना। धूम से होली खेलना। और हां पानी बचाने के कई उपाय हैं, हमें उन पर ध्यान देना होगा, क्योंकि जल ही जीवन है और यह संकट में है। लेकिन, हम अपने त्योहारों को बदरंग नहीं होने देंगे यह संकल्प करना होगा।

लेखक लोकेन्‍द्र सिंह राजपूत पत्रिका, ग्‍वालियर में सब एडिटर हैं.

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