Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मीडिया मंथन

अंग्रेजी के साम्राज्यवाद का हथियार बना मीडिया!

आजादी के बाद सत्ता में आते ही पहली भारतीय जनतांत्रिक सत्ता ने अंग्रेजी से लड़ाई लड़ी, इसी का नतीजा यह रहा कि ‘उदारीकरण‘ के साथ अंग्रेजी अबकी बार बहुत सुनियोजित और सुरक्षित ढंग से अपना ‘नया साम्राज्यवाद’ खड़ा कर रही है, जिसमें हमारा मीडिया और सत्ता स्वयं भी शामिल है। याद रखिए, लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को भाषा से भाषा के स्तर पर चलाने की नीति बनायी, बाद में अंग्रेजी को शिक्षा समस्या बनाकर चलाया, लेकिन नहीं चल पायी। अलबत्ता, इससे उनको एक कटु अनुभव का यह सामना करना पड़ा कि एक मजबूत व्याकरण के आधारवाली मातृभाषा के चलते भारतीयों ने एक किताबी इंग्लिश सीखी और अव्वल दर्जे के आइसीएस हो गये; लेकिन अंग्रेजी भाषा को रोजमर्रा के जीवन में दूर तक प्रवेश नहीं दिया। बल्कि, बाहर ही रह गयी।

आजादी के बाद सत्ता में आते ही पहली भारतीय जनतांत्रिक सत्ता ने अंग्रेजी से लड़ाई लड़ी, इसी का नतीजा यह रहा कि ‘उदारीकरण‘ के साथ अंग्रेजी अबकी बार बहुत सुनियोजित और सुरक्षित ढंग से अपना ‘नया साम्राज्यवाद’ खड़ा कर रही है, जिसमें हमारा मीडिया और सत्ता स्वयं भी शामिल है। याद रखिए, लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को भाषा से भाषा के स्तर पर चलाने की नीति बनायी, बाद में अंग्रेजी को शिक्षा समस्या बनाकर चलाया, लेकिन नहीं चल पायी। अलबत्ता, इससे उनको एक कटु अनुभव का यह सामना करना पड़ा कि एक मजबूत व्याकरण के आधारवाली मातृभाषा के चलते भारतीयों ने एक किताबी इंग्लिश सीखी और अव्वल दर्जे के आइसीएस हो गये; लेकिन अंग्रेजी भाषा को रोजमर्रा के जीवन में दूर तक प्रवेश नहीं दिया। बल्कि, बाहर ही रह गयी।

इसलिए, अब नयी नीति तय की गयी है, जिसमें उन्होंने भाषा-संस्कृति का गठबन्धन करते हुए कहा कि अंग्रेजी को ‘स्ट्रक्चरली‘ पढ़ाया जाये, व्याकरण के जरिये नहीं। इसके लिए उन्होंने बच्चों के लिये कॉमिक्स चलाये, कार्टून फिल्में थोक के भाव में भारत के टेलिविजन चैनलों पर चलायी-और, एक मिथ्या ‘यूथ-कल्चर‘ बनाया, जिसका कुल मकसद अंग्रेजी-भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ दें- जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वे उनके नये उपनिवेश के शिकंजे में आ जाएँ और कहना न होगा कि आज के तमाम महाविद्यालयों में अध्ययन कर रही पीढ़ी को उन्होंने ‘माडर्न‘ (?) बना दिया है, जबकि वे ‘माडर्न‘ नहीं हुए, सिर्फ परम्पराच्युत हुए हैं।

एक ‘सामूहिक स्मृति‘ का शिकार हैं वे और अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझते हैं, बल्कि उसे नष्ट करने के अभियान के जत्थों में बदल गये हैं। आज के तमाम हिन्दी अखबार ‘यूथ-प्लस‘ या ‘यूथ फोरम‘ के नाम पर चार-चार चमकीले और चिकने पन्ने छाप रहे हैं – जिसमें एक दो पृष्ठ अंग्रेजी में है और बाकी के दो पृष्ठ हिंग्लिश में, जिसमें, ‘लाइफ स्टाइल के फण्डे’ सिखाये जा रहे हैं, हम इसके साथ ही एफएम रेडियो की भूमिका का भी विरोध करते हैं, जो केवल ‘क्रियोलीकृत‘ हिन्दी बनाम हिंग्लिश में ही अपना प्रसारण करते हैं और पूरी की परी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन रहे हैं। हिन्दी के अखबारों की यह भूमिका अंग्रेजी तथा उसके जरिए सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की भारतीय समाज में स्थापना की है। हम इस स्तर पर भी भारतीय समाचार-पत्रों की दृष्टि का विरोध करते हैं कि वे अपने इस एजेण्डे को अविलम्ब रोकें।

तपन भट्टाचार्य
301, सुशीला कॉम्प्लेक्स,
130, देवी अहिल्या मार्ग,
इन्दौर-3

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...